ई नेता लोगन के तनखा फिर से बढ़ गवा… का बात है ?

चुनमुन परदेसी जब से विलायती डिग्री लेकर लौटा, तभी से उसे किसी न किसी के नेता के घर से बुलावा आता रहता | कभी किसी रैली में तो कहीं किसी उद्घाटन समारोह में वह हमेशा व्यस्त रहता था | खैर जैसे तैसे करके चुनाव निपटा तो उसे शान्ति मिली और सुबह सुबह नुक्कड़ वाले झाँसे के राजा चाय की दूकान में पहुँच गया | दूकान का मालिक कल्लू दलाल चुनमुन को देखते ही चहक कर बोला, “अरे अहोभाग्य हमारे जो हमरी झोपड़िया में पधारे !” चुनमुन मुस्कुराकर बोला अरे भैया अब क्या बताएं, इत्ता बिजी रहे पिछले दिनों की फुर्सत ही नहीं मिली…ला बढ़िया सी चाय पिला दे मस्त… पर झाँसे वाला नहीं |”
“हे हे हे हे…. अरे परदेसी बाबू ! अब आप भी सुबह सुबह ही मजाक करने लग गये… झाँसे वाली चाय तो पब्लिक के लिए होती है… आप जैसे विलायत रिटर्न… वह भी अमेरिकी पढ़ाई किये हुए के लिए थोड़े ही |” यह कहकर कल्लू चाय बनाने लगा और चुनमुन अखबार लेकर बैठ गया |
अचानक कल्लू के मन में एक प्रश्न उभरा, “अच्छा परदेसी बाबू आप अखबार में पढ़े होंगे कि ई नेता लोगन के तनखा फिर से बढ़ गवा… का बात है ? इनका सारा खर्चा सरकार भरत है वह भी हम जनता लोगन के टैक्स से.. फिर ई लोगन को तनखा कैसे कम पड़ जात ? का करत हैं इतना तनखा का ई लोग ?”
चुनमुन मुस्कुरा कर बोला, “देखो भाई…इनकी तनखा अरहर दाल की महँगाई के कारण बढ़ी है | असल में ये लोग अरहर दाल खाते हैं… शुद्ध शाकाहारी होते हैं न ये लोग.. इसलिए |”
“वाह बाबू मान गये… विलायती डिग्री लेने का यही फायदा है | हम इतने दिनों से परेशान थे… समझ में ही नहीं आ रहा था, लेकिन आप तो एक सेकेंड भी नहीं लिए… तुरत ही एक दम जवाब से दिए | आप बिलकुल सही कह रहे हो…अब हम लोगों के लिए अरहर दाल सपना बनकर रह गया है | काश सरकार इसी तरह सबकी कमाई बढ़ाने का जुगाड़ कर देती तो हम भी अरहर दाल अपने बच्चों को खिला सकते !! ~विशुद्ध चैतन्य

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