डीफोरेस्टिंग के बाद अब डीपापुलेशन……

Depopulationपहले हमने जंगल उजाड़ दिए, फिर खेतों को बंजर कर दिए, जिसके कारण चार सौ से अधिक वन्य प्राणी लुप्त हो गये सौ वर्षों में | अब बारी आ गई मानवों की… अब मानवों की कौन कौन सी प्रजातियाँ लुप्त होंगी और पहले किस प्रजाति का नामों निशाँ मिटेगा यह देखने वाली बात है |
वैसे मूल रूप से हम मानवों की कितनी प्रजातियाँ हैं ?

आप लोग पढ़े-लिखें हैं तो आप लोग बेहतर जानते होंगे, (मैं अपनी राय अभी यहाँ रख देता हूँ | गलत हुआ तो आप लोग सही क्या है वह बता दीजियेगा )
मेरी राय में पाँच प्रमुख प्रजाति हैं, १-हिन्दू, २-मुस्लिम, ३-ईसाई, ४-सिख, ५-बौद्ध | मुस्लिमों ने तो आपस में ही मार काट मचा रखी है मध्य एशिया में | भारत में हिन्दू-मुस्लिम तलवारें ताने खड़े हैं | बौद्धों ने चाइना और बर्मा में आबादी कम करनी शुरू कर दी |
यह तो हुए धार्मिकों की प्रजाति | अब आते हैं मानवों की और प्रमुख प्रजाति के विषय में जान लें | एक हैं किसान प्रजाति जो खेती करते हैं और अन्न उपजाते हैं और दूसरी हैं अम्बानी अदानी प्रजाति जो नौकरी देती हैं, कारखाने खुलवाती है, लोगों को फोन, पेट्रोल आदि सुविधायें बेचती है | तो किसानो की प्रजाति भी भारत में लुप्त होने के कागार में पहुँच गयी, क्योंकि हर किसान अब नौकर बनना चाहता है | किसानी में भुखमरी और आत्महत्या के सिवा कुछ और बचा नहीं है | तो अगले तीस सालों में किसान भी इतिहास बन जायेंगे |
अब आगे और भी प्रजातियाँ हैं, आदिवासी हैं… खैर ये तो कुछ ही सालों में नक्सलवादी झगड़ों में मिटा दिए जायेंगे तो इनके विषय में कुछ सोचने की आवश्यकता नहीं है | शायद यही प्रजाति सबसे पहले लुप्त होगी उसके बाद किसान होंगे |
फिर दवा कम्पनियाँ और डॉक्टर भी आबादी कम करने में बहुत योगदान दे रहे हैं, इलाज करवाने के नाम पर ही लोगों के घर बार बिक जाते हैं तो वे भी बेचारे कितने दिन ठीक होने के इंतजार में जी पायेंगे ?
फिर धर्मों के ठेकेदार दंगे आदि से भी आबादी कम करने में योगदान दे रहे हैं….. और हम समझते हैं कि ये लोग दुश्मन हैं मानवता के | अरे यही लोग तो असली शुभचिंतक हैं मानवता के | जितनी तेजी से लोगों को आपस में लडवा कर मरवा दिया जाए, उतना ही सृष्टि को लाभ मिलेगा | फिर इस देश में केवल अमीर और सभ्य धार्मिक लोग ही रह जायेंगे और कोई किसान नहीं रह जाएगा विरोध करने के लिए | जहां चाहे ये लोग अपनी फैक्ट्री लगा पाएंगे और जितनी चाहे उतने स्विस बैंक में अकाउंट खोल पायेंगे | नोटों से नहायेंगे, नोट ही खायेंगे क्योंकि न जंगल रहेंगे, न खेत रहेंगे, न किसान रहेंगे न आदिवासी रहेंगे…. बस स्वर्ग बन जायेगी पृथ्वी | ~विशुद्ध चैतन्य
#Depopulation
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