विश्वरूप और मूर्ति पूजा

जो विद्वान् व ज्ञानीजन अनदेखे, निराकार ईश्वर की अराधना करते हैं और मूर्ती पूजकों का मजाक उड़ाते हैं, वास्तव में उनकी स्थिति कुछ वैसी ही होती है, जैसे कोई सागर को स्वीकार करे पर वर्षा की बूंदों से इनकार करे | सागर के पानी को जल जल माने, लेकिन बूंदों को जल मानने से इनकार करे | लेकिन मैं उनका विरोधी नहीं हूँ क्योंकि मैं उनकी विवशता समझ सकता हूँ | मैं जानता हूँ कि उन्होंने ईश्वर को न जाना है, न देखा है, न समझा है… बस किताबों में पढ़ लिया कि ईश्वर निराकार है और उसे रटकर विद्वान् बन गये |

कई बार विद्वान नास्तिक जन यह प्रश्न करते हैं, “हिन्दू देवी-देवताओं के इतने सारे हाथ पैर सर आदि क्यों होते हैं ?” तब उन्हें कोई ऐसा उत्तर नहीं मिल पाता जिससे उन्हें संतुष्टि हो पाए |

मूर्ती पूजा भी ध्यान, कीर्तन, भजन, हवन आदि की तरह ही सनातन धर्म का ही अंग है | मूर्तियाँ किसी को मूर्ख बनाकर धन ऐंठने के लिये नहीं बनायीं गयीं थीं, बल्कि ईश्वर को समझाने के लिए ही की गयी थी | ठीक वैसे ही जैसे प्रतीकों का प्रयोग करते हैं, जैसे हम ब्लैकबोर्ड, नोटिसबोर्ड का प्रयोग करते हैं, जैसे हम अपने प्रियजनों के तस्वीरों का प्रयोग करते हैं, जैसे हम चित्रों, नक्शों आदि का प्रयोग करते हैं…
लेकिन जैसा कि हर पंथ, मत, सम्प्रदायों के साथ होता है, जैसा कि धर्म ग्रंथों, शास्त्रों के साथ होता आया, जैसा कि संतों, बुद्धों के साथ होता आया ठीक वैसा ही हुआ मूर्तियों के साथ भी | लोगों ने मूर्तियों में छिपे सन्देश को, शिक्षा को समझने में रूचि नहीं दिखाई और उसे सरकारी बाबू बनाकर पूजने लगे, चढ़ावा, रिश्वत, चाय-पानी का खर्चा चढ़ाने लगे | मूर्तियों से अपेक्षा करने लगे कि वे सरकारी बाबुओं की तरह उनकी फरियाद सुनेगा और चढ़ावा लेकर उनकी समस्याएँ सुलझा देगा | पंडितों-पुरोहितों ने भी मंदिरों, तीर्थों को सरकारी दफ्तर बना दिया और खुद को ईश्वर का ऑथोराईज्ड एजेंट समझ लिया | मैंने तो पंडों को यह भी कहते सुना है कि मंदिर अदालत है, ईश्वर जज साहब और हम वकील | जिस प्रकार जज साहब बिना वकील के आपकी फरियाद नहीं सुनेंगे, वैसे ही हमारे बिना ईश्वर भी आपकी फ़रियाद नहीं सुनेंगे |

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लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मूर्तियों को यदि आप समझें तो हर मूर्तियाँ आपको कुछ सन्देश दे रहीं होती हैं | जब आप मूर्ती पर ध्यान केन्द्रित करके, पूरी श्रृद्धा व विश्वास से कोई समस्या रखते हैं या कहते हैं, तब वह विचार यूनिवर्स में उसी प्रकार ब्रॉडकास्ट हो जाता है, जैसे वायरलेस से सन्देश ब्रॉडकास्ट होता है | मूर्तियों में कई हाथ दिखाए जाते हैं, उसका अर्थ केवल यही है कि ईश्वर के कई हाथ हैं और वह किसी भी हाथ से आपकी सहायता कर सकता है | वह हाथ आपके पिता का हो सकता है, आपके मित्र का हो सकता है, आपके किसी सम्बन्धी का हो सकता है या किसी अपरिचित का हो सकता है | मूर्तियों का उद्देश्य उन लोगों को भी आध्यात्मिक शक्ति का अनुभव करवाना था जो लोग ध्यान कर पाने में असमर्थ हैं, जिनमें एकाग्रता नहीं है, जो किसी अनदेखे ईश्वर पर विश्वास कर पाने में असमर्थ थे |

अभी पिछले हफ्ते ही मैं पूरी की यात्रा करके लौटा हूँ | मेरी रूचि नहीं है तीर्थों, मंदिरों में जाने की क्योंकि वहां बैठे एजेंटों का व्यव्हार मेरा मन खट्टा कर देता है | मंदिरों का उद्देश्य होता है कि शांति से कुछ पल आप ईश्वर को अनुभव कर सको वहां, वह सम्भव नहीं होता वहां क्योंकि धक्का मुक्की और पंडों की बदतमीजी सारा आध्यात्म का भुत उतार देता है वहां | तो मैंने तय किया हुआ था कि मैं किसी भी मंदिर आदि नहीं जाउँगा बल्कि प्रकृति का आनंद लूँगा, क्योंकि प्रकृति के सानिंध्य में रहकर मुझे ऐसा अनुभव होता है जैसे मैं ईश्वर की गोद में ही हूँ | मुझे जो सुख व आनंद प्राकृतिक वातावरण में में मिलता है, वह किसी तीर्थ या मंदिरों नहीं मिलता |

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तो मैं किसी मन्दिर आदि जाने के मूड में नहीं था | लेकिन गुरूजी ने जिद किया तो उनके साथ जगन्नाथ मंदिर चला गया | गेट में ही गार्ड्स के बेसुरे स्वर सुनकर मन वहीँ उखड़ गया | फिर जब अंदर दर्शन के समय मैंने पण्डे की थाल में एक रूपये डाल दिया | एक रूपये का सिक्का देख पंडा बिदक गया और बोला, “अरे यह क्या ??? कम से कम सौ-पचास रखो…..!” वह मुझे खरी खोटी सुना रहा था इतनी देर में गुरूजी ने मुझे खींच कर बाहर वहां से हटा लिया | जब हम बाहर निकले तो मेरा मन कोई प्रसाद आदि लेने का भी नहीं था और मैं वहां से जल्द से जल्द निकल जाना चाहता था | हाँ मन में मंदिर निर्माण में जिन लोगों ने मेहनत की, जो कलाकृतियाँ वहां देखने मिलीं, उनके लिए सराहना का भाव अवश्य था लेकिन ऐसा नहीं था कि मैं ईश्वर के पास आया हूँ और मुझे उनसे कुछ माँगना चाहिए… वैसे भी मुझे कोई आवश्यकता है ही नहीं तो मांगूंगा क्या ? जो चाहिए होता है मुझे बिना मांगे ही ईश्वर उपलब्ध करता आ रहा है आज तो सिवाय धन्यवाद् के और क्या कह सकता हूँ उन्हें ? तो हम निकल गये वहाँ से | उसके बाद मैं फिर किसी भी मंदिर आदि में जाने में कोई रूचि नहीं दिखाई और अपने आश्रम पहुँच गये |

दूसरे दिन सुबह ही जगन्नाथ मंदिर का पंडा गुरूजी से मिलने आया और साथ में जगन्नाथ का प्रसाद भी लेकर आया | गुरूजी ने सबसे पहले मुझे प्रसाद दिया अपने हाथों से….. इस प्रकार ईश्वर ने अपनी होने का और मेरे दिए भेंट को स्वीकार लेने की एहसास करवा दिया |

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तो ईश्वर का ही वह हाथ था जो हमारे आश्रम तक प्रसाद लेकर आया, ईश्वर का ही वह हाथ है जो गुरूजी के हाथों के रूप में मुझे प्रसाद दिया…….

जानता हूँ यह सब बातें आप पढ़े-लिखे विद्वानों को पेट पकड़कर हँसने के लिए विवश कर रहीं होंगी | लेकिन यदि आप अपने जीवन में पीछे मुड़कर देखें तो ऐसा कितनी बार हुआ होगा आपके साथ कि किसी विपदा में किसी अपरिचित ने आपकी सहायता की हो, और वह भी बिना कोई कीमत माँगे | कई बात तो ऐसा भी हुआ होगा कि आपको धन्यवाद कहने का अवसर भी नहीं मिला होगा और वह अपरिचित गायब हो गया होगा भीड़ में कहीं |

तो मूर्तियों के इतने हाथ आपको यही समझाने के लिए हैं कि ईश्वर सर्वस्व है और वह किसी भी रूप में किसी के भी हाथ से आपकी सहायता करेगा ही यदि आपने एकाग्र होकर, शांत मन से ईश्वर से सहायता माँगी तब | ईश्वर को आप किस रूप में समझते हैं, मानते हैं… और किस विधि से उसे याद करते हैं, वह सब आपका व्यक्तिगत रूचि व स्वभाव पर निर्भर है… ईश्वर तो केवल उसी सन्देश को ग्रहण कर सकता है जो उसे निश्छल शांत मन से भेजा गया हो | और यही कारण है कि हम भारतीय सनातन धर्म का अनुसरण करते हैं और विविध रूपों, विधियों द्वारा ईश्वर की आराधना करते हैं क्योंकि हम भारतीय ही हैं जो जानते हैं कि ईश्वर ही जगत है और जगत ही ईश्वर है | जो नहीं जानते ईश्वर को वे दूसरे पंथों, मान्यताओं, कर्मकांडों की निंदा में लिप्त रहते हैं और खुद को श्रेष्ठ समझते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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