शायद यही है साक्षरता अभियान की सफलता

भारत में साक्षरता अभियान ऐसा सफल हुआ कि आदमी ही नहीं, जानवर भी साक्षर हो गये | अब जानवर भी बेरोजगारों की लाइन पर लगे मिल जायेंगे, क्योंकि उनका घर यानि जंगल तो विकासवादियों ने छीन लिया और जो थोड़ी बहुत कहीं बची है वह भी जल्दी ही छीन ली जायेगी | क्योंकि भारत विकास की ओर अग्रसर है और जो कुछ ईश्वर प्रदत्त है, जो कुछ प्राकृतिक है, उसे मिटाना और अप्राकृतिक को अपनाना ही विकास है | हर चीज को कागजों व इलेक्ट्रिनिक्स में कन्वर्ट कर दिया जा रहा है | पानी और हवा जो कि प्राकृतिक रूप से हर प्राणी के लिए सुलभ था और ईश्वर द्वारा जीव जगत को मिला अनुपम भेंट था, उसे भी अब कागज के टुकड़े देकर लेना पड़ रहा है… अब बेचारे जानवर नौकरी नहीं करेंगे तो पानी और हवा खरीदेंगे कैसे ?

फिर पढ़े लिखे लोगों को देखता हूँ तो कभी कभी ऐसा लगता है कि उन्होंने ईश्वर से बगावत कर दी है और तय कर लिया है जो भी ईश्वर से प्राप्त है, उसे मिटा ही देना चाहते हैं | शायद इसलिए उन्होंने ईश्वर द्वारा मिले कई सॉफ्टवेर में से एक सॉफ्टवेर जिसे हम विवेक के नाम से जानते है, उसे भी अनइंस्टाल कर दिया है | अब उनके ब्रेन में विवेक नाम का प्रोग्राम है ही नहीं… इसलिए वे किसी न किसी के पीछे भागते फिरते हैं | अंग्रेजी में शायद इसे रेट रेस कहते हैं और हिंदी में भेड़चाल |

इन पढ़े लिखों के मुद्दे भी ऐसे होते है कि पता ही नहीं चलता कि वास्तव में इनको समस्या है क्या !!!

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जैसे किसी जमाने में किसी पार्टी या नेता को लगा कि महँगाई और एफडीआई डायन है… तो सारे पढ़े लिखे सड़कों पर लोटने लगे जैसे बस शाम को ही डायन आ जाएगी और सभी को खा जायेगी | फिर एक दिन किसी नेता को लगा कि महँगाई और एफडीआई विकास है और सारे पढ़े-लिखे ख़ुशी के मारे नाचने लगे, एक दूसरे को बधाइयाँ देने लगे मानो थोड़ी देर पहले ही विकास का जन्म हुआ है |

पढ़े-लिखे लोग दौड़े चले जा रहे हैं | जब जानना चाहता हूँ कि क्यों और कहाँ दौड़ रहे हैं तो हर कोई अपने आगे वाले की तरफ इशारा कर देता है | सबसे आगे वाले को जब जानना चाहता हूँ कि वह क्यों दौड़ रहे हैं तो पता चलता है कि वह तो मार्केटिंग मैनजेर है और अपने मालिक के धंधे को बढाने के लिए दौड़ रहा है | तो यह नहीं समझ में आ रहा है कि बाकी उनके पीछे क्यों दौड़ रहे हैं और उनको क्या लाभ होने वाला है ?

कभी सोचता हूँ कि ये लोग जहाँ जा रहे हैं ?

शायद ऐसी जगह जहाँ न जंगल होंगे, ने खेत होंगे, न नदी होंगे, न तालाब होंगे, न झील होंगे, न पशु होंगे, न पक्षियाँ होंगी….. केवल कंक्रीट के जंगल, कागज के नोट और बोतल बंद पानी ही मिलेगा और वह भी मोल देकर | फिर सोचता हूँ कि ये लोग उस कंक्रीट के जंगलों में करेंगे क्या ?

मैं तो कल्पना करके ही काँप जाता हूँ ऐसे जंगल की…. हे ईश्वर वह दिन आने से पहले ही मुझे उठा लेना !!!

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शायद साक्षरता अभियान का उद्देश्य था सभी को भेड़-बकरी बनाना न कि सभी को समझदार बनाना !

साक्षर होने और शिक्षित होने में जमीन आसमान का अंतर है और सरकार को शिक्षितों की नहीं, साक्षरों की आवश्यकता है और शायद समाज भी साक्षरों को ही महत्व देता है | क्योंकि उन्हें बड़े आसानी से किसी भी बाड़े में या दड़बे में रखा जा सकता है | कोई नेता कोई बयान दे देता है तो सारे दिन उसकी जुगाली करते रहते हैं ये पढ़े-लिखे लोग… न पढ़े-लिखों का मंत्रिमंडल ही कोई काम करता है और न ही प्रशासनिक अधिकारी ही कोई काम करते हैं | न न्यायालय कोई काम करता है और न ही सामाजिक संस्थाएं ही कोई काम करतीं हैं देश में | बस गिनती के कुछ नेता, कुछ बाबा, कुछ गेरुआ धारी राजनेता एक दूसरे पर कीचड उछालते रहते हैं और बाकी सारे पढ़े लिखे लोग तालियाँ बजाने में व्यस्त हो जाते हैं | किसी ने कहा कि बलात्कारी को शरिया के अनुसार सजा होनी चाहिए तो सारे तालियाँ बजाने लगे और किसी ने कहा कि हिन्दू धर्म के हिसाब से सजा होनी चाहिए तो बहसबाजी शुरू हो गयी कि शरिया में क्या बुराई है ? कुछ लोग कहने लगे कि हिन्दू राष्ट्रबनेगा तभी सब लोग सुखी होंगे तो कुछ लोग मुस्लिम राष्ट्र के पक्षधर हैं….यह कोई नहीं कहता कि व्यासायिक न्यायिक प्रणाली को विश्वसनीय व त्वरित न्यायिक प्रणाली में बदला जाए |

कोई इस बात पर भी ध्यान नहीं दे रहा कि आदिवासियों कि जमीनें छीनने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है, कोई इस बात पर ध्यान नहीं दे रहा कि किसानों को आत्महत्या करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है, कोई इस बात पर ध्यान नहीं दे रहा कि नेता तो अमीर होते जा रहे हैं, लेकिन जनता गरीब क्यों होती जा रही है | कोई इस बात पर ध्यान नहीं दे रहा कि बाहर कच्चे तेलों के दाम गिर गये तो देश में तेलों के दाम अधिक क्यों हैं | कोई इस बात पर ध्यान नहीं दे रहा कि युवाओं को नौकर बनाने के लिए चलाये जा रहे अभियानों से बेरोजगारों की लाइनें बढती जा रही हैं, अब कुछ ऐसा भी करना चाहिए कि उन्हें नौकरी करने की आवश्यकता न हो और वे आत्मनिर्भर हो जाएँ अपनी ही मेहनत से…… शायद यह सब बेकार की बातें हैं | महत्वपूर्ण तो यह कि किस नेता ने क्या कहा, किसने किस पर क्या इल्जाम लगाये, किसने किसके साथ चाय पी और किसने किस पर केस किया……

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शायद यही है साक्षरता अभियान की सफलता | ~विशुद्ध चैतन्य

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