मनुष्य की सबसे बड़ी भूल

“सभी मनुष्य सदा सुख चाहते हैं, दुःख से अछूता सुख…यह सहज वास्तविक प्रवृति है | परन्तु उन्हें सबसे अधिक प्रेम अपने आप से होता है | वे किसी न किसी उपाय से , मद्य से धर्म से सुख पाना चाहते हैं….मनुष्य का वास्तविक स्वभाव सुख है | उसकी सुख की खोज अचेतन रूप से अपनी आत्मा की खोज है | ‘मैं’ के सूत्र का मनसा अनुसरण करते हुए यदि तुम उस स्त्रोत तक पहुँच सको तो तुम पाओगे कि जिस तरह ‘मैं’ भाव सबसे पहले प्रकट होता है, उसी तरह सबसे अंत में लुप्त होता है…. “सभी मनुष्य सदा सुख चाहते हैं, दुःख से अछूता सुख…यह सहज वास्तविक प्रवृति है | परन्तु उन्हें सबसे अधिक प्रेम अपने आप से होता है | वे किसी न किसी उपाय से , मद्य से धर्म से सुख पाना चाहते हैं….मनुष्य का वास्तविक स्वभाव सुख है | उसकी सुख की खोज अचेतन रूप से अपनी आत्मा की खोज है | ‘मैं’ के सूत्र का मनसा अनुसरण करते हुए यदि तुम उस स्त्रोत तक पहुँच सको तो तुम पाओगे कि जिस तरह ‘मैं’ भाव सबसे पहले प्रकट होता है, उसी तरह सबसे अंत में लुप्त होता है…. मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह सोचना है कि वह स्वभावतः दुर्बल है, स्वभावतः दुष्ट है | प्रत्येक मनुष्य अपने वास्तविक स्वभाव में दिव्य व शक्तिशाली है | दुर्बल व दुष्ट उसकी आदतें व इच्छाएं हैं, उसके दीवार हैं, वह स्वयं नहीं |” ~महर्षि रमण 

 बहुत आश्चर्य होता है कि जिन्होंने सत्य को जाना वे सभी श्रद्धेय हो गये और उनके ढेरों अनुयाई बन गये, लेकिन उनके दिखाए मार्ग पर चल नहीं पाए | न ही उनकी शिक्षाओं को जीवन में उतार ही पाए… उलटे उनकी पूजा अर्चना में लग गये | गौतम बुद्ध, ईसा मसीह, महावीर, महर्षि रमण, स्वामी विवेकानन्द, ठाकुर दयानंद देव, ओशो….. आदि सभी एक ही शिक्षा दे रहे थे, लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोई उनकी शिक्षा को व्यवहार में ला रहा है |

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ओशो की देशना में भी लोगों को सेक्स में ही रूचि रही है और उससे ऊपर उठ नहीं पाए | न जाने कितनी पुस्तकें उनकी आयीं और कितने उपदेश उन्होंने दिए, लेकिन लोग ‘सम्भोग से समाधी’ नामक पुस्तक पर ही अटक कर रहा गये और उसमें भी समाधी छोड़ कर सम्भोग से चिपक गये | अपनी मानसिकता, अपनी कुंठा, अपनी वासना से ऊपर उठ नहीं पाए, लेकिन ओशो को बदनाम करके खुद के पाप छुपाने का कुत्सित प्रयास करने से भी नहीं चूके |

महर्षि रमण ने एक जगह एफ़० एच० हम्फ्रीज़ के एक प्रश्न के उत्तर में कहा, “धर्म… वह चाहे ईसाई हो, बौद्ध हो, हिन्दू हो या थियोसोफी या कोई अन्य मत, पंथ या सम्प्रदाय, हमें केवल उस बिंदु तक ही ले जा सकता है, जहाँ सभी धर्म मिल जाते हैं, उससे आगे नहीं | वह बिंदु है इस तथ्य को समझ लेना कि ‘ईश्वर हर चीज है और हर चीज ईश्वर’ | परन्तु ईश्वर की इस सर्वव्यापकता के इस तथ्य को केवल बुद्धि से ही नहीं समझ लेना है, परन्तु सतत अभ्यास से प्रत्यक्ष अनुभव भी करना है |”

मैं अपने जीवन में जो जाना समझा वह यह कि धर्मों के नाम पर जो भी अनाचार, अत्याचार हो रहा है, वह वास्तव में ठेकेदारों और उनके चमचों के कारण ही हो रहा है | बुद्धजनों, श्रेष्ठ आत्माओं, व जाग्रत मानवों ने कभी भी कहीं भी दूसरों को कष्ट या दुःख देने की देशना नहीं दी और न ही उन्होंने स्वयं उसे अपने आचरण में ही उतारा | इसलिए हमें चाहिए कि ऐसे धार्मिक संगठनों, ठेकेदारों, धर्मगुरुओं को महत्व देना बन दें, जो केवल नफरत के कारोबार में लिप्त हैं | ये लोग बुद्ध जनों, श्रेष्ठ आत्माओं और ईश्वर के नाम पर हमें आपस में लड़वाते हैं क्योंकि हम स्वयं इतने विवेकवान नहीं है कि सही और गलत को समझ सकें | हमारी इसी बुद्धिहीनता का ही ये लोग लाभ उठाते हैं और अपना राजनैतिक व व्यापारिक उद्देश्य पूरा करते हैं हमारी ही चिताओं और लाशों से | यदि हम उन गुरुओं और उनकी देशना को सही रूप से समझें और उसके अनुसार आचरण करें तो ऐसे सभी ठेकेदार और मूर्ख धर्मगुरुओं की दुकानें बंद हो जायेंगी जो साम्प्रदायिकता के दम पर ही जीवित हैं | हमें स्वयं ही जागना होगा, किसी जगाने वाले की प्रतीक्षा में सोये रहना बेवकूफी ही होगी | ~विशुद्ध चैतन्य

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