अभी कई यात्रायें होनी हैं और कई महत्पूर्ण कार्य करने है

एक विद्रोह था बचपन से उस ईश्वर के प्रति जिसने मुझे वह तब नहीं दिया जब मुझे आवश्यकता थी | उसने नौ वर्ष की उम्र में ही मुझसे उस माँ को छीन लिया, जिसपर मुझे विश्वास था कि वह मुझे समझतीं थीं | मुझे ऐसे अपनों के बीच बेगाना रहने को विवश किया, जिनसे मुझे कभी अपनापन मिला ही नहीं | ऐसे अपनों के साथ रहना पड़ा मुझे जो हर काम के बदले एहसान जताते थे, कहते थे हमने तुम्हारे लिए यह किया और वह किया | नफरत हो गयी थी मुझे उस समाज से जिसने कभी सहयोग नहीं किया हमारे परिवार का | वह गरीबी, वह दयनीयता, वह बेबसी….. सब कुछ भीतर ही भीतर सहता रहा लेकिन समझ नहीं पाया कि समाज इतना क्रूर क्यों है | समझ नहीं पाया था कि ईश्वर इतना क्रूर क्यों है कि जो उसकी सबसे अधिक भक्ति करता है उसीको सबसे अधिक कष्ट देता है, यहाँ तक कि दुनिया छोड़ देने के लिए विवश कर देता है |

बहुत ही कम उम्र में ठान लिया था कि अपने बाप से पैसे नहीं लूँगा क्योंकि हर छोटी छोटी बात के लिए उनको घंटों कारण बताना पड़ता था…. १३-१४ वर्ष की आयु में पंचकुइया रोड स्थित ठक्कर बापा स्मारक की बिल्डिंग में पेंट करने के काम लिया ताकि पापा को आर्थिक सहयोग कर सकूं | उसके बाद कोई न कोई ऐसा काम करता रहा जिससे कुछ न कुछ एक्स्ट्रा इनकम होती रहे, फिर चाहे लोगों के घरों में सफेदी करने का काम हो या फिर बाराखम्बा रोड स्थित हिल्टन होटल में इलेक्ट्रिशियन का कम या फिर किसी दूकान में रेडिओ मेकेनिक का काम या फिर सर्वो स्टेबलाइजर की कम्पनी में पीसीबी बोर्ड वायरमेन का काम या फिर आठवीं तक के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम…… जो भी हाथ आया हर काम किया | सन १९८९ में मुझे साउंड स्टूडियो में असिस्टेंट साउंड रिकार्डिस्ट की नौकरी मिली और तनखा थी छः सौ रूपये मासिक + १.२५ रूपये ओवर टाइम |

बस उसके बाद जीवन में एक परिवर्तन आया और मैं संगीत और इलेक्ट्रोनिक मीडिया की दुनिया में खो गया | दस-दस दिन घर ही नहीं जाता और १८-२० घंटे काम करता | लेकिन पिताजी को शिकायत रहती कि मैं अपनी तनखा पूरी क्यों नहीं देता… वे चाहते थे कि मैं अपनी पूरी तनखा उनको दे दूं और फिर जब जरूरत हो उनसे मांग लिया करूँ | वे चाहते थे कि रोज सुबह बस का किराया उनसे माँग कर जाऊं और शाम जो पैसे बचें वह उनको वापस कर दिया करूँ | लेकिन यह मेरे आत्मसम्मान के विरुद्ध थी क्योंकि बचपन से ही मन में यह बात बैठ चुकी थी कि मेरी माँ के जाने के बाद मेरा अपना कोई नहीं है | और दूसरों से पैसे माँगने से बेहतर है दुनिया से विदा ले लेना | जीवन में तीन बार ऐसी स्थिति भी आई कि मैंने आत्महत्या का प्रयास किया क्योंकि जिनको भी मैं अपना समझता वही बेगाना निकल जाता | इस प्रकार मैं जीवन में आगे बढ़ता गया, छः सौ रूपये मासिक की तनखा कब १५ से पच्चीस हज़ार पहुँच गयी पता ही नहीं चला….लेकिन अब दुनिया मेरे लिए पराई हो चुकी थी | अब किसी का प्रेम मुझे ढोंग दिखाई देने लगा था, अब समझ चुका था कि मेरा अपना कोई नहीं, केवल मेरी परिस्थिति के साथ ही लोग जुड़ते हैं | मुझमें रूचि किसी की नहीं, सभी की रूचि मेरे साथ जुड़ी मान-सम्मान व शोहरत में है…. फिर एक दिन अचानक मुझे जिज्ञासा हुई कि मैं कौन हूँ और क्यों आया हूँ इस दुनिया में | बस उस दिन से रिश्तों को तोड़ने में व्यस्त हो गया | फिर मैंने दोस्त हों या सगे-सम्बन्धी, सभी से सम्बन्ध बनाये रखने के प्रयोजन बंद कर दिया | मेरा रुखा व्यव्हार, धीरे धीरे सभी को मुझसे दूर कर दिया |

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कुछ समय बाद खुद की और गहराई को जानने का प्रयास किया और न
ौकरी आदि में भी रूचि कम होती गयी क्योंकि अब वह मुझे बोझ लगने लगा था | वह ऐसा काम लगने लगा था, जिसमें केवल दूसरों को खुश करने, दूसरों को समृद्ध करने में मेहनत करना पड़ता था और खुद के लिय कोई समय नहीं रहता था | और एक दिन नौकरी भी गई और जो संपत्ति अर्जित की वह सब भी गया और मैं फुटपाथ पर आ गया |

लेकिन वह दिन मेरा सौभाग्य या भाग्योदय का दिन था | क्योंकि उस दिन ऐसा लगा कि मैंने स्वयं को खोज लिया | वह दिन ऐसा लगा कि मैं ईश्वर के सबसे निकट आ गया और अब वे स्वयं मेरी देखरेख कर रहे हैं | फुटपाथों में सोते समय ऐसा लगता था जैसे अपनी माँ की गोद में सो रहा हूँ… कभी खाना मिला तो खा लिया, नहि मिला तो दस दस दिनों तक भूखा भी रहा | लेकिन मैं प्रसन्न था, अब समाज द्वारा थोपे गये मान्यताओं और शिक्षाओं से मुक्त था | अब दिमाग से सारा कूड़ा-कचरा निकाल कर अपने में मस्त एक स्वतंत्र जीवन था | अब कोई मुझे यह नहीं कहता था कि मुझे कैसा होना चाहिए और कैसा नहीं | अब कोई दिशा निर्देश देने वाला नहीं था | अब मैं स्वयं ही स्वयं का मालिक था यानि अब मैं वास्तविक स्वामी बन चुका था |

अब इन्हीं दिनों मुझे मेरे प्रश्नों के उत्तर मिले कि ईश्वर वास्तव में है क्या और हम दुनिया में क्यों आते हैं | लेकिन ये सभी उत्तर भीतर से ही मिले बाहर से नहीं | कोई दूसरा उत्तर देता भी कैसे, उसे तो खुद ही नहीं पता होता कि वह दुनिया में क्यों आया है | उसे तो खुद ही नहीं पता कि ईश्वर वास्तव में है क्या क्योंकि वह तो परम्पराओं को ढो रहा है | वह तो ईश्वर को मंदिरों-मस्जिदों में खोज रहा है, ईश्वरीय किताबों में खोज रहा है सरकारी दफ्तर का बाबू समझ कर, जो रिश्वत, चढ़ावा या कमीशन लेकर काम करता है |

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फिर तीन वर्ष लीलामंदिर आश्रम में एकांतवास में और गहनता से अध्ययन किया और अध्यात्म की गहराई को अनुभव किया | कई प्रयोग किये और जाना कि जीवन में कष्ट क्यों आते हैं और दुःख क्यों झेलना पड़ता है | फिर जाना कि स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देने से, गुरु का आशीर्वाद मिल जाने पर, जीवन इतना सहज कैसे हो जाता है | इन्हीं तीन वर्षों में जाना कि मेरी अपनी शक्ति क्या है, मुझमें विशेषता क्या है, मैं दुनिया के अन्य लोगों से भिन्न कैसे हूँ | यहीं जाना कि आराधना चाहे आकार की हो या निराकार की, माता-पिता की हो या गुरु की, पत्नी की हो या पति की, प्रेमी की हो या प्रेमिका की….. मूल शक्ति व प्रभाव समान ही होते हैं | शर्त केवल इतनी ही होती है कि वहां द्वैत मिट जाना चाहिए, शर्त केवल इतनी ही होती है कि स्वयं के आस्तित्व को मिटा देना होता है और तब स्वयं की शक्ति जागृत होती है | तब स्वयं से पहचान होती है |

मैं जानता हूँ की मेरी यह बात आपको अजीब लगेगी, लेकिन यही सत्य है कि स्वयं को खोकर ही स्वयं को पाया जा सकता है |

बस इसी प्रयोग के अंतर्गत अब मैंने आश्रम से निकल कर बाहरी दुनिया अपने आध्यात्मिक ज्ञान को परखने का निर्णय लिया और निकल गया राजस्थान अपने मित्र के निमंत्रण पर | मेरे पास कुल हज़ार रूपये थे जब निकला था लेकिन अब मैं जानता था कि ईश्वर मेरी देखरेख कर रहे हैं | मैं जानता था कि राजस्थान में मेरे मित्र मुझे कोई बहुत ही पहुँचा हुआ संत समझ कर सम्मान कर रहे हैं, जबकि मैं तो एक साधारण सा गरीब संन्यासी था | मैंने उनको समझाने का भी प्रयास किया, लेकिन शायद वे उसे मेरी शालीनता समझ बैठे… हो सकता है उनको बाद में एहसास हुआ हो कि वे कहीं गलत थे | लेकिन मैं उनके सम्मान को अपना सम्मान मानकर नहीं ले रहा था, बल्कि भगवे का सम्मान समझकर स्वीकार कर रहा था | फिर मैं उज
्जैन गया, अजमेर शरीफ गया…. और वहां भी पाया कि ईश्वर स्वयं व्यवस्था कर रहा था मेरा यानि जहाँ भी मुझे कोई असुविधा होती, तुरंत ही कोई सहायता किसी न किसी के माध्यम से पहुँच ही जाती |

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मैं आगरा नहीं जाना चाहता था, लेकिन सारी परिस्थिति ऐसी बनी कि मुझे आगरा जाना पड़ा उस व्यक्ति के पास जिसने शायद पूरे दिल से मुझे स्वीकार था | आगरा पहुँचने के बाद उनके देर से पहुँचने के कारण मुझे इतना क्रोध आया कि मैंने स्टेशन के पास ही एक होटल में कमरा ले लिया | लेकिन इनके पहुँचने के बाद इनका व्यवहार मुझे होटल छोड़कर इनके घर जाने के लिए विवश कर दिया | जब घर पहुँचा और उनके परिवार का व्यवहार व समर्पण भाव देखा तब सारा क्रोध गायब हो गया | मेरे जीवन में वह पहला ऐसा परिवार है, जिसने मुझे स्वीकार बिना किसी शर्तों और पूर्वाग्रहों के | मुझे उनसे कुछ भी नहीं चाहिए था और न ही उन्होंने मुझसे कुछ अपेक्षा की | न तो मैंने कोई बाबागिरी दिखाई और नहीं कोई चमत्कार किये, लेकिन फिर भी उन्होंने पूरा मान-सम्मान दिया | और ऐसे लोग जीवन में किसी को तभी मिलते हैं जब पिछले जन्म में कोई बहुत बड़ा पुण्य किया हो | उन्होने कई चीजें गिफ्ट करने की बात कही थी और मैंने स्वीकार भी लिया था, लेकिन मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि वे मुझे वही गिफ्ट करें जो उनकी आत्मा गवाही देती हो | मैंने कोई मांग की या किसी ने कहा वह देने के लिए विवश होने की कोई आवश्यकता नहीं | क्योंकि अपने अनुभव से जानता हूँ कि मुझे जो चाहिए होता है या जो मेरे लिए आवश्यक होता है उसकी व्यवस्था ईश्वर स्वयं कर देता है, फिर माध्यम वह किसी भी बनाये वह उसकी समस्या है | लेकिन इस पूरी यात्रा में आगरा यात्रा मेरी आध्यात्मिक उद्देश्य को पूरा करने वाली सर्वश्रेष्ठ यात्रा रही | क्योंकि जिस स्वाभाविक व निश्छल अपनत्व की खोज बरसों से रही वह आगरा में मिला मुझे |

अभी कई यात्रायें होनी हैं और कई महत्पूर्ण कार्य करने है | आशा है कि अनुभव जैसे ही कुछ और साथी मिल पाएंगे मुझे आगामी यात्राओं में | ~विशुद्ध चैतन्य

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