यदि आप ईश्वर कि रचना की रक्षा नहीं कर रहे, तो ध्यान रहे, न तो मोक्ष मिलेगा आपको और न ही ईश्वर |

मैं जब हरिद्वार पहुँचा था, तब संन्यासी होने का कोई निश्चय नहीं किया था | मुझे संन्यास उन लोगों से नहीं लेना था, जिनको संन्यास का अर्थ ही न पता हो | कई साधू संन्यासियों से मेरी भेंट हुई वहाँ, लेकिन मुझे कोई भी ऐसा साधू नहीं मिला जिससे मैं प्रभावित होता | अधिकांश या तो व्यापारी थे या भिखारी | कोई ऐसा संत भी नहीं मिला जो संतुष्ट था…..

वहां से प्रयाग (इलाहबाद) आया तो वहां भी वही हाल था | तो मेरा गेरुआ डालकर संन्यासी बनने का कोई इरादा नहीं बना | लेकिन जब मैं यहाँ देवघर आया तब एक दिन आश्रम के अध्यक्ष ने कहा कि आपको संन्यास ले लेना चाहिए | मैंने कहा कि मुझे संन्यास लेने की कोई आवश्यकता नही है | क्योकि मेरा उद्देश्य बैठकर भजन-कीर्तन करना नहीं है और न ही हिमालय में जाकर ध्यान-तप करते हुए मिटने का है | फिर जितने भी साधू-संन्यासी मिले मुझे उनमें से कोई भी अध्यात्मिक उत्थान लिए हुए नहीं मिला, सभी दौड़ तो उसी तरफ रहे हैं, जिस तरफ सांसारिक लोग दौड़ रहे हैं | यहाँ भी मुझे ऐसा कोई नहीं दिखा….

वे बोले कि हमारा संन्यास धर्म बाकियों से अलग है | इसमें कोई प्रतिबन्ध नहीं है आपके मिशन में कोई बाधा नहीं है | यहाँ तक कि यदि कल आपको विवाह भी करना पड़े तो हमारा संन्यास आपके लिए बाधा नहीं बनेगा | मेरी तरफ से आप पूर्णरूप से स्वतंत्र हैं और आपको मेरे या आश्रम की तरफ से कोई निर्देश नहीं करेगा | आप अपनी यात्रा स्वयं करें | यह छूट केवल आपको दी जा रही है क्योंकि हम जानते हैं कि आपको दिशानिदेश की आवश्यकता नहीं है | हम तो केवल इतना ही चाहते हैं कि आप हमारे आश्रम के साथ हमेशा के लिए जुड़ जाओ | तो इस प्रकार मुझे संन्यास मिला | लेकिन यह वही संन्यास था जिसकी मैं कल्पना करता था | संन्यास यानि स्वतंत्रता अपने विवेकानुसार जीने की | स्वतंत्रता स्वयं को खोजने की न कि दूसरों द्वारा थोपे गए परम्पराओं को निभाने की बाध्यता | समान्यतः ऐसी स्वतंत्रता कोई भी गुरु किसी शिष्य को नहीं देता… कल यदि मुझे भी किसी को शिष्य बनाना पड़े तो मैं भी नहीं दूँगा | क्योंकि जब तक कोई स्वयं को साध न ले, तब तक ऐसी स्वतंत्रता व्यक्ति व समाज दोनों के लिए घातक हो सकता है | जैसे किसी छोटे बच्चे के हाथों में हथियार दे देना घातक होता है, बिलकुल वैसा ही होता है यदि ऐसे व्यक्ति को स्वतंत्रता दे दी जाये जो संतुलित न हो, जो स्वयं पर नियंत्रण रखने में असमर्थ हो |

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मुझे अब जाकर समझ में आया कि साधू-संन्यासी वास्तव में भटक क्यों रहे हैं | कारण केवल इतना ही है कि ये साधू-संन्यासी वास्तव में परम्पराओं को बिलकुल वैसे ही ढो रहे हैं, जैसे कि पंडित-पुरोहित ढोते हैं | ये स्वविवेकानुसार नहीं चलते और न ही स्वयं को जानने का कभी प्रयास करते हैं | ये अपने गुरुओं की नकल करते चलते हैं और बस उससे आगे की यात्रा करने में असमर्थ हो जाते हैं | ध्यान भी करते हैं ये लोग तो इनको देवी देवता उसी रूप में दर्शन देते हैं, जिस रूप में इनके सामने प्रतिमा होती है या तस्वीर होती है | मैंने कई बार ध्यान में देवी-देवताओं के दर्शन करने की कोशिश की, लेकिन मुझे प्रतिमा या तस्वीरों वाले देवी देवता नहीं दिखे, बस कभी तीव्र रौशनी दिखी, कभी मधुर संगीत, तो कभी गहन शान्ति….. इससे आगे की यात्रा शायद मैं अभी कर नहीं पाया | फिर सोचता हूँ कि देवी देवता वास्तव में वैसे ही होते हैं, जैसे कि तस्वीरों या मूर्तियों में दिखाया जाता है ? क्या संन्यास का उद्देश्य केवल देवी-देवताओं के दर्शन करना और ध्यान करते हुए मर जा
ना ही होता है ?

नहीं ! मेरी संन्यास की परिभाषा वह नहीं जो शास्त्रों में लिखे हैं | मेरे संन्यास की परिभाषा है संसार का न्यासी अर्थात संसार का संरक्षक | ईश्वर ने मानव योनी जन्म दिया ताकि हम सृष्टि को विनाश से बचाएं | लेकिन मानव अपने जीवन के उद्देश्य को भूल गये, इसलिए हम संन्यासियों का कर्तव्य है कि उनको समझाएं कि मानव का रूप इसलिए नहीं मिला है कि ईश्वर की रचना को नष्ट करें…यह काम तो चूहे, दीमक और कोकरोच भी कर लेते हैं | वे भी वृक्षों को तहस-नहस करने का दम रखते हैं | वे भी अनाज को नष्ट कर देते हैं… तो हम भी वही करें तो हम मानवों और चूहों में क्या अंतर रह गया ? वे भी अपने लिए ही जीते हैं और भौतिकतावादी मानव भी अपने लिए ही जीता है | वह जंगलों को नष्ट करता है, खेतों को नष्ट करता है, नदियों और पहाड़ों को नष्ट करता है…. काम तो वही सब कर रहा है जो चूहे, कोकरोच, दीमक करते हैं….

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संन्यासी होने का अर्थ यह नहीं कि विवाह मत करो, दुनिया भर के परहेज करते फिरो… संन्यासी होने का अर्थ है संसार को नष्ट होने से बचाने के उपाय खोजना | वह उपाय जो कि समान्य गृहस्थ नहीं सोच सकता | वह उपाय जो पढ़े-लिखे डिग्रीधारियों के स्वप्न में भी नहीं आ सकता | क्योंकि वे भी परंपरा निभा रहे हैं पढ़े-लिखे होने की, जो पहले लिखा जा चुका है उसे ढोने की… उनके पास आगे कुछ नवीन नहीं है सोचने के लिए | शिक्षा इतनी आधुनिक हो चुकी है कि युवाओं की दूरदर्शिता व कल्पना शक्ति ही कुंद हो गयी…. इसलिए संन्यासियों को ही आगे आना होगा | संन्यासियों को ऋषियों की तरह ऊपर उठना होगा और ब्राह्मणवाद से मुक्त होना होगा | नए नए खोज भी करने होंगे संन्यासियों को तभी सही अर्थों में ईश्वर की सेवा हो पायेगी | संसार से भागिए मत, संसार को नष्ट होने से बचाइये | बचाइए इस भूमि को भूमाफियाओं और वनों, खेतों के शत्रुओं से | बचाइये किसानों, आदिवासियों को पूंजीवादियों के अत्याचार व शोषण से | बचाइये हर उस व्यक्ति को ईश्वर की सृष्टि की रक्षा करने का बीड़ा उठाये निकले हैं | बचाइये उन सभी को जो गुलाम नहीं बनना चाहते चंद पूंजीपतियों के हाथों के |

यदि आप ईश्वर कि रचना की रक्षा नहीं कर रहे, तो ध्यान रहे, न तो मोक्ष मिलेगा आपको और न ही ईश्वर | ~विशुद्ध चैतन्य

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