सनातन धर्म क्या है ?

उलझा दिया समाज को सम्प्रदायों और पंथों को धर्म का नाम देकर | आज युवाओं के मन में यह प्रश्न रह रह कर उठता है कि हिन्दू धर्म और सनातन धर्म में क्या अंतर है ? कई बार मुझसे पूछा गया कि आप भगवा भी धारण करते हो और फिर सनातन धर्म यानि हिन्दू धर्म की आलोचना क्यों करते हो ?
मैं जानता हूँ कि धर्मों के विद्वानों ने बड़ी बड़ी किताबें लिखीं सनातन धर्म पर और आदिशंकराचार्य से लेकर स्वामी विवेकानंद तक कितने ही विद्वानों, महापुरुषों ने सनातन धर्म की व्याख्या कर रखी है और आज भी कर ही रहे हैं | फिर भी आज तक सनातन धर्म नहीं समझ में आया किसीके | कुछ लोग हिन्दू धर्म को सनातन धर्म कह रहे हैं |सबसे पहली बात तो हिन्दू धर्म कोई किताबी धर्म है ही नहीं कि उसे वेदों, पुराणों या गीता, रामायण से पहचाना जाए, जैसा कि इस्लाम है, इसाई है, यहूदी या अन्य सम्प्रदाय | हिन्दूधर्म नाम दिया गया शायद आदिशंकराचार्य द्वारा और उन्होंने ही सभी भारतीयों को मुगलों व बौद्धों के विरुद्ध संगठित करने के लिए हिन्दुओं के गुरुओं की परम्परा शुरू की और उन्हें शंकराचार्य नाम दिया… बिलकुल वैसे ही जैसे ईसाईयों में पोप होते हैं और मुस्लिमों में मौलाना, ईमाम आदि होते हैं | तो यह हिंदु धर्म नकल है ईसाई और इस्लाम की और मुख्यतः इस्लाम की ही नकल है | यदि आप दोनों की तुलना करें तो पाएंगे कि दोनों एक दूसरे के विपरीत हैं लेकिन समतुल्य हैं | दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं लेकिन बिलकुल जुड़वाँ भाइयों की तरह हैं | दोनों के अपने अपने कायदे कानून हैं और दोनों में होड़ लगी हुई है | दोनों एक दूसरे को मिटाने के सपने पाले हुए हैं……

जबकि मेरी नजर में हिन्दू धर्म वह धर्म था जो हिंदुस्तान के लोग अपनाते थे और मुगलों को भारत में आकर यह समझना कठिन था कि इतने सारे देवी-देवताओं, मान्यताओं, व संस्कृतियों वाले विराट भारतवर्ष का धर्म क्या है | इसलिए उन्होंने हिंदुस्तान लोगों को हिन्दू और इनका धर्म हिन्दू कहना शुरू कर दिया… जो भी था यहाँ लेकिन मुगलों से अलग ही था | और भारतवर्ष एक सम्पूर्ण राष्ट्र कभी रहा ही नहीं पहले कई राज्यों का एक समूह था ठीक वैसे ही जैसे अफ्रीका, अमेरिका आदि थे | आचार्य चाणक्य की पहल से कुछ राज्य संगठित हुए और फिर चन्द्रगुप्त मौर्य ने बहुत बहुत बड़े भूभाग को संगठित किया लेकिन दक्षिण भारत के कई राज्य उसमें शामिल नहीं थे | उसके बाद अशोक और फिर इसी प्रकार आगे बढ़ते गये…

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लेकिन भारत पुर्णतः बिलकुल वैसा राष्ट्र नहीं बना कि इस्लामिक राष्ट्रों की तरह एक ही धार्मिक ग्रन्थ, मान्यता और कर्मकांडों वाले राष्ट्र थे | आदिशंकराचार्य ने इसे एक कमजोरी माना और इसलिए उन्होंने एक ही मान्यता यानि ब्राह्मणवाद को ही हिन्दूधर्म के रूप में स्थापित कर दिया | इससे लाभ तो हुआ नहीं, उलटे राष्ट्र कमजोर ही हुआ क्योंकि ब्राहमणों का अत्याचार बढ़ गया और अन्य मतों व मान्यताओं वाले राज्यों के नागरिकों को असुविधा होने लगी | चूँकि ब्राहमणों ने मुगलों की तरह ही सभी पर अपना मत थोपना शुरू कर दिया, तो लोग ब्राहमणों के विरुद्ध होते चले गये | और आज तक ब्राहमणों में वह गुण नहीं आया पाया कि वे किसी का दिल जीत पायें, उलटे दमन व उग्रवाद का ही सहारा लेते चले आये | आज भी हिन्दुवाद और गौरक्षा के नाम पर ये लोग उपद्रव व अत्यचार ही कर रहे हैं |

भारत को एक करने का श्रेय यदि देना चाहूँ तो अंग्रेजों को देना चाहूँगा क्योंकि उन्होंने कई भेदभाव समाप्त किये और कई कुरीतियाँ व अमानवीय प्रथाएं मिटाईं जो ब्राहमणों ने थोपे थे या पहले से चले आ रहे थे | इससे सभी राज्यों के नागरिकों को आपस में सहजता से जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ | लेकिन उनके आने से भारत में इसाई धर्म नाम का एक और मत शामिल हो गया | पहले ही वैष्णव, शैव, चार्वाक, हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, जैन, सिख आदि थे अब एक और आ गया |

तो विभिन्न मान्यताओं, संस्कारों, संस्कृतियों व भाषाओं वाले भारत वर्ष में केवल ब्राहमण ही नहीं, आदिवासी भी रहते हैं, पहाड़ी और सागर तटीय माँसाहारी भी रहते हैं और उनके अपने अराध्य हैं और अपनी ही मान्यताएं व संस्कार भी हैं | लेकिन जिस प्रकार के हिंदुत्व को आज उछाला जा रहा है, वह ब्राहमणवाद है | यह वह हिन्दूधर्म नहीं है जो मुगलों की नजर में रहा होगा | यह एक बहुत ही संकीर्ण मानसिकता का धर्म है यदि इसे मैं वर्तमान रूप में लूं तो | इसमें आदिवासियों, दलितों, मांसाहारियों, के लिए कोई स्थान नहीं है | यह शुद्ध ब्राहमणों का धर्म है यानि वे नियम जो ब्राह्मणों पर लागू किये गये थे उसपर आधारित हैं | लेकिन यहाँ तो ब्राहमण भी कोई नहीं है, बस सभी पट्टा लटकाए हुए हैं ब्राह्मण का | कर्म और धर्म से तो कोई ब्राह्मण बचा ही नहीं है | जो वैश्य मनोवृति के हैं वे ही आज ब्राहमण बने हुए हैं |

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जैसे शैव, वैष्णव, चार्वाक, इस्लाम, ईसाई आदि सम्प्रदाय हैं, ठीक वैसे ही ब्राहमणवाद भी हैं | लेकिन ब्राह्मणवाद सनातन धर्म नहीं है और न ही हिन्दू ही सनातन धर्म है | ये सभी विशेष मान्यताओं, कर्मकांडों, परम्पराओं के अंतर्गत जीवन जीने वाले ऐसे सम्प्रदाय मात्र हैं, जो दूसरों को मिटाने के सपने पाले रहते हैं | तो फिर सनातन धर्म क्या है ?
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सनातन धर्म है वह विधान जिसके अंतर्गत सम्पूर्ण जगत गति करता है, जनन-प्रजनन, श्वसन करता है | सनातन धर्मी हैं वे लोग जो आधुनिक मानव जाति से दूर बीहड़ वनों में रहते हैं और जिसे हम आदिवासी कहते हैं | सनातनी हैं वे सभी जीव-जंतु जो प्रकृति के साथ समन्वय बनाकर जीते हैं | सनातनी हैं वे लोग जो दूसरों के मान्यताओं व परम्पराओं के विरोधी नहीं हैं | जैसे सनातनी शेर से नफरत नहीं करेगा क्योंकि वह गाय से प्रेम करता है | सनातनी किसी से इसलिए नफरत नहीं करेगा की वह शाकाहारी है और सामने वाला माँसाहारी है | सनातनी न तो किसी के पूजा-पाठ में विघ्न डालेगा और न ही किसी को यह अधिकार देगा कि कोई उसपर अपनी मान्यता थोपे |
आदिवासीकोई आदिवासी किसी की भूमि हडपने नहीं आएगा, लेकिन किताबी धार्मिक यानि सम्प्रदायवादी लोग विकास के नाम पर आदिवासियों की भूमि व वन हड़प लेंगे | आदिवासी अपने घरों में ताले नहीं लगाते जबकि शहरी लोग बिना ताले के घर की कल्पना भी नहीं कर सकते | तो सनातनी व्यक्ति दूसरों की संपत्ति पर नजर खराब नहीं करेगा और न वह वन्य जीवों को नष्ट करेगा न ही वनों को | वह केवल उतना ही लेगा, जितना कि उसकी आवश्यकता है |

लेकिन यदि हम धार्मिकों को देखें तो उनकी भूख कभी समाप्त होती नहीं दिखती.. .तिजोरी भर जाए तो बैंक में और बैंक कम पड़ जाये तो स्विस बैंक में और स्विस बैंक में भी रखने की जगह न मिले तो गोदामों में | इसी प्रकार ये जितने भी धार्मिक स्थल बने हुए हैं जैसे कि मंदिर मस्जिद आदि सभी में यही स्थिति है | मंदिरों में तो टनों के हिसाब से सोना पड़ा हुआ है, लेकिन मजाल है वे कभी आपदा ग्रस्त क्षेत्रों पर खर्च करें | क्योंकि इनके अधिकारी सनातनी नहीं हैं |

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सनातन को सीधे शब्दों में समझना चाहें तो सनातन वह धर्म है जो प्राकृतिक है और इसमें कोई भेदभाव नहीं है | यह ऐसा धर्म है जो प्रत्येक प्राणी का जन्मजात पालन करता है.. आप किसी छोटे बच्चे को देखें, यदि उसके पास दो फल हैं और एक आप उसे किसी और को देने के लिए कहें तो वह तुरंत दे देगा | क्योंकि वह अभी मानव निर्मित संकीर्ण मानसिकता के धर्म से अवगत नहीं है.. जैसे जैसे बड़ा होता जायेगा वह हिन्दू मुस्लिम, सिख इसाई आदि बन जायेगा | और फिर वह और अधिक की होड़ में शामिल हो जायेगा | करोड़ों की संपत्ति भी खड़ी कर लेगा, तब भी उसकी भूख शांत नहीं होगी उसे दूसरों की संपत्ति, सुख चैन हमेशा चुभती रहेगी | वह बड़े बड़े काम्प्लेक्स, सोसाइटी बनाएगा लेकिन उससे उसका मन नहीं भरेगा, वह किसानों की भूमि हड़पेगा, आदिवासियों से वन छीनेगा… यानि दूसरों को जितना परेशां किया जा सकेगा वह करेगा लेकिन हफ्ते में एक दिन व्रत रखेगा और मंदिर में जाकर इस लूट की कमाई का कमीशन देकर भगवान् को सेट भी कर लेगा | फिर भगवान् उसे कोर्ट कचहरी से बरी भी करवा देता है |
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सनातनी आत्मनिर्भर होते हैं, इसलिए उन्हें लूटपाट, चोरी-चकारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ती | सनातनी दिन भर मेहनत करते हैं और शाम को सब मिलकर नाच गाना करते हैं | उनकी सारी बस्ती मिलकर हर शाम उत्सव मनाती है… यह सब आधुनिकता और भूमाफियों के कारण अब लुप्त हो गया है कई जगह… यानि आधुनिकता जितना गांवों और वनों में पसरेगी, सनातन संस्कृति लुप्त होती जाएगी और नफरतों के सौदागरों का वर्चस्व बढ़ता जायेगा | तो सनातन धर्म बिलकुल वैसा ही है जैसे सौर मंडल | प्रत्येक ग्रह और उपग्रह को स्वतंत्र है, वह व्यक्तिगत रूप में जैसा है वैसा रहे, लेकिन अपनी सीमा पर रहकर | दूसरों की सीमा यानि कक्षा का अतिक्रमण न करे और यदि वह अतिक्रमण करता है तो उसका अपना ही अस्तित्व मिट जाता है | जैसे कोई उल्का पिंड अपनी कक्षा का छोड़कर किसी और ग्रह की कक्षा में प्रवेश करती है तो उसका आस्तित्व मिट जाता है | ~विशुद्ध चैतन्य
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नोट: आप अपनी सहमती या असहमति विस्तार से रखें ताकि मैं समझ पाऊं कि मुझसे क्या भूल हुई |

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mujhe sab kuch thik laga aapka lekin mai ye nahi samaj pa raha hu ki aapke sabhi lekho me brahman virodhi sabd kyu hai……….. brahmano se itni nafrat kyun.