वास्तव में कोई समस्या है ही नहीं भारत में

मुझसे पहले कितने शायर
आए और आकर चले गए
कुछ आहें भर कर लौट गए
कुछ नग़मे गाकर चले गए
वो भी एक पल का किस्सा था
मैं भी एक पल का किस्सा हूँ
कल तुमसे जुदा हो जाऊँगा
वो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ
मैं पल दो पल का शायर हूँ …

कल और आएंगे नग़मों की
खिलती कलियाँ चुनने वाले
मुझसे बेहतर कहने वाले
तुमसे बेहतर सुनने वाले
कल कोई मुझको याद करे
क्यूँ कोई मुझको याद करे
मसरूफ़ ज़माना मेरे लिये
क्यूँ वक़्त अपना बरबाद करे
मैं पल दो पल का शायर हूँ …

साहिर लुधियानवी जी का लिखा और मुकेश जी का गया यह गीत एक ऐसी वास्तविकता है, जिसे शायद गौतम बुद्ध ने सबसे बेहतर समझा व जाना था | दुनिया अपनी ही चाल चलती है, उसे केवल अपने से ही मतलब होता है | मेरा परिवार, मेरा घर, मेरे बच्चे, मेरा धर्म…. बस ! उससे आगे की कोई सोच होती ही नहीं है |

अक्सर देखता हूँ राजनीती में चर्चा करने वालों को, तो वे भी अपने नेताओं के गुणगान में ही व्यस्त रहते हैं | जब उनका नेता कहता है, महँगाई डायन है तो उनके लिए भी महँगाई डायन हो जाती है और सहन से बाहर हो जाति है | लेकिन जैसे ही उनका नेता कहता है महँगाई ही विकास है, सभी के लिए महँगाई अमृत के समान सुखदाई हो जाती है | उनका नेता कहता है कि एफडीआई आई देश के लिए घातक है तो नाम एफडीआई नाम से ही इतनी चिढ हो जाती है कि सड़कों पर निकल आते हैं | लेकिन जैसे ही उनका नेता कहता है कि एफडीआई ही विकास है, तो हर को दुनिया भर के तर्क देकर सिद्ध करने लगता है कि एफडीआई न हुई तो देश का भट्टा बैठ जाएगा |

तो इस प्रकार हम देख पाते हैं कि वास्तव में भारत में कोई समस्या है ही नहीं, सिवाय नेताओं के बयानों के | नेता यदि कह दें कि देश में गरीबी और बेरोजगारी है ही नहीं, तो भक्त सिद्ध कर देंगे | नेता यदि कह दें कि इस देश का किसान और आदिवासी, बिलगेट और जुकरबर्ग से भी अधिक अमीर हैं और अत्याधिक लक्ज़री लाइफ से तंग आकर आत्महत्या करते हैं या नक्सली बनते हैं, तो भक्त सिद्ध कर देंगे कि उनके नेता सच कह रहे हैं |

शायद यही कारण है कि हम लोग सामाजिक, आर्थिक विकास व आत्मनिर्भरता जैसे विषयों से अधिक धार्मिक वैमनस्यता फ़ैलाने वाले विषयों पर अधिक रूचि लेते हैं | हाल ही मैं हम ईराक और सीरिया में हुए अप्रत्याशित विकास से इतने प्रभावित है कि नफरत और ज़हर का कारोबार में दिल खोल कर सहयोग कर रहे हैं | पूरी तरह से कोशिश हो रही है कि धर्म और जाति के नाम पर हम भी शिया-सुन्नी की तरह लड़मरे, ताकि अमेरिका, ब्रिटेन, रशिया भी भी निःशुल्क हमारे देश में भी उसी प्रकार जन्नत और स्वर्ग के टिकट गिराएं, जैसे वहाँ गिरा रहे हैं | वहां की तस्वीरें और विडियो देखकर धर्मों के ठेकेदार इतने उत्साहित हैं कि उन्हें लग रहा है कि हम भारतीय कहीं स्वर्ग और जन्नत के प्लाट लेने से चूक न जाएँ | वास्तव में वे हमारा भला ही चाहते हैं, तभी पूरे जी जान से नफरत फ़ैलाने में लगे हुए हैं | वे चाहते हैं कि ईराक और सीरिया के लोग स्वर्ग और जन्नत के प्लाट पर कब्ज़ा करके हमें ही महँगे दामों में बेचे, उससे पहले हम भारतीय वहाँ पहुँच जाएँ | हम जितने देर से वहाँ पहुँचेंगे, उतने ही घाटे में रहेंगे…..

तो यह सब तब भी चल रहा था जब गौतम बुद्ध जिन्दा थे….बस तब शायद इस्लाम का आगमन नहीं हुआ था भारत में लेकिन जात-पात, ब्राह्मण-शूद्रो, शैव-वैष्णव जोर-शोर से प्रतिस्पर्धा में लगे हुए थे और अब हिन्दू-मुस्लिम भी शामिल हो गये, भारतीय पट्टा लटका कर | बुद्ध ने जाना कि धर्म और स्वर्ग के मामले में हस्तक्षेप करना ठीक नहीं है | उन्हें पता था कि जाना तो उन्हें भी वहीं हैं और वहां जाने के बाद यही लोग मिलेंगे और कहें कि आपके ही भाईचारे, प्रेम आदि के मुर्खता पूर्ण उपदेशों के कारण ही हमें महंगे दामों में प्लाट लेने पड़े… वहां भी ये धार्मिक लोग उनको चैन से जीने नहीं देते… इसलिए वे मौन हो गये |

लेकिन मैंने तय कर लिया है कि मैं स्वर्ग नहीं जाउँगा और न ही जन्नत जाने का कोई इरादा है | आप लोगों को ही मुबारक हो स्वर्ग और जन्नत… मैं तो नर्क में ही जाऊँगा…. क्योंकि वहाँ जितनी शांति होगी, वह शायद स्वर्ग में मिल पाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती | जरा सोचिये ये ही धर्म-गुरू, नफरतों के सौदागर, फिदायीन, घोटालेबाज नेतागण और उनके चमचे…. सभी स्वर्ग में ही मिलेंगे… और वहां भी वही सब हो रहा होगा जो यहाँ हो रहा है और ऊपर से भूमाफिया और एफडीआई के समर्थक दादागिरी दिखा रहे होंगे….. अरे नहीं भाई, मुझे तो स्वर्ग जाने का ख्याल सपने में भी आ जाता है तो मैं नींद से ऐसे जाग उठता हूँ, जैसे कोई भयानक सपना देखा हो | सारा शरीर पसीने से तरबतर हो जाता है और साँसे बड़ी तेज तेज चलने लगतीं हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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