राष्ट्रभक्ति व धर्म को ठेकेदारों और सड़कछाप लफंगों के भरोसे नहीं छोड़ना पड़ता…


जापान की एक कहानी है कि एक व्यापारी के घर एक चोर घुस गया | कुछ गिरने की आवाज सुनकर व्यापारी की नींद खुल गयी | अचानक उसे यह आभास हुआ कि मकान में कोई चोर घुस आया है और वह दबे पाँव उस कमरे में पहुँचा जहाँ चोर सामान आदि बाँधने में लगा हुआ था | व्यापारी को कुछ समझ नहीं आया कि वह चोर को कैसे पकड़े क्योंकि उसके पास तो हथियार भी था और वह हट्टा-कट्टा भी था |

व्यापारी को अचानक एक युक्ति सूझी और उसने ग्रामोफोन पर राष्ट्रगीत चला दिया | जैसे ही राष्ट्रगीत बजा चोर सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया | व्यापारी तुरंत रस्सी से उसे बाँध दिया और पुलिस बुला कर उसे उनके हवाले कर दिया | उस व्यापारी की बुद्धिमानी की सभी ने बहुत तारीफ़ की |

कोर्ट में जब सुनवाई के लिए उस चोर को लाया गया और जब पकड़े जाने की सारी बातें जज को बताई गयीं तो जज ने चोर से पूछा, ” तुम भागे क्यों नहीं जब तुम भाग सकते थे और तुम तो व्यापारी से हट्टे-कट्टे भी थे ?”

चोर ने कहा, “मैं चोर हूँ, राष्ट्रद्रोही नहीं ! मैं चोरी करता हूँ वह मेरी विवशता है, लेकिन इतनी भी विवशता नहीं है कि मैं अपने देश के राष्ट्रीयगीत का अपमान कर सकूँ | मुझे सर कटवाना मंजूर था, लेकिन राष्ट्रगान का अपमान मंजूर नहीं था | इसलिए ही नहीं भागा था… |”

चोर का उत्तर सुनने के बाद जज ने व्यापारी को राष्ट्रगीत के अपमान करने के जुर्म में गिरफ्तार करने का हुक्म सुनाया और चोर को ससम्मान रिहा कर दिया |

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आज भी जो लोग राष्ट्रीयगीत को लेकर देशभक्ति दिखा रहे हैं, सिनेमा हॉल से लेकर सड़कों में भी देशभक्ति झाड़ रहे हैं, उन्हें इस कहानी से प्रेरणा लेनी चाहिए | जो राष्ट्रगीत का अपमान करें उसे सजा देने के साथ ही उन्हें भी सजा दें जो राष्ट्रगीत बजते समय भी यह देख रहे थे कि कौन कौन राष्ट्रगीत का अपमान कर रहा है | जिनका ध्यान राष्ट्रगीत पर नहीं, बल्कि इधर उधर भटक रहा था, उन्हें भी राष्ट्रगीत के अपमान का दोषी माना जाना चाहिए क्योंकि वे राष्ट्रगीत का सम्मान नहीं कर रहे थे, बल्कि ढोंग कर रहे थे | जबकि उनका सारा ध्यान तो राष्ट्रगान पर न होकर, दूसरों पर था | ~विशुद्ध चैतन्य

नोट: कुछ धुन ऐसे होते हैं, जो दिल पर उतर जाते हैं और वही राष्ट्रीय धडकन, राष्ट्रीय धुन बन जाते हैं | डंडे और सजा से भक्ति, आराधना या राष्ट्रभक्ति नहीं जगाई जा सकती, हाँ ढोंग, पाखंड, कर्मकांड, दिखावा आदि करवा सकते हैं | जिस दिन यह बात पढ़े-लिखों और विधि-विधान के ज्ञाताओं को समझ में आ जायेगा, उस दिन समझो शिक्षा का उद्देश्य सार्थक हुआ | वास्तव में शिक्षा की आवश्यकता तो हमारे विधि, न्याय व धर्मों के विशेषज्ञों व अधिकारियों को ही सर्वाधिक है | विद्यालयों में भी यदि नंबरों से अधिक शिक्षा को महत्व दिया जाता तो राष्ट्रभक्ति व धर्म को ठेकेदारों और सड़कछाप लफंगों के भरोसे नहीं छोड़ना पड़ता भारतीयों को | क्योंकि तब हर भारतीय वास्तविक राष्ट्रभक्त व धार्मिक होता |

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