सभी ईसाई भाइयों को क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएँ !!

कल ही हमने बधाइयाँ दी थी रेगिस्तानी त्यौहार की और आज सर्द प्रदेश का त्यौहार है क्रिसमस | हिन्दू भी आज तुलसी डे मना रहे हैं शायद क्योंकि क्रिसमस ट्री का विरोध करने के लिए तुलसी ट्री से बेहतर कुछ और नहीं हो सकता 🙂

यह और बात है कि साल भर तुलसी को देखते ही न हों यह और बात है कि कईयों ने तुलसी का पेड़ देखा ही नहीं | हो सकता है कई लोग तुलसी का पेड़ खजूर के पेड़ से भी ऊँचा समझते हों और कुछ लोग नारियल के पेड़ जितना | खैर…. आज ईसाइयों का पर्व है और हमारे नेताओं, पढ़े-लिखों को ईसाइयों के देश से विशेष प्रेम भी है | यहाँ तो बच्चा पैदा होते ही मिशनरी स्कूलों में भिजवा दिया जाता है क्योंकि पैदा ही ईसाईयों के देश में काम करने के लिए किया गया था उसे | हमारे नेतागण भी ईसाईयों के देश और बैंकों से विशेष प्रेम रखते हैं…. इसलिए क्रिसमस का त्यौहार हम सभी को मिलजुल कर प्रेम से मानना चाहिए ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी विदेशों में सहज भाव से बस सकें….. वैसे भी हम अपने देश को नफरत की भेंट चढ़ाने की तयारी कर ही रहे हैं तो कम से कम हमारे बच्चे तो अमेरिका में सेटल हो ही जाएँ…हमारा तो भगवान् ही मालिक है बशर्ते सही समय पर अवतार ले लें |

जब तक अवतार नहीं लेते तब तक पाकिस्तान और मुसलमानों का डर दिखाकर हथियारों के सौदागर ईश्वर और अल्लाह के एजेंटों के साथ मिलकर इस देश में उपद्रव मचाएंगे |

वैसे जब मैं देखता हूँ सोमालिया के सुल्तान ब्रूनेई की संकीर्णता तो सोचता हूँ कि बेचारा कितना दुर्भाग्य शाली है कि वह सनातन धर्म से अनभिज्ञ रह गया | यह तो हमारा सौभाग्य ही है कि हमारे देश में रेगिस्तान भी है, सागर भी है, नदियाँ भी हैं, हिमालय भी है, घने जंगल भी हैं….. अर्थात सम्पूर्ण विश्व के सभी देशों की जलवायु हमारे देश में उपलप्ध है | यह हमारा ही देश है जहाँ सभी तरह के देशों के संस्कार, व्यव्हार, पूजा पद्धतियाँ और भेष-भूषा का सम्मान है | यहाँ लोग अंग्रेजों की तरह निक्कर में भी राष्ट्रभक्त हो सकते हैं और सऊदी की तरह पठानी ड्रेस में भी | यहाँ रूस की तरह टोपी लगा कर भी राष्ट्र भक्त हो सकते हैं और ब्राहमणों की तरह तिलक लगाकर भी | तो यही कारण है कि विदेशियों इन सभी के समूह को हिन्दू नाम देना पड़ा क्योंकि इतनी विविधता विश्व के किसी भी देश में नहीं है यहाँ तक कि हमसे ही अलग हुए पाकिस्तान और बंगलादेश में भी नहीं है |

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अब जरा सोचिये कि यदि हम सभी संगठित हो जाएँ क्योंकि हम सभी भारतीय हैं तो क्या विश्व की कोई ताकत है जो हमारा सामना कर सके ? यदि हम सभी यह जान जाएँ कि सनातन धर्म किसी का विरोधी नहीं है, बल्कि यह एक प्राकृतिक धर्म का ही नाम है न कि किसी के द्वारा स्थापित धर्म का तो क्या हम आपस में एक दूसरे से धर्म के नाम पर झगड़ पायेंगे ? यदि हम यह समझ जाएँ कि सनातन धर्म ईश्वरीय वह धर्म है जो हिमालय में रहने वालों से यह नहीं कहता कि मांसाहरी हो जाओ और धोती या सलवार कमीज पहनकर घुमो और न ही ब्राह्मणों से कहता है कि दारु पियो और मांस-मच्छी खाकर जियो | सनातन धर्म यह नहीं कहता कि कोई आपके एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे करदो और न ही यह कहता है कि कोई एक बेटी उठाकर ले जाए तो दूसरी खुद उसके घर लेकर दे आओ….. सनातन धर्म स्वाभाविक धर्म है और आपके स्वभाव व आवश्यकताओं के अनुरूप धर्म है | सनातन धर्म न तो मूर्तिपूजा का विरोध करता है और न ही निराकार की आराधना का…. क्योंकि सनातन धर्म समस्त ब्रह्माण्ड का धर्म है किसी हिन्दू, मुस्लिम, सिख ईसाई का ही नहीं | वैदिक धर्म, ब्राह्मणवाद, मूर्ति पूजा, आस्तिकता, नास्तिकता सभी सनातन के अंतर्गत ही हैं |

इसलिए इस समय हमे भारतीय ही होना है सनातन धर्मी होने के नाते, इस भूखंड के सभी निवासियों प्रेम से स्वीकारना है | सभी के त्योहारों और भावनाओं का सम्मान करना सीखना होगा तभी हम वास्तविक सनातनी कहला पाएंगे, वरना तो आर्यसमाजी हो जायेंगे, ब्राहमण हो जायेंगे, दलित हो जायेंगे, संघी-बजरंगी और हिन्दू परिषद् द्वारा स्थापित हिन्दू हो जायेंगे या मुस्लिम हो जायेंगे या ईसाई हो जायेंगे या सिख हो जायेंगे…. यानि दड़बों में सिमट जायेंगे | हम अपने स्वाभाविक अवस्था को नहीं प्राप्त कर पाएंगे और थोपे हुए जीवन व आदर्शों को जीने के लिए विवश हो जायेंगे | हमारा मन करेगा कि हम किसी मूर्ति के सामने आँख बंद कर बैठें तो बैठ नहीं पाएंगे, हमारा मन करेगा कि हम निराकार को अनुभव करें तो कर नहीं पाएंगे, हम खण्डों में ही जियेंगे और मर जायेंगे कभी सम्पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाएंगे |

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ध्यान रखें आप सनातनी नहीं है यदि आप संकीर्णता से मुक्त नहीं हो पाए | आप सनातनी नहीं है यदि आप दूसरों की खुशियों पर शामिल नहीं हो पाए | आप सनातनी नहीं हैं यदि आप दूसरों के त्योहारों पर बधाइयाँ नहीं दे पाए…. क्योंकि सनातन अद्वैत पर आधारित है | क्योंकि सनातन धर्म का नियम है, जो भावना दूसरों के लिए रखोगे वही वापस कई गुना ब्याज के साथ तुम्हें ही वापस मिलेगा | क्योंकि सामने जो कुछ तुम देख व अनुभव कर रहे हो, वह तुम्हारी अपनी ही भावना है | इसलिए इस जगत को माया भी कहा गया है क्योंकि यदि हम दूसरों के प्रति सहयोगिता व प्रेम की भावना रखते हैं तो हमें वही प्रेम और सहयोगिता चारों तरफ से मिलने लगती है और हमे लगता है कि चारों और सुख ही सुख है… बिलकुल वैसे ही जैसे अम्बानी-अदानी को दिखता है, जैसे घोटाले बाजों को दिखता है…. कि देश में सब तरफ सुख शांति है हर कोई इतना अमीर है कि बुलेट ट्रेन की आवश्यकता है | हर कोई इतना अमीर है कि हथियारों का जखीरों की आवश्यकता है…. उन्हें गरीब किसान, आदिवासी, सड़कों पर फुटपाथों पर पड़े हुए अनाथ नहीं दिखाई देते… .क्योंकि वे जिस भावना को लेकर जी रहे हैं, वहां गरीबी, भुखमरी नहीं है | इसी प्रकार आप देखेंगे कि ब्रह्म्ज्ञानियों को भी गरीबी, भुखमरी दिखाई नहीं देती | मंदिरों-मस्जिदों के ठेकेदारों को भी गरीबी नहीं दिखाई देती…. क्योंकि उन्होंने माया कि अपनी दुनिया बना रखी है…. तो जब वे लोग अपनी ही मायानगरी बना सकते हैं तो क्या हम लोग प्रेम और सहयोगिता का देश नहीं बना सकते भारत को ? क्या हम भारत को दड़बा संस्कृति से मुक्त करके सनातनी नहीं बना सकते ? ~विशुद्ध चैतन्य

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