धरती पर खतरा बढ़ रहा है, कहीं और बसेरा तलाशें : स्टीफन हॉकिन्स

पृथ्वी से लगभग चालीस प्रकाश वर्ष दूर दो ऐसे ग्रहों का पता लगा है, जिसमें जीवन होने का अनुमान है |

अब आप लोग यह बताइये कि आप में से कितने लोग उनमें से किसी एक में जाने के योग्य हैं ?

जमीन, खेत, जंगल, पहाड़, नदी, नाले, पीने का पानी… सब तो आप लोग बेच ही चुके हैं, तो अब पृथ्वी में रहने का अधिकार ही कहाँ रहा आप लोगों के पास ? और किराया भी कब तक और कितना चुकायेंगे ?

हर साल तो किराया बढ़ ही रहा है |

जरा कल्पना कीजिये.. !!!

आप लोगों के आका यानि नेतागण, धन्नासेठ और फिरंगी मालिक, सब दूसरे ग्रहों में चले जाएँ, तब आप लोगों का क्या होगा ?

कौन आप लोगों को नौकरी देगा और कौन आप लोगों आरक्षण देगा ?

कौन आप लोगों को धर्म और जाति के नाम पर आपस में लड़वा कर आप लोगों का मन बहलायेगा ?

पानी होगा नहीं पृथ्वी पर क्योंकि वह तो आपने बेच दिया मिनरल वाटर, सोडा और दारु वालों को | खेत आप लोगों के पास होगी नहीं कि दो वक्त की रोटी ही उगा लें | जब अनाज ही नहीं उगेगा, तो फिर पिज़्ज़ा और बर्गर भी कहाँ से आयेंगे और मैगी और चाउमीन भी कैसे मिलेगा ?

फिर शाकाहारी लोग जिन्दा कैसे रहेंगे ?

माँसाहारी तो मुर्दों को खाकर भी जी लेंगे, लेकिन शाकाहारी क्या खायेंगे ? और कैसे जियेंगे ?

कभी फुर्सत मिले तो चिंतन मनन कीजियेगा, क्योंकि भविष्य यही है पृथ्वी का | या तो अभी से कृषि व जल संरक्ष्ण पर ध्यान दें, वरना ये पूंजीपति और नेता आपकी शक्ल पहचानने से भी इंकार कर देंगे | वैसे भी चुनाव जीतने के बाद इनकी याददाश्त अगले चुनाव तक के लिए चली जाती है…तो सोचियेगा | ऐसा न हो कि आप लोगों की याददाश्त भी चली जाये |

अब यहाँ यह भी विचार करने वाली बात है कि इतने बड़े बड़े वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, भू-वैज्ञानिक, कृषि-वैज्ञानिक और दुनिया भर के विख्यात विश्वविद्यालयों से निकलने वाले गोल्डमेडलिस्ट डिग्रीधारियों, नास्तिकों, आस्तिकों, धार्मिकों के होते हुए भी, हम अपनी ही पृथ्वी को इस तरह तहस-नहस कर चुके कि अब वैज्ञानिकों ने भी हाथ खड़े कर लिए कि पृथ्वी का अब कुछ नहीं हो सकता | इसकी स्थिति भी बिलकुल किताबी धर्मों की तरह जर्जर हो चुकी है | अब इसमें सुधार की कोई संभावना नहीं बची |

क्यों ? ऐसा क्यों हुआ ?

लोग तो वैज्ञानिक सोच के बच्चे ही पैदा करते हैं | पैदा होते हैं अंग्रेजी बोलने लगते हैं और हिंदी को अटपटी भाषा बताने लगते हैं | अध्यात्म को ढोंग और भौतिकतावाद व उपभोक्तावाद को सार्थक मानते हैं | उत्पादक किसानों को विवश कर रहे हैं अपने खेत छोड़ने के लिए और कंक्रीट के जंगल खड़े करने को विकास बता रहे हैं | फिर भी पृथ्वी रहने लायक नहीं रही, ऐसा क्यों ? इतनी अंग्रेजी सीखने और बोलने का लाभ क्या हुआ ?

हम भारतीय तो जब तक अंग्रेजी नहीं जानते थे, भारत में पर्यावरण प्रदूषित नहीं था | यहाँ के लोग हट्टे-कट्टे योद्धा हुआ करते थे | कृषिप्रधान देश के रूप में जाना जाता था और पुरे विश्व को अनाज उपलब्ध करवाता था | लेकिन जब से अंग्रेजी सीख ली, किसान ही भूखे मरने लगे | लोग खेत छोड़कर नौकरी करने लगे | पूरे विषय को वस्त्र उपलब्ध करवाने वाले भारतीय खुद चीथड़ों में घुमने लगे… क्यों ? इतनी सारी डिग्रियाँ, इतनी महँगी-महँगी पढ़ाई का लाभ क्या हुआ ? क्यों हम भारतीय अपने ही देश की भूमि और पानी बचा पाने में असफल हो गये ?

अपना देश हमस
े संभला नहीं, विश्व को क्या दिशा दिखायेंगे हम ? खुद को विश्वगुरु कहने वाले हम भारतीय विदेशियों की नकल करने के चक्कर में धोबी का गधा बन कर रह गये | चिंतन करिए आपकी डिग्रियों से क्या मानवजाति का कोई कल्याण हो सकता है ? क्या वन, कृषि, जल, पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है ? ~विशुद्ध चैतन्य

READ  अपने विवेक का प्रयोग हमें ही करना है क्योंकि...

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