यह एक भ्रम है कि शाकाहारी ही इंसानियत समझ या समझा सकते हैं

आज सुबह सुबह मैसेज बॉक्स में एक सन्देश मिला:

06:21 “जानवर भी जानवर का मांस खाता है।
और मांसाहारी इंसान भी जानवर का मांस खाता है। इसलिए जानवर और मांसाहारी इंसान में कोई अंतर नहीं है। फिर भी ये पाखंडी मांसाहारी इंसान ना जाने क्यों अक्सर शाकाहारियों को इंसानियत का पाठ पढ़ाते रहते हैं? जबकि शाकाहारी इंसान हमेशा जियो और जीने दो की भावना से मानवता या इंसानियत को बनाये रखता है। इस तरह से मांसाहारी इंसानों द्वारा इंसानियत का पाठ पढ़ाया जाना पाखंड या ढोंग तो नहीं है?”

यह एक भ्रम है कि शाकाहारी ही इंसानियत समझते या समझा सकते हैं, मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि शाकाहारियों में हिंसा मांसाहारियों मानवों से कई गुना अधिक होती है | वे इतने हिंसक होते हैं कि दूसरों पर तो क्या, स्वयं पर भी हिंसा करने से नहीं चूकते | ये अनशन, कई-कई दिनों के व्रत, ब्रह्मचर्य के नाम पर नैसर्गिक व प्राकृतिक आवश्यकताओं का दमन, भूमि व धन के लिए वन्य पशुओं से लेकर आदिवासियों और किसानों की भूमि, खेत व वन हथियाकर उसमें कंक्रीट के जंगल खड़े करना और उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए विवश करना या सैनिकों, पुलिस के हाथों अकाल मृत्यु देना…ये सब हिंसा ही तो है ?
इंसानियत का पाठ मांसाहारियों ने ही पढ़ाया है और वही पढ़ाते रहेंगे क्योंकि यही सनातन धर्म है | ढोंग तो शाकाहारी करते हैं अहिंसक होने का, जबकि सम्पूर्ण सृष्टि इन्हीं शाकाहारियों की वजह से नष्ट हो रही है, किसान हों या आदिवासी, सभी इन शाकाहारियों की वजह से ही अकाल मृत्यु मर रहे हैं…शाकाहारियों में यदि इंसानियत होती तो ईश्वर माँसाहारी प्राणियों की रचना ही नहीं करता |
शाकाहारियों की विशेषता यह होती है कि वे स्वयं सामने कम ही आते हैं, बल्कि सरकारी या गैरसरकारी सैनिकों (आजीविका के लिए हत्याएं करने वालों), गौरक्षकों, धर्मरक्षकों, गुंडों, बदमाशों की सहायता से ही सारे हिंसक गतिविधियों को संचालित करते हैं | इसीलिए समाज में यह धारणा बन गयी कि शाकाहारी अहिंसक होते हैं या वे माँसाहार नहीं करते | जबकि अधिकांश शाकाहारी अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा करते हैं और अप्राकृतिक व सनातनधर्म विरुद्ध आचरणों में ही लिप्त रहते हैं |
हाँ वह समय कभी रहा होगा जब सारा समाज माँसाहारी रहा हो और उस समय ऋषियों ने एक ऐसा वर्ग तैयार किया जिन्हें माँसाहार से दूर रहने को कहा गया और उन्हें ऐसे संस्कार दिए गये कि वे शांत व अधिक सभ्य दिखाई दें, ताकि लोग उनसे प्रभावित हों और मांसाहार की अति से किसी प्राणी की प्रजाति को लुप्त होने से रोका जा सके |
सनातन धर्म एक प्राकृतिक धर्म है और उसे समझने व समझाने के लिए जो मानव आगे आते हैं, वे सनातनी कहलाते हैं  | ब्राहमण भी सनातन धर्मियों में ही आते हैं और सैनिक, कसाई, पशुपालक, शर्मन आदि भी सनातन धर्म के अंतर्गत ही कार्य करते हैं | न तो माँसाहार सनातन धर्म विरुद्ध है और न ही शाकाहार | न शाकाहारी श्रेष्ठ है और न ही मांसाहारी श्रेष्ठ है, जब तक कि वे एक दूसरे  का सम्मान करना नहीं सीख जाते | ~विशुद्ध चैतन्य
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