कुछ प्रश्न विद्वानों से

१. हम राम-राम ही क्यों करते हैं, विष्णु-विष्णु, ब्रम्हा-ब्रम्हा या शिव-शिव क्यों नहीं ?

२. हम अवतारों को वास्तविक ईश्वर से अधिक महत्व क्यों देते हैं ?
३. जब साक्षात नारायण सूर्य प्रतिदिन हमें दर्शन देते हैं, तो फिर ईश्वर के दर्शन के लिए मंदिरों में ही क्यों जाना होता है ?

४. यह कैसा विकास किया हमने कि साक्षात ईश्वर के होते हुए भी हमने अपने अपने बनाए भगवानों और मान्यताओं को पूजना और उनके नाम पर लड़ना झगड़ना और व्यापार करना शुरू कर दिया ?५. सभी मिलकर एक राष्ट्र ‘भारत’, एक नागरिकता ‘भारतीय’, एक धर्म ‘राष्ट्रहित’, एक प्रत्यक्ष ईश्वर ‘सूर्य’ और एक मन्त्र ‘गायत्री-मन्त्र’ के सिद्धांत का अनुसरण क्यों नहीं करते | हमने आपस में लड़ने-मरने के लिए अलग अलग ईश्वर और धर्म क्यों बना रखें हैं ?  

मैं सूर्य को प्रत्यक्ष ईश्वर कहता हूँ तो केवल इसलिए क्योंकि वह जीवनदायी है | यदि सूर्य न हो तो न हिन्दू बचेगा न मुसलमान बचेगा | यह तो विज्ञान भी प्रमाणित कर चुका है, कि सूर्य के प्रकाश में कई विटामिन होते हैं हो, जो सामान्य भोजन में नहीं मिल पाते लेकिन वे शरीर के लिए आवश्यक होते हैं | रोज सुबह सूर्य के दर्शन से आँखों और त्वचा के रोगों से मुक्ति मिलती है |
सूर्य से लाभ:
स्थूल शरीर में सूर्य की किरणें आरोग्य, तेज, बल ,स्फूर्ति, ओज ,उत्साह,आयुष पुरषार्थ बलवर्धन करती हैं | शरीर के समस्त अंग-प्रत्यंग सविता की किरणों द्वारा लाभान्वित होते हैं। सभी परिपुष्ट और क्रियाशील बनतें हैं।
सूक्ष्म शरीर मस्तिष्क प्रदेश में उसका प्रवेश बुद्धि, वैभव व प्रज्ञा उत्साह, स्फूर्ति, प्रफुल्लता, साहस, एकाग्रता, स्थिरता, धेर्य, संयमअनुदान की वर्षा करता है।
कारण शरीर यानि ह्रदय प्रदेश में भावना, श्रद्धा, त्याग, तपस्या, श्रद्धा, प्रेम,उपकार,विवेक,दया और विश्वास और सद्भावना की वृद्धि करता है।
अंधकार रूपी विकार , इस प्रकाश से तिरोहित होता है, व्यक्तित्व निखरता है और स्थूल शरीर को ओजस, सूक्ष्म शरीर को तेजस और कारण शरीर को वर्चस्व उपलब्ध होता है।

गायत्री मंत्र:- ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

गायत्री मन्त्र भी किसी सम्प्रदाय या पंथ विशेष से नहीं जुड़ा हुआ है और न ही किसी सम्प्रदाय या पंथ विशेष को इस मन्त्र को स्वीकारने में आपत्ति होनी चाहिए | गायत्री मन्त्र में ईश्वर से यही माँगा है की -प्रभु आपने हमें मानव शरीर देकर अनुकम्पा की है | अब मानव बुद्धि देकर हमें उपकृत और कर दीजिये ताकि हम सच्चे अर्थों में मनुष्य कहला सकें और मानव जीवन के आनंद का लाभ उठा सके।
गायत्री मन्त्र से परमात्मा की स्तुति, ध्यान और प्रार्थना का समावेश है। इस प्रकार एक ही मन्त्र में उक्त बातों का समावेश किसी अन्य मन्त्र में नहीं मिलता है। छंद का नाम गयात्री होने के कारण इस मन्त्र का नाम गायत्री रखा गया है। गायत्री का मूल सम्बन्ध सविता यानि सूर्य से है | सूर्य के उदय होने पर लोक में प्रकाश होता है और अन्धकार का विनाश होता है। सविता यधपि सूर्य को ही कहा जाता हैं लेकिन उसमें वही अंतर है जो आत्मा और शरीर में है।
मन्त्र विज्ञान में शब्द शक्ति का प्रयोग है। मन्त्र के अक्षरों का अनवरत जप करने से उसका एक चक्र बन जाता है और उसकी गति सुदर्शन चक्र जैसी गति विद्युत चमत्कारों से परिपूर्ण होती है। मन्त्र शब्द बेधी बाण की तरह काम करते हैं। जो अभीष्ट लक्ष्य को बेधते हैं। गायत्री मन्त्र में गायत्री छंद , विश्वामित्र ऋषि और सविता देवता हैं।श्रुति में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। उसी से प्राण प्रादुर्भाव होता है। जिसके कारण प्राणियों का शरीर धारण करना, वनस्पतियों का उगना, पञ्च तत्वों का सक्रिय होना संभव है।
मानव शरीर 24 तत्व विशेष का बना होता है। चेतन्य, आत्मा, मन , बुद्धि, ष्ट धातु, पञ्च ज्ञानेद्रियाँ , पञ्च कर्मेन्द्रिया और पञ्च महाभूत |
गायत्री मन्त्र के 24 अक्षरों का गुंथन इस प्रकार जुड़ा हुआ है की उसके उच्चारण से जिह्वा, मुख, तालू की ऐसी नाड़ियों का क्रमबद्ध सञ्चालन होता है की जिसके कारण शरीर के विभिन भागों में स्थित यौगिक चक्र जागृत होते हैं। जैसे कुंडली जागरण से सप्त चक्र जागृत किये जातें हैं वैसे ही गायत्री के उच्चारण मात्र से लघु ग्रंथियों को जागृत कर आश्चर्यजनक सकारात्मक परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।
जो धर्म, सम्प्रदाय और पंथ सहयोगी न हो, जो धर्म, सम्प्रदाय और पंथ द्वेष की भावना जागृत करता हो, जो धर्म निर्दोषों की हत्या और स्त्रियों पर अत्याचार करवाता हो, वह मानवीय धर्म तो ही ही नहीं सकता | ~विशुद्ध चैतन्य

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