पंडितों पुरोहितों को तो पहले ही संन्यास की समझ नहीं है

यह समझ लेना चाहिए सभी को कि कोई भी सन्यासी या साधू जब तक वर्ण-भेद, धर्म-भेद व जाति भेद से मुक्त नहीं होता वह सन्यासी या साधू नहीं हो सकता | आज जब साधू सन्यासियों को भेदभाव भरी संकीर्णता में देखता हूँ तो दुःख होता है कि इन लोगों ने अपना जीवन ही व्यर्थ कर दिया | न तो ईश्वर को खोज पाए और न ही स्वयं को खोज पाए, रह गये वहीँ के वहीँ पंडित पुरोहितों और कर्मकांडों के घेरे में ही | बस गेरुआ डाल लिया और पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो गये तो समझ लिया कि सन्यास प्राप्त कर लिया | किसी ने बीजमंत्र फूँक दिया कान में और सन्यास के कुछ कर्मकांड कर लिया तो समझ लिया कि संन्यासी हो गये | साधू समाज ने उसे संन्यास की डिग्री दे दी तो हो गये सन्यासी…..

अरे घर से भाग जाना संन्यास है क्या ? विवाह न करना संन्यास है क्या ?

सन्यास एक संकल्प है जो निरंतर आपके भीतर गूंजते रहना चाहिए | एक संगीतकार को भी आप संन्यासी कह सकते हैं क्योंकि निरंतर उसके भीतर संगीत ही गूंजता रहता है | उसे न खाने की सुध होती है और न पीने बस संगीत ही उसका जीवन हो जाता है |

शास्त्रों में चार आश्रमों में सन्यास आश्रम को अधिक महत्व दिया गया क्योंकि वह ऐसा समय होता है जब व्यक्ति अपनी जीवन को सम्पूर्णता से जी चूका होता है, लेकिन आज सन्यास कम उम्र में ही लोग ले लेते हैं | जीवन को भोग नहीं पाते और तृष्णा बची रहती है तो संन्यास उनके लिए केवल एक समाज ही होता है | वह यही नहीं समझ पाते कि संन्यास का मूल उद्देश्य क्या है | पंडितों पुरोहितों को तो पहले ही संन्यास की समझ नहीं है तो वे क्या ख़ाक समझायेंगे सन्यास को | परिणाम यह होता है कि ये सन्यासी साधू आदि समाज के लिए मात्र एक अकर्मण्य परजीवी से अधिक सिद्ध नहीं होते | कुछ लोग जो प्रवचन आदि करते हैं, या लेखन आदि से समाज को कोई दिशा देने का प्रयास करते हैं, वे ही वास्तव में सन्यास का सही मायने में पालन कर रहे होते हैं |

READ  लेकिन हम (हिन्दू-मुस्लिम) लोग कर क्या रहे हैं ?

आजकल के साधू-सन्यासियों को देखता हूँ कि वे तिरंगा का ही मजाक उड़ा रहे हैं… दूसरे धर्मों की निंदा कर रहे हैं… खुद को पंडित समझ रहे होते हैं और मांसाहारियों की निंदा कर रहे होते हैं…. तो आश्चर्य होता है कि क्या ये लोग वास्तव में सन्यासी हैं ? अभी किसी ने कहा कि तिरंगा हमारा झन्डा नहीं, भगवा हमारा झंडा है | लोगों को एक करना है तो भगवा के नीचे लाओ | ऐसे लोग क्या राष्ट्रद्रोही नहीं माने जाने चाहिए ?

खैर आज ऐसे लोगों को राष्ट्रद्रोही नहीं माना जाएगा क्योंकि आज सत्ता उनके हाथ में है जो हमेशा तिरंगे का बहिष्कार करते आये | जिनपर प्रतिबन्ध भी लगा और कुछ शर्तों के साथ उनपर से प्रतिबन्ध हटाया गया | और ऐसे लोग मुझे आज कह रहे हैं कि जिस थाली में खा रहे हो उसी में छेद कर रहे हो | अर्थात मैं भगवा की जगह तिरंगे को महत्व दे रहा हूँ तो मुझे अपना भगवा उतार देना चाहिए | सचमुच इतनी घटिया मानसिकता के लोग सन्यासी होने का ढोंग किये बैठे हैं | उनकी समस्या है कि लोग मुझे स्वामी या गुरूजी कह रहे हैं तो उनकी मेहरबानी हैं क्योंकि गेरुआ उनके झंडे का रंग है | फिर तो इनको सूरज से भी कहना चाहिए की अपना गेरुआ रंग उतार दो क्योंकि वह तो कोई भेदभाव नहीं करता ? ~विशुद्ध चैतन्य

लेख से सम्बंधित अपने विचार अवश्य रखें

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of