इसका मतलब यह नहीं कि हमारा सम्प्रदाय बुरा हो गया…

कभी कभी ऐसा लगता है, पढ़े-लिखों और धर्म-भीरुओं में कोई अंतर नहीं है | दोनों को अपने अपने पुस्तकों में बहुत विश्वास है और दोनों ही पुस्तकों से बाहर की दुनिया से अनजान हैं | हर सम्प्रदाय के लोगों को अपने अपने ग्रंथों और मान्यताओं के गुणगान सुनने लत है, और लत इस हद तक बढ़ चुकी है जैसे कि शराबी या स्मैकिया को सिवाय नशे के कुछ और बात समझ में नहीं आती | कितना भी समझाओ कि नशे के कारण परिवार बर्बाद हो रहा है, स्वास्थ्य खराब हो रहा है, दुनिया में बदनामी हो रही है….. लेकिन सब बेकार !

मुस्लिम सफाई दे रहे हैं कि हमारे धर्म में शान्ति और भाईचारा का पाठ लिखा है, लेकिन वहीँ अलकायदा और आइसिस सिद्ध कर रहे हैं कि मुस्लिम जो कह रहे हैं वह झूठ है | हिन्दू कह रहे हैं कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ ‘सर्वधर्म समभाव’ व ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखायः’ जैसे पाठ केवल हमारे ही धर्म ग्रन्थों में लिखे हैं….. लेकिन वहीँ दिन भर ‘परधर्म निंदा परम सुखं’ के सिधांत पर आधारित हिन्दू संगठनों और उनके समर्थकों के वक्तव्यों से सारी बातें झूठी सिद्ध हो जाती हैं |

हर सम्प्रदाय के पास अपने बचाव के लिए एक रटा हुआ डायलोग है कि “बुराई तो हर जगह है, हर सम्प्रदाय में है | इसका मतलब यह नहीं कि हमारा सम्प्रदाय बुरा हो गया… हमारे शास्त्रों में तो लिखा है…… प्रेम-प्यार…….भाईचारा…..अहिंसा…..दुखियों कि सहायता करो……..

सब बकवास….. सब धंधा….वास्तविकता से परे हैं और केवल किताबों में लिखे हैं और वह भी रट्टा मारने के लिए ताकि लोग ज्ञानी समझें |

READ  एक दाँव और बदमाश चित्त

डिग्रीधारियों को भी भ्रम है कि वे वैज्ञानिक रूप से चीजों को समझते हैं और जानते हैं, इसलिए वे अधिक ज्ञानी हैं…. लेकिन यही डिग्रीधारी लोग सड़क किनारे बैठे उस बच्चे के सामने बौने हो जाते हैं जो उनकी गाड़ी में पंचर लगाता है | यही डिग्रीधारी लोग बौने हो जाते हैं उस चायवाले छोटू के सामने जिसके हाथ की चाय पीकर नौकरी न मिल पाने और बेरोजगारी के लिए सरकार को कोसते हुए घंटों समय काटते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of