सनातनी किसी भीड़ का हिस्सा नहीं होते

जब मैं सनातन धर्म की बातें करता हूँ तो आर्यसमाजी और ब्राह्मणवादी बड़े खुश होते हैं और कई बार यह भी कहते हैं कि आप सनातन धर्म का बहुत अच्छे से प्रचार कर रहे हैं | लेकिन कुछ पोस्ट जब मैं माँसाहार के समर्थन में दे देता हूँ यह मूर्ती पूजकों के समर्थन में दे देता हूँ तो उनको सदमा लग लग जाता है | फिर कहते हैं कि आप ढोंगी हैं, पाखंडी हैं…. |
असल में इनकी समस्या यह है कि इनको लगता है सनातन धर्म इनकी बपौती है | इनको लगता है कि जो इन्हें पसंद है, जिन बातों से इन्हें प्रसन्नता मिलती है वही सनातनधर्म है, और बाकी लोगों को भी वही सब पसंद करना चाहिए, वही करना चाहिए, वही खाना-पीना चाहिए जो ये लोग खाते पीते हैं….. | सनातन धर्म को ये लोग वैसा ही धर्म मानते हैं जैसा कि इस्लाम, ईसाई….आदि हैं | ईश्वर के नाम पर इनके पूर्वजों ने किताबों में जो नियम कानून लिख रखे हैं, वही सनातन है धर्म है बाकि सभी अधर्म | ये लोग यह भूल रहे हैं कि वेद-पुराण तो केवल ब्राहमणों के लिए ही लिखे गये थे, न कि सम्पूर्ण मानव जाति के लिए, यही कारण रहा कि श्रेष्ठ वर्णों को छोड़कर किसी को नहीं पढ़ने दिया जाता था | उनमे बताये गये नियम केवल उनपर ही लागु होते हैं जो ब्राहमण होने का दंभ भरते हैं, न कि उनपर जो ब्राह्मण नहीं हैं | इनमे जो ब्रह्मचर्य के नियम बताये गये हैं वे ब्राहमणों के लिए है, न कि सम्पूर्ण मानव जाति या सनातनियों के लिए | तो पहले तो आप ब्राह्मण बनिए और ब्राह्मण होने के   पहला नियम यह है कि वह किसी भी राजकीय सेवा में अधीनस्थ के रूप में या वेतन लेकर कार्य नहीं करेगा | दूसरा यह कि वह किसी की नौकरी नहीं करेगा या ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा, जिसमें पारिश्रमिक तय की जाती हो | वह संग्रह नहीं करेगा, वह मोलभाव नहीं करेगा, किसी की सहायता या सहयोग से इनकार नहीं करेगा नहीं करेगा, अतिथि को कभी भूखे पेट या बिना जलपान कराये विदा नहीं करेगा, किसी के घर अनुष्ठान या श्राद्ध या कोई भी कार्य करवाने के लिए शुल्क तय नही करेगा और जो भी उसे मिलेगा वही ईश्वर का आशीर्वाद समझकर ग्रहण करेगा…... क्या इन नियमों का पालन करते हैं आप ?
यदि नहीं तो फिर काहे के ब्राहमण ???
तो मैं जब सनातन की बात करता हूँ तो वह ब्राह्मणवादी या आर्यसमाजी सनातन धर्म की नहीं, बल्कि शास्वत सनातन धर्म की बात करता हूँ | वह सनातन धर्म जो आपकी ईश्वरीय किताबों से परे हैं | वह सनातन धर्म जो आज तक आपकी समझ में नहीं आया हज़ारों वर्षों तक वेद पुराण रटने के बाद भी | वह सनातन धर्म जिसका पालन शेर भी करता है और बकरी भी, शार्क भी करती है और छोटी मछलियाँ भी | मच्छर भी करता है और छिपकली भी… यानि मानवों में आदिवासियों को छोड़ सम्पूर्ण प्राणी जगत व ब्रह्माण्ड करता है |
इसी सनातन धर्म के अंतर्गत ही आता है ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ | अब ब्राहमण कहते हैं कि यह श्रीकृष्ण ने कहा था, कोई और नहीं कह सकता |
क्यों नहीं कह सकता ?
प्रत्येक प्राणी ईश्वर का अंश है और प्रत्येक ब्रह्म का सूक्ष्म रूप है, तो वह स्वयं को ब्रह्म क्यों नहीं कह सकता ? जब आप लोग केवल अपने पूर्वजों के कर्मों के फल स्वरुप खुद को ब्राह्मण कह सकते हो वह भी ब्राहमणों जैसा कोई गुणधर्म न होते हुए भी, तो फिर साक्षात् ब्रह्म स्वरुप मानव स्वयं को ब्रह्म क्यों नहीं कह सकता ?
जैसे ही हम स्वयं को स्वीकारना शुरू कर देते हैं, हमारे भीतर परिवर्तन होना शुरू हो जाता है और हम अपनी मौलिकता को प्राप्त करने लगते हैं | पहले हम समाज द्वारा थोपे गये व्यक्तित्व को जी रहे होते थे, लेकिन स्वयं की स्वीकारोक्ति के साथ ही हम सीधे ब्रह्माण्ड से जुड़ने लगते हैं | पहले हम सम्प्रदायों से जुड़े होते थे, जैसे कि हम हिन्दू हैं, हम मुस्लिम हैं, हम इसाई हैं, हम ब्राहमण हैं, हम क्षत्रिय हैं…. आदि इत्यादि… लेकिन जब अहम् ब्रह्मास्मि की स्वीकारोक्ति करते हैं, हम इन दडबों से मुक्त होने लगते हैं और विराट ब्रह्म का अनुभव करने लगते हैं | हमारे भीतर सर्वधर्म समभाव की भावना जागृत होने लगती है और हम हर किसी को उसी के रूप में स्वीकार करने लगते हैं | लेकिन हम अपनी मौलिकता के साथ समझौता नहीं करते | हम किसी और को यह अधिकार नहीं देते कि वह अपनी मान्यताएं या विचारधारा हम पर थोपे और न ही हम किसी पर अपनी विचारधारा या मान्यताएं थोपेंगे | यदि हम सामने वाले से असहज अनुभव करेंगे तो हम उनसे दूरी बना लेंगे, लेकिन उनको हम नहीं कहेंगे कि वे हमारी प्रसन्नता के लिए खुद को बदल लें | वे जैसे हैं वैसे ही रहें, हमारी पसंद का कोई व्यक्ति हमें कहीं और मिल जायेगा | किसी को बदल कर अपनी पसंद का बनाना सामने वाले के प्रति हिंसा ही है | हम उसकी मौलिकता के उस अधिकार का हनन कर रहे हैं जो, सनातनधर्मानुसार उसे प्रकृति व ईश्वर से प्राप्त है |
इसलिए मैं जब सनातन की बात करता हूँ, तो किसी दड़बे या ईश्वरीय किताबों पर आधारित धर्म की बात नहीं कर रहा होता हूँ, बल्कि उस धर्म की बात कर रहा होता हूँ, जो प्राकृतिक है, जो सनातन है | और सनातनी किसी भीड़ का हिस्सा नहीं होते, बल्कि स्वयं में अपनी आभा व मौलिकता लिए एक ऐसा व्यक्ति होता है जो भेड़चाल में नहीं चलता | ~विशुद्ध चैतन्य
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