हमसे लाख गुना बेहतर वे देश हैं जिनकी जनसँख्या कम है

कुछ लोग उन बच्चों की तस्वीरें शेयर करके सेना की बर्बरता दिखाने का प्रयास कर रहे हैं जो सैनिक कार्यवाही में घायल हो गये…. लेकिन किसी ने यह नहीं बताया कि व बच्चे वहां कर क्या रहे थे | क्या सेना ने उन्हें उनके घर में घुसकर घायल किया था या फिर स्कूल में | यदि सेना बर्बर है जो मासूमों पर हमले कर रही है, तो वे लोग कौन कौन हैं जो चंद रूपये के लालच में अपने बच्चों को उपद्रवियों के गेंग के साथ भेज रहे हैं ?

हो सकता है वे लोग उसी तरह गरीबी से मजबूर हों, जो अपने बच्चों को पैसे कमाने के लिए बाहर भेज देते हों ? लेकिन क्या किसी ने उनके माँ-बाप पर बालमजदूरी कानून के अंतर्गत कार्यवाही करने की मांग की ? क्या बेरोजगारों के लिए सरकार ने कोई रोजगार उपलब्ध करवाया ? यदि इन बेरोजगारों के पास कोई रोजगार होता तो ये लोग पाकिस्तान से मिल रहे रोजगार को लात नहीं मार देते ?
हम हमेशा यही देखते आये हैं कि इमोशनल बलैकमेल करने के लिए बच्चों को आगे कर दिया जाता है | बहुत पहले समुद्रतट पर एक बच्चे की लाश की तस्वीर दिखा कर सीरिया के अतिवादियों ने सहानुभूति बटोरी और जिन देशों ने उनको शरण दी, उनके ही नागरिकों की ज़िन्दगी नरक कर दी | और दुनिया को या सन्देश दिया कि कभी किसी मुस्लिम पर विश्वास मत करो और न ही उनकी सहायता करो, यदि ऐसा करते हो तो अंजाम वही होगा जो सीरियाई शरणार्थियो को मदद देने वाले देशों के नागरिकों का हुआ |
लेकिन मुस्लिम समाज को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता… क्योंकि वे तो इस खुशफहमी में जी रहे हैं कि दुनिया हमारी कितनी ही बुराई कर ले, हमारी जनसँख्या तो बढ़ ही रही है, विश्व में सबसे तेजी से हमारा ही धर्म फ़ैल रहा है….
ईश्वर का विधान है, जिनकी जनसँख्या तेजी से बढती है, वे बलि यानि क़ुरबानी के काम आते हैं | जैसे कि मछलियाँ सबसे अधिक अंडे देती है और लगभग हर माँसाहारी प्राणियों का भोजन हैं वे | मेंढक सबसे अधिक अंडे देते हैं, लेकिन वे भी कई परजीवियों का भोजन हैं | मुर्गी, बतख, भेड़-बकरी….आदि सभी परजीवियों का भोजन हैं | यह प्राकृतिक व्यवस्था है, जो भोज्य हैं, उनकी पैदावार आधिक होगी, फिर वह धान हो, गेहूं हो, या घास |
यदि मानव यह समझता है कि वह अपनी जनसँख्या बढ़ा कर समृद्ध हो जाएगा, तो वह उसकी भूल है | जनसँख्या के मामले में भारत विश्व के दूसरे स्थान पर आता है, लेकिन विकास में मामले में पहले दस में भी नहीं आता | क्यों ?
क्योंकि भारत की जनसँख्या या मानव संसाधनों का प्रयोग परजीवी करते हैं | यहाँ के मानव और भेड़, बकरी, बतख, मुर्गी में कोई अंतर नहीं माना जाता | यहाँ स्कूल भी खोले जाते हैं तो परजीवियों द्वारा धंधा करने के लिए, न कि शिक्षित बनाने के लिए | यहाँ अस्पताल भी खोले जाते हैं तो पैसे कमाने के लिए, न कि मानव को स्वस्थ व निरोघी रखने के लिए | यहाँ नेता भी आते हैं चौखट पर तो वोट लेने के लिए | यहाँ भीड़ भी इकट्ठी होती है तो तमाशा देखने के लिए, यहाँ कोई सहायता भी करता है तो व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए…. अर्थात यहाँ की जनसँख्या अधिक होने का अर्थ यह नहीं कि इनसे राष्ट्र व समाज का उत्थान हो रहा है, बल्कि यहाँ के लोग परजीवियों के मनोरंजन के काम आते हैं, जब वे धर्म और जाति के नाम पर आपस में लड़ते मरते हैं | परजीवी इस खेल को बहुत आनन्द व रूचि लेकर खेलते हैं और जब कोई मर जाता है तो उसकी लाश पर राजनैतिक रोटियां सेंकते हैं | यहाँ के लोग काम आते हैं भूमाफियाओं सीमा के विस्तार के लिए… यहाँ लोग और कसाई के पास रखे मुर्गियों के दड़बे में रखी मुर्गियों में कोई अंतर नहीं है | कसाई एक एक मुर्गी उसी दडबे से निकालेगा, वहीँ उसे हलाल करेगा और बाकी मुर्गियाँ कसाई द्वारा फेंके गये दाने चुनने में मस्त रहेंगी |
इस पोस्ट में दो तस्वीरें हैं, एक वह जिसमें पाँच सौ रूपये की दिहाड़ी बनाने के लिए छोटे-छोटे बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर निकले हैं और वहीं दूसरी तस्वीर है जिसमें उसी कश्मीर के बच्चे स्कूल जाते हुए दिख रहे हैं | बच्चे पढ़ना चाहते हैं, कुछ बनना चाहते हैं, लेकिन समाज, सरकार या धर्मगुरुओं के पास उनकी सहायता के लिए पैसे नहीं है | लेकिन यदि ये बच्चे तोड़फोड़ करने लग जाएँ, आगजनी करने लग जाएँ, अपने ही गाँव, अपने ही शहर, अपने ही राज्य को खुद ही उजाड़ने में लग जाएँ… तो परजीवियों जैसे कि आतंकी, राजनैतिक, धार्मिक संगठनों के पास इनको हर रोज पाँच सौ से आठ सौ रूपये दिहाड़ी देने के लिये पैसे पहुँच जायेंगे | और पाकिस्तान जैसा कंगला देश भी दानवीर कर्ण बन जायेगा |

बहुत आश्चर्य होता है कि नेक काम के लिए लोगों के पास पैसे नहीं है, लेकिन किसी के सर कलम करके लाने वालों के लिए शाकाहारी, त्यागी, ब्रह्मचारिणी साध्वी प्राची जैसों के पास भी पचास लाख रूपये निकल आते हैं | बड़ा आशचर्य होता है कि कृषि क्षेत्र को विकसित करने, ग्रामीणों को आत्मनिर्भर करने, नागरिकों को निःशुल्क शिक्षा व चिकित्सा देने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं होते, लेकिन देश को लूटने वालों के करोड़ों के टैक्स और कर्ज माफ़ कर दिए जाते हैं | अरबों रूपये हथियारों की खरीद में फूंक दिए जाते हैं और फिर वे हथियार कभी काम में नहीं आते… और जिस दिन युद्ध छिड़ेगा पड़ोसी देशों से, उस दिन पता चलेगा कि खरीदे गये हथियार एक्सपायर हो गये, नए खरीदने पड़ेंगे | मुंबई के ताज हमले में जो बुलेटप्रूफ जैकेट दिए गये थे, उनकी असलियत तो वहीं खुल गयी… पता चला था कि सब नकली थे और करोड़ों में खरीद हुई थी उनकी |
सारांश यह कि जनसँख्या अधिक होने का अर्थ है कि हम परजीवियों के शिकार हैं और हमारा केवल शिकार किया जायेगा | जैसे कि छत्तीसगढ़, बस्तर, कश्मीर, मणिपुर आदि में हो रहा है | जैसे एक मछली को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह इंसानों की बस्ती में है या जानवरों की या पक्षियों की… उसे भोजन ही बनना है, बस जितने दिन तक जी ले उतनी ही उसकी जिन्दगी | तो यदि आप भारतीय नागरिक हैं तो भी और यदि मुस्लिम हैं तो भी, दोनों ही सूरत में अपनी जनसँख्या को लेकर खुश होने की आवश्यकता नहीं है | हमसे लाख गुना बेहतर वे देश हैं जिनकी जनसँख्या कम है, कम से कम वहाँ इंसानों को इंसान तो माना जाता है | जापान का उदाहरण ले लीजिये… पूरी तरह से बर्बाद जापान आज भारत से कितना आगे निकल गया, और एक भारतीय हैं जो आज तक परजीवियों के हाथ की कठपुतली बने हुए हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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