हनुमानभक्त मुंशी खां

इकबाल आज नहीं हैं लेकिन उनकी ये पंक्तियां भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा के सराय आजिमाबाद मोहल्ले में जीवंत हैं। धर्मांतरण को लेकर आज मुल्क में जो नफरत फैलाने की कोशिश हो रही है उसे अलौकिक प्रेम की नगरी के मुंशी खां की अनूठी इबादत बौना साबित करती है। रोजाना पांच वक्त की नमाज और शाम को बजरंगबली का स्मरण करने वाले मुंशी हकीकत में इंसानियत की नौका लेकर शांति और भाईचारे की लहर पर सवार हैं।
हाईवे के समीप बसे munshi-khan-548b51a731145_exlstमोहल्ले में रहने वाले मुंशी मजदूर के किरदार में अपने घर में नजर आते हैं। वे इंसानियत असल पैरोकार हैं और बंदिशों से बेफिक्र हो कहते हैं कि यह हनुमानजी का आदेश है। मुंशी बताते हैं कि एक रोज नमाज पढ़कर लौटा तो आंख लग गई। स्वप्न में हनुमानजी आए तो मैंने पूछा कि मैं मुसलमान हूं तुम मेरे पास क्यों आए हो। इसके बाद सपने में हनुमानजी बोले कि मैंने तो सबको इंसान बनाया है, बांटने का काम तो तुम लोगों ने खुद किया।
मुंशी खां भावुक होकर बताने लगे कि उसके बाद से उनका हर काम अच्छा होने लगा। वह शहर के भैंस बहोरा इलाके से बजरंगबली की मूर्ति लेकर आए और अपने घर के पास दो माह पहले मूर्ति स्थापना करा दी। तब से लेकर आज तक उनकी हर सांझ मूर्ति के समक्ष दीया जलाने के साथ ही रौशन होती है। वे बजरंगबली को समय समय पर चोला भी चढ़ाते हैं। घरवालों की रजामंदी के सवाल पर मुंशी खां कहते हैं कि हमें कोई भी मजहब बैर करना नहीं सिखाता। हमारे फैसले से परिवार खुश है। हम तो इंसानियत के पुजारी हैं और मजदूरी करके रोजीरोटी चलाते हैं।
मुल्क को 1947 में बंटवारे का जख्म लग रहा था, मुंशी खां की पैदाइश तब की है। वह कहते हैं कि हम किसी प्रतिक्रिया की फिक्र नहीं करते। हम तो मजदूर हैं। 67 की उम्र में भी तो मजदूरी करने चले जाते हैं और 100-200 कमाकर ही लाते हैं। उन्होंने कहा कि इंसानियत का पैगाम देना ही उनकी जिंदगी का मकसद है।

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