वैसे भी धार्मिकों को करना क्या है…वक्त काट रहें हैं यहाँ…

दुनिया को यदि सुधरना होता तो तभी सुधर जाती, जब श्रीकृष्ण ने समझाया था अट्ठारह दिनों तक और वह भी युद्ध के मैदान में | उस युद्ध के बाद बहुत ही कम लोग बचे तो और वे सभी श्रीकृष्ण से परिचित रहे होंगे | उन्होंने यदि श्रीमद् भागवतगीता का अनुसरण किया होता तो आज विदेशियों के हम गुलाम न बने होते और न ही हमारा स्वर्णयुग हमारे हाथों से निकलकर स्विसबैंक में पहुँचता |
यदि सुधरना ही होता तो गौतमबुद्ध और महावीर के युग में भी सुधर गया होता, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ | लेकिन लोग दुहाई दे रहें हैं कि शास्त्रों को पढो और मंदिर-मस्जिद बनवाओ तो स्वर्णयुग आ जाएगा | विदेशी धार्मिक तो और भी आगे निकल गए… लडकियाँ उठाओ, बलात्कार करो, मर्दों बच्चों की हत्याएँ करो तो जन्नत नसीब होगी | एक एक लुटेरों और हत्यारों को 72-72 हूरें मिलेंगी…. और बोल तो ऐसे रहें हैं जैसे अल्लाह ने उन्हें स्पेशल authorized एजेंट नियुक्त किया है हूरों के लिए और वे यहाँ आकर हूरों के लिए ग्राहक सेट करने में लगे हुए हैं | और कमीशन भी इतना मोटा मिलता है उनको कि दुनिया भर के गोलाबारूद खरीद लेते हैं | यहाँ एक एक वक्त का खाना जुगाड़ करने में हाथ पैर फूल जाते हैं और वे करोड़ों की AK47 लेकर बच्चों को खेलने के लिए देते हैं |कहते हैं कि दूसरों को दुःख पहुंचोगे तो ईश्वर को दुःख पहुँचेगा | लेकिन जब मैं उन भूमाफियाओं, पूंजीपतियों, नेताओं और धर्मगुरुओं गलबहियाँ डाले दूसरों की संपत्ति हडपते हुए देखता हूँ, तो सोचता हूँ कि इनको ईश्वर से डर क्यों नहीं लगता ? क्या ये लोग मरने के बाद ईश्वर के पास नहीं जायेंगे ? कहीं ऐसा तो नहीं कि शैतान से सीधी सेटिंग कर ली हो और डायरेक्ट बाइपास से स्वर्ग जाने का कोई ख़ुफ़िया रास्ता बना रखा हो | जहाँ चेकिंग होने की सम्भावना न के बराबर हो ? या फिर इन्होने अपने एजेंट वैसे ही वहाँ पहले से बैठा रखें हैं, जैसे कि यहाँ की चेकपोस्ट और मंत्रालयों में बैठा रखे हैं ?
जब मैं अन्ना आन्दोलन में शामिल हुआ था तब लगा था कि कुछ बदलेगा…लेकिन वहाँ भी सेंध लग गयी और वही ढ़ाक के तीन पात | नौटंकी शुरू हो गयी और हुआ क्या ? पूंजीपतियों की सरकार आ गयी और बिकने लगा देश कौड़ियों के भाव में | अब कोई पूछे उन दुमछल्लों से कि अब बोलती क्यों बंद है महँगाई और एफडीआई के विरोध में… ? तो कहते हैं कि पिछली सरकार तो इतने सालों से लूट रही थी, हम तो अभी अभी आएं हैं | कोई कहता है कम से कम पाँच साल तो दो हमें लूटने…और कोई कहता है कि उन्हें तो पचास साल दिए हमें भी कम से कम पचास साल मिलने चाहिए लूटने के लिए उसके बाद आप पूछिये….
धार्मिकों की स्थिति यह है कि धर्म खतरे में पड़ा है का शोर मचा रखा है | क्यों पड़ा है पूछें तो हिन्दू और मुस्लिम दोनों एक दूसरे की ओर ऊँगली करके खड़े हो जाते हैं | उपाय क्या है पूछो तो दोनों का कहना है कि बराबरी का हक़ मिलना चाहिए | पाकिस्तान बन गया, बांग्लादेश बन गया और कितने टुकड़े करोगे तुम लोग धर्म के नाम पर ? इनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जिसने अपने धर्म के गरीबों को समृद्ध करने के लिए कोई कार्य किया हो… हाँ दिखाने के लिए कुछ लोग झुग्गियों में छोटे छोटे स्कूल बनवा अवश्य देते हैं, या फिर कहीं भंडारे करवा देते हैं हफ्ते महीने में एक दो दिन… हो गयी गरीबों की सेवा और हो गया विकास | फिर लग जायेंगे एक दूसरे को गरियाने और कोसने में |
उपरोक्त दोनों महत्वपूर्ण अंगों में से एक अंग मीडिया अर्थात आधुनिक नारद भी हैं जिसे हम कैसे भूल सकते हैं | वे नारद तो नारायण के परम भक्त थे और ये नारद लक्ष्मी जी के परम भक्त हैं | वे नाम जपते थे और ये नोट गिनते हैं | उस समय के नारद को तो लगाईं-बुझाई की लत थी इनको कमाई की लत है | फिर ईमान-धर्म, राष्ट्रभक्ति… सब कंगाल बैंक के लॉकर में जमा करवाकर मस्त हुए पड़े हैं | जो थोड़ी बहुत गैरत बची होती है उसे शाम को अंग्रेजी दारु में घोल कर पी जाते हैं |
दुनिया सुधरेगी तो सुधरेगी कैसे जब तक जनता सोते रहेगी और तीनों स्तम्भ लूटपाट में व्यस्त रहेंगे | जो थोड़े बहुत जागरूक होते भी हैं तो वे बेचारे न्यायालय की शरण में जाते हैं | लेकिन वहाँ भी लक्ष्मी भक्तों की कमी नहीं है, जिसके पास लक्ष्मी उसी को इन्साफ… बाकि सब साफ़ | अब कुछ विद्वानों का मानना है कि मानो तो भगवान् नहीं तो पत्थर…. अर्थात अब उन्होंने भी स्वीकार लिया की ईश्वर नहीं होता केवल भ्रम मात्र है | और एक पल तो यही लगता है कि सच ही हो.. यदि ईश्वर होता तो क्या वो इनता उपद्रव होने देता ?
अब थोड़े गहरे से समझने का प्रयास करें तो ईश्वर अब थक चुका है बार बार आकर और कभी असुरों से कभी दानवों से लोगों की रक्षा करते हुए | वह थक चुका है बेशर्मों और ढीट धार्मिकों की रोने-धोने की आदतों से | उसने तय कर लिया कि जिस काम के लिए इनको भेजा था वह तो कर नहीं रहे और पर से नए नए भगवान्, बाबा, पंथ और धर्म पैदा करने में लगे हुए हैं | पहले त्रिदेव को पूजते थे, सूर्य, चन्द्र, नदी, पहाड़, वृक्षों, पशुओं को पूजते थे और अब तो हर गली में एक नया भगवान मिल रहा है | कुछ जेल में पड़े हुए हैं और कुछ विदेशों में ही रहना पसंद करते हैं | तो ईश्वर ने सोचा कि जब इतने सारे भगवान् पृथ्वी में पहले ही उपस्थित हैं हैं मैं जाकर अब क्या करूँगा | वे देख लेंगे सबकुछ…. सो कानों में इयरफोन लगाकर और यो यो हनी सिंह का गाना लगाकर सो पड़े हुए हैं | हो सकता है कि चेतनभगत का ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ नोवेल पढ़ रहें हों |
वैसे भी धार्मिकों को करना क्या है…वक्त काट रहें हैं यहाँ… जैसे तैसे कट जाए और फिर मोक्ष मिल जाए तो स्वर्ग में बैठकर भजन कीर्तन करेंगे या फिर हूरों और इन्द्रलोक की अप्सराओं के साथ मस्ती करेंगे | हाँ उन लोगों से अपेक्षा की जा सकती है जो मोक्ष के चक्कर में नहीं पड़े हुए हैं और चाहते हैं पृथ्वी पर दोबारा आना | वे यह अवश्य प्रयास कर रहें हैं कि जाने से पहले पृथ्वी को रहने लायक बना दिया जाए ताकि अगली बार जब आयें तो इतनी मेहनत न करना पड़े | ठीक वैसे ही जैसे हम जब कुछ समय के लिए घर से बाहर जाते हैं तो घर को व्यवस्थित करके जाते हैं, ताकि जब लौटें तो सबकुछ व्यवस्थित मिले |
अंत में, ईश्वर से मैं प्रार्थना करना चाहता हूँ कि हे ईश्वर ! अपने परम भक्तों को अपने पास बुला ले, वे बहुत ही दुखी हैं जब से वे आपसे बिछुड़े हैं | अब तो वे लाऊडस्पीकर के लिए सरफुटव्वल कर रहें हैं | लाऊडस्पीकर नहीं होगा तो इनकी मधुर आवाज आप तक कैसे पहुँचेगी ? हे ईश्वर ! अगर तेरे पास लाऊड स्पीकर नहीं है तो मैं दे दूँगा….. अगर तूने केवल लाऊडस्पीकर न होने के कारण इनको नीचे भेज दिया है तो मैं दे दूँगा… चाहे भीख मांगकर अरेंज करना पड़े..लेकिन आपको बढ़िया लाऊड स्पीकर दे दूँगा | इनको बुला ले और कह दे इनसे कि स्वर्ग और जन्नत दोनों जगह लाऊड स्पीकर की व्यवस्था हो जायेगी | अब रही हेवन की बात तो वहाँ तो दो-ढाई लाख वाट वाले साउंड सिस्टम की आवश्यकता होगी… क्योंकि वहाँ तो माइकल जैक्सन जैसे महँगे भजनगायक हैं… अपने बस की बात नहीं है ईश्वर… उसके लिए आप को अमेरिका से ही बात करनी पड़ेगी | लेकिन ईश्वर आपको मैं विश्वास दिलाता हूँ कि जिस दिन ये धार्मिक और धर्म के ठेकेदार स्वर्ग में जाकर भजन-कीर्तन करने लगेंगे, पृथ्वी में शान्ति और भाईचारा का साम्राज्य हो जाएगा | –विशुद्ध चैतन्य 

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