पढ़ा-लिखा डिग्रीधारी होने का मतलब यह नहीं कि आप समझदार हो गये

एक मित्र ने प्रश्न किया, “क्या आप समाज के सभी वर्ग को समान नजर से देखते हैं ?”

मेरा उत्तर था, “नहीं…. उपद्रवी वर्गों को अलग नजर से देखता हूँ, अपराधी वर्गों को अलग नजर से देखता हूँ, धर्म और जाति के आधार पर नफरत फ़ैलाने वाले वर्गों को अलग नजर से देखता हूँ…. यानी समान नजर से देख ही नहीं पाता… यह योग्यता तो नेताओं में होती है या फिर ब्रह्मज्ञानी साधू-संतों में | मुझमें ऐसी योग्यता नहीं है |

एक और मित्र ने पूछा, “क्या आप वाकई जाति भेद से ऊपर उठ चुके हैं????”

मेरा उत्तर था, “नहीं… जातिभेद जो प्राकृतिक है उससे ऊपर नहीं उठा अभी और न ही उठना चाहता हूँ |”

पहले हम लोग बेशक पढ़े-लिखे डिग्रीधारी नहीं थे, लेकिन शिक्षित थे, समझदार थे | आज पढ़े-लिखे डिग्रीधारी हो गए, लेकिन समझदारी घास चरने चली गयी | आज समानता के नाम पर, भेदभाव मुक्ति के नाम पर हम प्राकृतिक नियम यानि सनातन धर्म के विरुद्ध हो गये और किताबी धर्मो को सत्य मानकर स्त्री-पुरुष को शत्रु बनाने पर तुले हुए हैं, समाज को आपस में ही लड़वाने पर तुले हुए हैं धर्म और जाति के नाम पर | यह सिद्ध करने पर तुले हुए हैं कि सभी बराबर हैं, बस सबको अवसर नहीं मिल रहा, इसलिए कोई गरीब है, शोषित है तो कोई ऐय्याशी कर रहा है |

लेकिन कभी किसी ने सोचा कि 95% जनसँख्या केवल अनुसरण करने वालों की होती है, भेड़चाल पर चलने वालों की होती है ?

केवल 05% जनसँख्या ही प्रयोगों में व्यस्त रहती है या किसी खोज में लगी रहती है या फिर शासन करती है या फिर व्यवस्था देखती है या फिर…. कुछ न कुछ ऐसे कार्य करती रहती है जिससे समाज का हित हो या अहित हो | इन्हीं 05% लोगों में से कुछ समाज में नफरत की खेती करते हैं, कुछ मारकाट करते हैं, कुछ आतंकित करते हैं, कुछ लूट-पाट करते हैं, कुछ बलात्कार करते हैं….यानि अच्छे या बुरे उपद्रव करने वाले यही लोग होते हैं | बाकी सभी बीवी बच्चे पालने, इनकम टैक्स चुकाने, खेती बाड़ी, घर-परिवार, मंदिर-मस्जिदों में व्यस्त रहते हैं |

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अब समानता के नाम पर हो रहे उपद्रवों को यदि देखें तो पाएंगे कि ये समानता नहीं, जो समृद्ध है उनसे छीनने की होड़ है | ये समानता की बातें करने वाले उन मंदिरों में हिस्सा चाहते हैं जो समृद्ध हैं, न कि खुद अपना मंदिर बनाकर उसे समृद्ध करके सिद्ध कर रहे हैं कि वे भी योग्य हैं | ये समानता की बातें करने वाले कुछ डिग्रियाँ बटोरकर यह समझ रहे हैं कि वे समझदार हो गये, लेकिन वे इस लायक भी नहीं हुए उस डिग्री से कि अपने ही खेतों को अधिक समृद्ध कर सकें, उपाय खोज सकें कि किसानों को हानि न हो | ये डिग्रीधारी पढ़े-लिखे लोग इस लायक भी नहीं हो सके कि स्वरोजगार कर सकें, इन्हें सरकारी नौकरी ही नहीं, हर समृद्ध क्षेत्र में आरक्षण चाहिए…. और पढ़े-लिखे डिग्रीधारियों का समाज समझ रहा है कि ये लोग बहुत ही महान काम कर रहे हैं |

जिन्हें स्त्रियों के जिस्म देखने में आनंद मिलता है उन्होंने पढ़ा दिया कि स्त्रियों के शरीर में जितने कम कपडे हों, उतने ही वे आधुनिक व पढ़ी-लिखी दिखेंगी…. बस स्त्रियों ने उपद्रव मचा दिया कि हम जो चाहें पहने या न पहनें…… अमेरिका में तो स्त्रियों ने नग्नता को मानवाधिकार से जोड़ दिया और नग्न रहने को अपना जन्मजात नैतिक अधिकार मान लिया और बाकायदा वे नग्न जुलुस निकालकर अपने अधिकार की बातें करते हैं |

तो पढ़ा-लिखा डिग्रीधारी होने का मतलब यह नहीं कि आप समझदार हो गये | जरा सोचिये कि यदि इन डिग्रीधारियों का बस चले तो हर शुक्राणु को निषेचित होने का अधिकार दिला दें | कानून बना दें कि केवल एक ही
शुक्राणु के डिम्ब में प्रवेश के बाद बाकियों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगना भेदभाव है, अन्याय है… सभी को प्रवेश की अनुमति मिलनी चाहिए | यानि सनातन धर्म विरोधी तत्व यहाँ भी सक्रिय हो जायेंगे… वह तो शुक्र है कि अभी किसी ने शुक्राणुओं को न्याय दिलाने का बीड़ा नहीं उठाया | यदि ऐसा हो जाये तो सोचिये क्या हो ? ~विशुद्ध चैतन्य

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मनुष्य के एक बार के मैथुन में स्खलित वीर्य में सामान्यत: शुक्राणुओं की संख्या 22,60,00,000 अनुमानित की गई है। इनमें केवल एक ही शुक्राणु डिंब को संसेचित करने का काम करता है। प्रत्येक डिंबोत्सर्ग (Ovilation) में केवल एक ही डिंब डिंबग्रंथि से निकलता है।

ज्यों ही कोई क्रियाशील शुक्राणु अपने ही स्पीशीज के प्राणी के डिंब के संपर्क में आता है त्यों ही वह उसमें प्रवेश कर जाता है। शुक्राणु का सिर तो डिंब के अंदर घुस जाता है, किंतु उसकी पूँछ टूटकर बाहर ही रह जाती है। डिंब में शुक्र प्रवेश कर उसके अंदर अनेक घटनाओं को उत्तेजित करता है। सबसे पहले वह डिंब में किसी अन्य शुक्राणु के प्रवेश को रोकता है। यह काम इस प्रकार होता है :

संसेचित अंडे के बाह्य स्तर से एक प्रकार का रासायनिक स्राव निकलता है, जो अन्य शुक्राणु को डिंब की ओर आकर्षित न कर विकर्षित करता है अथवा डिंब के बाहर चारों ओर एक प्रकार की जेली जैसी झिल्ली (Fertilization Membrane) बन जाती है, जिससे शुक्राणु का प्रवेश नहीं हो पाता अथवा अभेद्य भित्ति से घिरा डिंब का बिल्कुल छोटा छेद, माइक्रोपाइल (Micropyle) एक शुक्राणु के प्रवेश करते ही बंद हो जाता है।

डिंब में प्रविष्ट करने पर शुक्राणु निर्धारित पथ से केंद्रक की ओर अग्रसर होते हुए डिंब के पूर्वकेंद्रक (Pronucleus) से मिलता है और शुक्राणु तथा डिंब दोनों ही के पूर्वकेंद्रक घुलमिलकर क्रोमोसोम बनाते हैं, जो कोशिका द्रव्य में स्वतंत्र पड़े रहते हैं। डिंब अब युग्मज बन जाता है। डिंब का सेंट्रोसोनोम लुप्त हो जाता है, पर शुक्राणु का सेंट्रोसोम दो भागों में बँट जाता है और एक गतिशील तर्कु (spindle) का निर्माण करता है। इस तर्कु के अयनवृत्त के चारों ओर क्रोमोसामेम अपनी अपनी जगह ले लेते हैं और संसेचित डिंबकोश का विभाजन और विकास शुरू होकर भ्रूण का निर्माण होने लगता है।

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