मैं और मेरा करने की आदत

मुझे मैं और मेरा करने की आदत बचपन में नहीं थी । क्योंकि तब मैं दूसरों को और दुनिया को समझ रहा था । 13-14 वर्ष की आयु में ही दुनिया समझ में आ गई कि दूसरों के सुख के लिए कोई नहीं जीता, सभी अपने सुख के लिए ही जीते हैं । तो दूसरों के ख़ुशी के लिए जो मैं अपनी खुशियों का बलिदान करता रहा, वह धीरे धीरे बंद करना शुरू कर दिया । अब अपने सुख की बलि देकर दूसरों को खुश करना छोड़ दिया । परिणाम यह हुआ कि मैं स्वार्थी घोषित हो गया । मैंने नई उपाधि स्वीकार ली ।

जो लोग स्वयं को महत्व नहीं देते वे मैं और मेरा कहने में संकोच करते हैं। जबकि जो स्वयं को महत्व देते हैं वे मैं और मेरा का प्रयोग अधिक करते हैं । मैं तो बहुत कम उम्र में स्वयं की ओर मुड़ चुका था, इसलिए स्वयं के अनुभव व स्वयं के उदाहरणों की भरमार है । और इसलिए मेरे पोस्ट में आपको मैं और मेरा का भरमार मिलेगा । आप लोग खुशकिस्मत हैं कि आप लोगों ने मेरी तरह एकाँकी जीवन नहीं जीया और आज भी आपकी चिंता करने वाले अपनों के साथ हैं । इसलिए आप लोगों को मैं और मेरा जैसे शब्दों से घृणा हैं, मैं इतना खुशकिस्मत नहीं रहा | लेकिन यदि आप इन अपनों के बीच पूरे जीवन में स्वयं से परिचय के लिए समय नहीं निकाल पाते, तो मानव नहीं भेड़ का जीवन जीते हुए गुजर जाएंगे ।

यदि आपकी आँखें धर्म के ठेकेदारों, स्वार्थी नेताओं और रिश्तेदारों के इशारे पर खुलती व बंद होती हैं, तो आप स्वयं की शक्तियों से अपरिचित हैं और आप कठपुतली का जीवन जी रहें हैं । मैंने इन सभी को बहुत ही करीब से जाना है, इनको न ईश्वर का कोई पता है और न ही स्वयम का, इनको स्वार्थ व व्यापार से अधिक कोई ज्ञान नहीं है | शास्त्र और कानून कंठस्थ किये हुए ये लोग उस ज्ञान को कंठ से ऊपर कभी ले ही नहीं गए या शायद इनमें इतनी योग्यता ही नहीं थी की कंठ से ऊपर मस्तिष्क तक ले जाते और चिंतन मनन करते | ये लोग उतना भी नहीं जानते जितना की एक गृहस्त या एक किसान ईश्वर को जानता है | और न ही ये प्रकृति व सनातन धर्म को उतना समझते हैं, जितना की पशु-पक्षी, पेड़-पौधे समझते हैं |

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इसलिए स्वयं को जाग्रत कीजिये और आप पायेंगे स्वयं को स्वार्थियों की भीड़ से अलग । आप समाज के लिए कई गुना अधिक उपयोगी हो पाएंगे जब आप वह कर पाएं जो करने के लिए आप इस धरा पर आये थे । अभी हो सकता है कि जो आप कर रहें हैं, वह मात्र विवशता हो ? ~विशुद्ध चैतन्य

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