वास्तविक धर्मयुद्ध

वर्तमान जो स्थिति है, उसके अनुसार तो भारत में एकता कभी हो ही नहीं सकती | स्वतंत्रता से पहले तो राष्ट्रधर्म ने सभी को एकजुट कर दिया था अंग्रेजों के विरुद्ध लेकिन ईश्वर और अल्लाह के बनाये धर्मों ने राष्ट्र को खंडित कर दिया | इससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर और अल्लाह के बनाये धर्म एकता का पाठ नहीं पढ़ाता और आपस में एक दूसरे की निंदा और द्वेष का मार्ग दिखाता है | इसलिए धर्म तो राष्ट्र में एकता होने नहीं देगा |
लेकिन अधर्म ही एक ऐसा है जो एकता में न केवल विश्वास करता है, बल्कि व्यवहार में भी लाता है | जैसे भ्रष्टाचारी कोई भेदभाव नहीं करते, अपराधी कोई भेदभाव नहीं करते, हत्यारे कोई भेदभाव नहीं करते, बलात्कारी कोई भेदभाव नहीं करते | अधर्म तो अपने पराये, स्त्री-बच्चों में भी कोई भेद नहीं करता और सभी के साथ समान व्यवहार करता है | जबकि सभी धर्म न केवल दूसरे धर्मों के साथ भेदभाव करते हैं, आपस में भी भेदभाव करते हैं | इतने सारे धर्म और पंथों के होते हुए, सभी एकजुट होकर अधर्म के विरुद्ध आवाज भी नहीं उठा सकते, क्योंकि अधर्म के पास एकता की शक्ति है और धर्म खंडित मानसिकता के साथ अपने अपने कम्बलों में दुबका लोगों को जनेऊ-टोपी पहना रहा है | धर्म को न राष्ट्र की चिंता है और न ही राष्ट्रवासियों की, उसे तो बस अपने रंग और चश्में वालों को अपने अपने बाड़े में लाने में रूचि है | फिर चाहे खिलाने के लिए दाना न हो अपने पास, फिर चाहे भूख और बीमारी से कोई मरता हो, फिर चाहे बच्चों के लिए स्कूल हों न हों….लेकिन सभी अपने अपने समूह को बड़ा करने में लगे हुए हैं |
आशंका इस बात की है कि शीघ्र ही एक और महाभारत होगा और यह महाभारत वास्तविक धर्म-युद्ध होगा | क्योंकि यह युद्ध केवल धार्मिकों के बीच ही लड़ा जाएगा | पिछले महाभारत में तो धर्म और अधर्म के बीच युद्ध हुआ था, लेकिन आज तो अधर्म के विरुद्ध कोई भी नहीं है और सभी धर्मों की अधर्म से मित्रता है | इसलिए अधर्म इस युद्ध में सभी धर्मों के साथ अपनी मित्रता निभाएगा और सभी धर्मों को हथियारों की सप्लाई करके नोट छाप रहा होगा | वैसे अभी भी सभी राष्ट्र हथियारों के विकास पर राष्ट्र की समृद्धि व विकास से अधिक महत्व देते हैं |-विशुद्ध चैतन्य

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