और ये बहादुर और विद्वान् लोग मुझे सलाह देते हैं कि वेद पढो, शास्त्र पढो….

हम कोई भी धर्म या सम्प्रदाय को लें, सभी एक ही बात कहते हैं केवल नाम बदल जाते हैं | यह सत्य है कि जो खोज ऋषियों ने की और जिस सत्य को जाना उसे उनके बाद आने वाली पीढ़ियाँ संभाल नहीं पायीं | क्योंकि उनके पास पुस्तकें थीं समझने के लिए न कि आध्यात्म | ऋषि जब कोई ज्ञान अपने शिष्य को देता था तब वह शिष्य इस योग्य हो चूका होता था कि वह अपने गुरु की बातों को वैसे ही समझ सके जैसे कि वह कह रहें हैं |

लेकिन पुस्तकों में वह भाव नहीं आ सकता जो प्रत्यक्ष एक गुरु से मिलता है | महर्षि रमण ने कहा था, 

“संशय व भ्रान्ति केवल अनुभवों से दूर होते हैं, धर्मग्रंथो से नहीं | फिर वे चाहे सैंकड़ों ही क्यों न पढ़ लिए जाएँ |”

तो लोग विद्वान् तो हो गये शास्त्रों को रटकर, लेकिन आध्यात्म से चूक गये | वे चूक गए की वास्तव में अर्थ क्या था | आज भी शास्त्रों में लिखे श्लोकों को लोग अपने अपने तरीके से परिभाषित कर रहें हैं | सदियों से ‘ढोर, गँवार , शुद्र अरु नारी, सभी ताड़न के अधिकारी’ को लेकर शोषण करते रहे और शोषित होते रहे | अब कहते हैं कि ‘ताड़न’ अवधि भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है जानना | अब दिल्ली में ताड़ने का अर्थ कुछ और निकलता है और मध्यप्रदेश में कुछ और |

तो जो शुद्ध हिन्दू धर्म था वह वैसा नहीं रहा होगा जैसा कि आज बन गया है या उस समय था जब बुद्ध और महावीर को अवतार लेना पड़ा था हिन्दुओं से पृथक पंथ बनाने के लिए | क्योंकि तब उपद्रव अधिक बढ़ गया था | तब हिंसा बहुत ही रहा होगा इसलिए लोगों को बुद्ध और महावीर का मार्ग सही लगा था, जबकि आज की स्थिति बिलकुल विपरीत हो गयी है | तब प्रत्येक छात्र को युद्ध कला और आत्मरक्षा के उपाय सीखना अनिवार्य था लेकिन आज व्यवसाय और नौकर बनने की कला को अनिवार्य माना जाता है |…

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निर्वाण शब्द का बुद्ध ने प्रयोग किया जिसका मैंने अर्थ निकाला साक्षी हो जाना अर्थात दृष्टा बन जाना, हो सकता है मैं गलत होऊं | बुद्धिजीवी मानते हैं कि यह अभी तक किसी को प्राप्त नहीं हुआ है और जिसे प्राप्त होगा वे बता नहीं पायेंगे क्योंकि उनकी मृत्यु हो चुकी होगी | निर्वाण का अर्थ नीचे दे रहा हूँ जो इस प्रकार है:

निर्वाण का सटीक अर्थ है- ज्ञान की प्राप्ति- जो मन (चित्त) की पहचान को खत्म करके मूल तथ्य से जुड़ाव पैदा करता है. सैद्धांतिक तौर पर निब्बाण एक ऐसे मन को कहा जाता है जो “न आ रहा है (भाव ) और न जा रहा है (विभाव )”, और उसने शाश्वतता की स्थिति को प्राप्त कर लिया है, जिससे “मुक्ति” (विमुक्ति ) मिलती है.
स्थिरता, शीतलता और शांति भी इसके अर्थ हैं.

लेकिन अब इसे भी वैसा ही दुर्गम मान लिया गया है जैसे कि मोक्ष या ब्रम्हज्ञान की प्राप्ति | दुनिया भर के आडम्बर इसमें भी जुड़ गए होंगे कि यह नहीं किया तो ऐसा और यह नहीं किया तो वैसा |

सर्वधर्म समभाव की बात करो लोग कायर कहते हैं और जो धर्म के रक्षक बने हुए हैं उनके लिए निहत्थों, मासूमों की हत्या और स्त्रियों और बच्चियों से बलात्कार बहादुरी की बात हो गयी है | जबकि हिन्दू धर्म में निःशस्त्र, लाचार और स्त्रियों-बच्चों पर हाथ उठाना भी योद्धा और वीर के लिए शर्म की बात होती थी | क्या यही है हिन्दू संस्कृति ? और यदि युद्ध करने का ही शौक है तो ललकारो अपने शत्रुओं कि आओ मैदान में और बुला लोग किसी ऐसे स्थान पर जहाँ कोई निर्दोष का घर न जले, किसी स्त्री की इज्ज़त न लुटे, कोई मासूम न मारा जाए | जैसे महाभारत युद्ध हुआ था | काहे को शहरों के भीतर दंगा मचाकर बहादुर बनते फिर रहे हो ? हिन्दू हों या मुस्लिम, घर तो दोनों का जलता है |

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और ये बहादुर और विद्वान् लोग मुझे सलाह देते हैं कि वेद पढो, शास्त्र पढो….

जितनी आवश्यकता थी मैंने पढ़ ली और जितना समझा बहुत है | न विद्वान् बनने में कोई रूचि है मेरी और न ही ज्ञानी बनने में | प्रयास है कि मानव के रूप में जन्म लिया था तो मानवता निभाते हुए मानव के रूप में ही मुक्ति पाऊं | –विशुद्ध चैतन्य

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