भेड़चाल से मुक्त होना ही सर्वाधिक कठिन कार्य है

किसी ने प्रश्न किया कि क्या संन्यास या संन्यासी को परिभाषित किया जा सकता है ?

संन्यास को हम इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं; संसार + न्यास = संन्यास | जो व्यक्ति संसार के संरक्षक की भूमिका निभाता है वह संन्यासी कहलाता है | लेकिन संन्यासी होने के लिए एक साधना आवश्यक है वह स्वयं को जानना | स्वयं + न्यासी = संन्यासी, अर्थात जो स्वयं का संरक्षक होता है वही सन्यासी होने योग्य होता है |

स्वयं का संरक्षक कोई तभी हो सकता है जब वह स्वयं के गुण/दोषों से परिचित होता है और स्वयं स्वयं के रूप में ही स्वीकार करने का साहस कर पाता है | वह दूसरों की नकल नहीं होता है और न ही दूसरों के थोपे आदर्शों, ईष्टों, भेड़चाल में उलझता है | उसका केंद्र उसके स्वयं की आत्मा होती है, न कि मंदिरों/मस्जिदों में कैद कोई ईश्वर |

भेड़चाल से मुक्त होना ही सर्वाधिक कठिन कार्य है क्योंकि फिर दुनिया आपको चैन से जीने नहीं देगी, इसलिए यह एक कठोर साधना की श्रेणी में आ जाता है | दुनिया आपसे व सब छीन लेगी जो उसने आपको दिया है, जैसे कि मान-सम्मान, धन-दौलत, प्रेम-अपनत्व, संगी-साथी…… और जब यह सब आप खो देंगे, तब आपका परिचय स्वयं से होगा | तब आपको पता चलेगा कि आपने कुछ खोया ही नहीं है बस जो अपना नहीं था, उसे ही अपना मानकर जीये चले जा रहे थे |

दुनिया कुछ भी आपको निःस्वार्थ नहीं देती | दुनिया कुछ भी आपको बिना मतलब के नहीं देती, फिर वह मान-सम्मान ही क्यों हो | आज तो जीवन साथी भी निःस्वार्थ नहीं मिलते, आज तो नैसर्गिक आवश्यकता यानि स्त्री पुरुष सम्बन्ध भी कागज के टुकड़ों, बंगला-कोठी, गाड़ी के बदले ही पूरी की जा सकती है | आज वैवाहिक सम्बन्ध भी मोल-भाव पर मिलते हैं…… अर्थात जो स्वाभाविक है वह भी अब स्वाभाविक नहीं है |

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ऐसी परिस्थिति में संन्यास ही श्रेष्ठ मार्ग है जीवन जीने का आधार है | संन्यास का अर्थ बिलकुल भी यह मत लगाएँ कि आपको अविवाहित रहना है, या भौतिक सुखों का त्याग कर देना है | संन्यास का अर्थ केवल इतना ही है कि स्वाभाविक जीवन जीते हुए, स्वयं को ईश्वर की अमूल्य रचना मानते हुए सृष्टि के लिए श्रेष्ठ योगदान देकर जाना | ~विशुद्ध चैतन्य

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