अब प्राकृतिक होना अस्वाभाविक लगता है

एक परम्परा है स्कूल जाना भी | परम्परा का अंग्रेजी रूप है फैशन या ट्रेंड | यानि एक फैशन है स्कूल जाना या भेजना | स्कूल में ट्रेनिंग दी जाती है ट्रेंड विद्वानों द्वारा | ये ट्रेनिंग होती है ट्रेंड होने की और ट्रेंड होने के बाद वे ट्रेनिंग देते हैं दूसरों को ट्रेंड ढोने की | लेकिन ट्रेंड सेटर लाखों में कोई एक ही हो पाता है जब वह ट्रेंड ढोने की बजाये नवीन को खोजने निकलता है | जब वह अस्वीकार कर देता है ट्रेंड को और तब अजीबो गरीब ट्रेंड या फैशन भी चल पड़ते हैं, जैसे फटी हुई जींस, नोची हुई जींस, गन्दी दिखाई देने वाली जींस, उतरती हुई जींस या निक्कर या पेंट……
लेकिन चूँकि सभी पढ़े-लिखे होते हैं, विद्वान होते हैं, ट्रेंडी होते हैं परम्परावादी होते हैं, इसलिए स्कूल भेजते चले जाते हैं बच्चों को बिना यह सोचे कि हमारे बच्चे वास्तव में परम्परा को ढोने के लिए पैदा हुए हैं या फिर समाज में कुछ योगदान देकर अपनी जिंदगी जीने के लिए पैदा हुए हैं | हम शायद ही कभी बच्चों से पूछते हैं कि क्या वह स्कूल में वही सब सीख रहा है जो उसे सीखने या करने में रूचि देता है, या फिर केवल नकल किये चला जा रहा है ट्रेंड या परम्परा मानकर | हम उसे वह बनाना चाहते है, जिसे समाज इज्ज़त की नजर से देखता है यानि जिसमें ऊपर की कमाई के चान्सेज़ अधिक हों | जिसमें मोटी आमदनी होती हो… क्योंकि हम भौतिक जीवन को महत्व देते हैं | हम अप्राकृतिक जीवन को महत्व देते हैं बिना यह सोचे कि उपभोक्तावाद एक दिन ले डूबेगा इस संसार को | हम प्रकृति के विरुद्ध हो चुके हैं और यह इतने भीतर तक बैठ गया कि अब प्राकृतिक होना अस्वाभाविक लगता है | बच्चों को किताबी ज्ञान रटा दिया जाता है और स्वाभाविकता से दूर कर दिया जाता है | बच्चा जीवन भर नहीं जान पाता कि वह अस्वाभाविक जीवन जीने लगा है | वह स्वाभाविक जीवन जीने की जगह एक मशीन मात्र बनकर रह गया है और कागज के ढेर इकट्ठे करने को ही जीवन का परम सत्य मानकर जी रहा है | बच्चा जीवन भर यह नहीं समझ पाता है कि ये कागज के ढेर केवल भौतिक जीवन को सहज रूप से जीने के लिए ही आवश्यक हैं, न कि जीवन का उद्देश्य |

READ  आतंकवाद तुम्हारे अवचेतन में है

आज कितने ही पढ़े-लिखों को मैं देखता हूँ जो ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुके हैं कि स्वाभाविक जीवन जीने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं | तीन दिन किसी मैडिटेशन सेंटर में जाना हो तो हाथ पैर फूल जाते हैं क्योंकि दिहाड़ी कट जायेगी, क्योंकि बॉस छुट्टी नहीं देगा, क्योंकि समय नहीं है……समय नहीं है स्वयं से परिचय का क्योंकि थोपी हुई जिन्दगी जीने की अब आदत हो चुकी है |

एक डायलॉग पढ़े-लिखे विद्वान अक्सर मारते हैं, “जिन्होंने धर्म ग्रन्थ नहीं पढ़े, वे धर्मो पर व्याख्यान दे रहे हैं | जिन्होंने घर परिवार नहीं संभाले, वे सुखी परिवार के नुस्खे बता रहे हैं | जो चार लोगों के साथ मिलकर नहीं रह सके वे भाईचारा का पाठ पढ़ा रहे हैं….!” यही एक विडम्बना है कि ट्रेंडी लोग ट्रेंड से बाहर नहीं निकल पाते | यह कुछ वैसी ही बात है, जैसे हेलिकॉप्टर से कोई शहर को देखकर शहर के विषय में कुछ कहे और चांदनी चौक की तंग गली में रहने में वाला विद्वान कहे कि हमसे ज्यादा दिखाई देता है क्या ? हवा में बातें करने से कुछ नहीं होता, जमीन में उतर कर देखो तब शहर अच्छे से दिखाई देगा |

इन विद्वानों की अपनी ही समस्या है और वह यह कि किताबों से बाहर इनको दुनिया दिखाई ही नहीं देती, किताबों से बाहर इनको कुछ समझ में ही नहीं आता | यह किताब ही है कि विवेक और न्याय धरा का धरा रह जाता है जब एक बलात्कारी को नाबालिक होने का कारण बरी कर दिया जाता है क्योंकि किताब में ऐसा लिखा है | फिर चाहे वह कितना ही जघन्य अपराध क्यों न हो | जो लिखा हुआ है वह अटल है क्योंकि लिखे को मिटाया नहीं जा सकता | जिस प्रकार संविधान और कानून न्याय कर पाने में असफल होते चले गये, और अपराधियों का वर्चस्व स्थापित होता चला गया, वैसे ही धार्मिक पुस्तकों के साथ भी हुआ | धर्म के नाम पर जितने उपद्रव और मारकाट हो रहे हैं, उतने शायद किसी और कारण से नहीं हो रहे | लेकिन चूँकि सब पढ़े लिखे हैं इसलिए उनकी बुद्धि उतनी ही सीमित है जितने अधिक वे पढ़े-लिखे हैं | पढ़ा लिखा होने का सीधा सा अर्थ है अपना विवेक मार चुके हैं | अपनी खुद की बुद्धि खुद का अनुभव दफन कर दिया दूसरों के थोपे ज्ञान के कबाड़ में | अब अपना कुछ बचा ही नहीं जो है वह सब दूसरों का है | राम ने कहा था, कृष्ण ने कहा था, नानक ने कहा था, पैगम्बर ने कहा था, जीसस ने कहा था…. रटे चले जा रहे हैं तोतों की तरह…. अरे हाँ…. तोता भी तो पढ़ा-लिखा ही होता है !!!

READ  बलिदान, राजनीती और भावनात्मक शोषण

सारी दुनिया धर्म के नाम पर द्वेष व घृणा में सुलग रही है, लेकिन न स्कूलों ने कोई कदम उठाये, न विद्वानों ने कोई कदम उठाये मूल समस्या को समझने के लिए और न ही कोई उपाय किये उसे दूर करने के | रटाये चले जा रहे हैं बच्चों को कि हमारी धार्मिक किताबें प्रेम और भाईचारा का सन्देश देती है | लेकिन जब बच्चे घर से बाहर निकलते हैं तब उन्हें समझ में आता है कि ये भाई लोग भाईचारा के नाम पर कैसे कत्ल-ए-आम कर रहे हैं | रटाये चले जा रहे हैं बच्चों को कि हमारी संस्कृति व सभ्यता नारी को सम्मान देती है….. लेकिन बच्चे जब अपने ही टीचर के मुँह से माँ-बहन कि गालियाँ सुनते हैं, महिलाओं का मौखिक बलात्कार होते देखते हैं तब वे भी इसे नारी सम्मान का ही श्रेष्ठ तरीका समझ लेते हैं | कई बार उन बच्चों के मुँह से माँ-बहन की गलियाँ सुनकर आश्चर्य में पड़ जाता हूँ, जिन्हें अभी ठीक से बोलना भी नहीं आता लेकिन माँ-बहन की गाली देने में कोई गलती नहीं करते | और समाज गर्व से कहता है है कि हमारे शास्त्रों में, धर्मग्रंथों में नारी का सम्मान सिखाया गया है | लेकिन यह कभी नहीं कहते कि हम न पहले कभी सीखे और न भविष्य में कभी सीखेंगे जो शास्त्रों व धर्मग्रंथों में सिखाया गया | हाँ शास्त्रों और धर्म ग्रंथों का कोई अपमान करे (हमें छोड़कर), पैगम्बर/आराध्य का कोई अपमान करे तो हम सड़कों पर उतर आयेंगे | हम बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं करेंगे कि हमारे सिवाय कोइ और अपमान करे उनका | यह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है कि हम उनकी शिक्षा व दिखाए हुए मार्ग पर न चलकर उनका अपमान करें, लेकिन कोई दूसरा अपमान करे तो हम उसे सूली पर लटका देंगे | क्योंकि हम पढ़े-लिखे हैं.. शास्त्रों पढ़ा है, धर्मग्रन्थों को पढ़ा है…..

READ  मौत से भयभीत हैं लोग लेकिन मौत तो आनी ही है दो दिन देर से ही सही लेकिन आनी तो है ही

तो यह है पढ़े-लिखों की दुनिया और पढ़े-लिखों का समाज जो वास्तविक प्राकृतिक जीवन को अस्वीकार करता है और अप्राकृतिक जीवन को जीवन का सार समझता है | जो समस्या के मूल में जाकर उसे सुलझाना नहीं चाहता, बल्कि धुएँ के बादल को सजा देकर धर्म और समाज की रक्षा करते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

लेख से सम्बंधित अपने विचार अवश्य रखें

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of