खुद को समझदार और दुनिया को मूर्ख समझने की मुर्खता न कर

रट्टू विद्वान हमेशा यह ब्रह्मास्त्र अपने पास रखते कि जैसे ही कोई व्यक्ति मौलिक अभिव्यक्ति करना शुरू करता है, तुरंत कहते हैं कि खुद को समझदार और दुनिया को मूर्ख समझने की मुर्खता न कर | इनके पास दलील होगी कि क्या वे लोग मूर्ख थे ? इतने सारे लोग जो उनके दिखाए आदर्शों को मानते हैं, वे क्या मूर्ख हैं ? और इस प्रकार आपका वह आत्मबल तोड़ देते हैं जो आपने बहुत ही हिम्मत से अकेले दम पर इकठ्ठा किया था |

अब कभी ऐसा हो आपके साथ तो आप ऐसे विद्वानों से कहें कि जिन आदर्श महापुरुषों ने लोगों को मार्ग दिखाए, वे तो चले गये | अब जो समझदार लोग उनके दिखाए आदर्शों, मार्गों का अनुसरण कर रहे हैं, उनसे मिलवाइए |

और जब आप उनसे मिलेंगे तो आप पाएंगे कि वे केवल आदर्श पुरुषों की नकल करके बैठे हुए हैं, और वहीं बैठे हैं जहाँ उनके आदर्श पुरुष छोड़ गये थे, एक कदम भी आगे नहीं बढ़े | उदाहरण के लिए किसी भी धर्म गुरु को ले लीजिये चाहे वह शंकराचार्य हों, पॉप हों या और कोई | वे सड़क किनारे चिल्ल्हर गिनते भगवानों की मूर्तियों से अधिक कुछ नहीं हैं |

तो अपनी मौलिकता खोजिये, दुनिया तो मूर्ख है ही और वह अपनी मुर्खता छोड़ने को कभी भी तैयार नहीं होगी | यदि रट्टू विद्वान आपको आगे बढ़ने से रोकते हैं तो यह समझ जाईये कि यदि आपने उनको पार कर लिए तो फिर बाधा समाप्त, क्योंकि वे जहाँ रोक् रहे हैं वहीँ तक उनकी सीमा है, उससे आगे वे एक कदम भी नहीं चल सकते क्योंकि उसके आगे के मार्ग से वे अपरिचित हैं | ~विशुद्ध चैतन्य[bws_pdfprint]

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