निष्काम प्रेम, भक्ति, कर्म आदि लेकिन निष्काम जैसा कुछ होता ही नहीं है


मोक्ष और निष्काम… दो ऐसे विषय हैं जिसे शायद बहुत ही कम लोग समझ पाते हैं | यदि शास्त्रों से समझने जाएँ तो मोक्ष का अर्थ है जन्म-मरण से मुक्ति और एक ऐसी स्थिति को प्राप्त हो जाना जहाँ न भूख है, न प्यास है केवल सुख या आनन्द ही आनन्द है |

मोक्ष जीते जी प्राप्त नहीं किया जा सकता ऐसा मान लिया क्योंकि जिसने मोक्ष प्राप्त कर लिया वह लौट कर नहीं आया बताने कि मोक्ष वास्तव में है क्या | मोक्ष यानि मुक्ति का वह भाव जहाँ केवल सुख की अनुभूति मात्र है और वह शब्दों की पकड़ से परे है | उसे शब्दों से व्यक्त करना ही ही कठिन हो….. और यह इतना आकर्षक व मोहक बना दिया गया कि हर कोई मोक्ष के नाम पर सब कुछ लुटाने के लिए तैयार बैठा है | बड़ी बड़ी धर्म की दुकाने और व्यापारिक क्षेत्र बन गये मोक्ष के नाम पर, विश्व का सबसे बड़ा व्यवसाय खड़ा हो गया मोक्ष के नाम पर…
लेकिन मोक्ष नहीं मिला किसी को |

क्योंकि मोक्ष जीते जी प्राप्त किया जा सकता है मरने के बाद नहीं, लेकिन सारा धर्म ही खड़ा हुआ है मारने पर कि मरने के बाद ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है | फिदायीन खड़े हो गये मोक्ष के नाम पर और खुद को उड़ाने लगे बारूद से और अपने साथ उड़ा देते हैं न जाने कितने परिवारों की खुशियों को और न जाने कितने मासूमों के सपनों को | न जाने कितने कितने धर्मों के ठेकेदारों का धंधा ही टिका हुआ है दंगों और निर्दोषों की हत्याओं से और वे भी यही मान रहे हैं कि वे कोई पुण्य कर रहे हैं क्योंकि वे दड़बों, पाखंडों, ढोंग की निंदा करने वाले व असहमत लोगों की हत्या करके धर्म की रक्षा कर रहे हैं |

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वास्तव में मोक्ष यानि मुक्ति का भाव मरने के बाद नहीं जीते जी ही समझा व अनुभव किया जा सकता है | यह अनुभूति मुझे कई बार हो चुकी है और आपको भी हो चुकी है, बस समझने में चूक गये हम | हमने कई बार ऐसा अनुभव किया होता है कि हम बिलकुल हल्के हो गये, अकारण ही स्वतंत्रता का अनुभव हुआ, अकारण ही सुख का अनुभव हुआ, अकारण ही नाचने गाने का मन किया और हम नाचे भी, गाये भी | वह अनुभव ऐसा रहा जब लगा हो कि आप पर कोई बोझ नहीं है, आप हर किसी की सहायता कर पाने में सक्षम हैं, आप सड़क में खेलते बच्चे को गोद में उठा लेते हैं और उसे टॉफी खरीद देते हैं, या कपड़े खरीद देते हैं, आप अपनी काम वाली बाई को खुश होकर अपनी पुरानी साड़ी दे देती हैं या नौकर को अपने पति का पुराना कोट-पेंट दे देती हैं | ख़ुशी का आलम यह होता है कि बच्चा होमवर्क न भी करे तो उस दिन उसे मार नहीं पड़ती……तो जब हम पूर्ण स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं और सर से सारा बोझ उतरा हुआ समझते हैं तब जो अनुभव होता है वही मोक्ष है | जन्म-मरण से मुक्ति के नाम पर चल रहे व्यापार तो केवल इस लिए फल-फूल रहे हैं, क्योंकि समाज पहले तो भेड़-बकरियों के संस्कार थोप देता है, और फिर भेड़चाल में चलने को बाध्य करता है | जब आपकी अंतरात्मा बगावत करती है तब बताया जाता है कि दुनिया तो दुःख का सागर है और मोक्ष प्राप्त होने पर ही इन दुखों से मुक्ति मिलेगी | और मोक्ष पाने के लिए भगवानों के दफ्तर यानि मंदिर-मस्जिद, या तीर्थों में जाकर चढ़ावा चढाओ, खाते पीते और प्रोफेशनल खाऊ पंडितों को भोग लगाओ….. तब जाकर मोक्ष कि प्राप्ति होगी |

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ये भोग में बुलाये जाने वाले प्रोफेशनल पंडित भी कमाल के होते हैं | कई लोगों का भोजन अकेले हजम कर लेने वाले और ऊपर से सौ डेढ़ सौ रसगुल्ले हाजमे के रूप में खाने वाले ये प्रोफेशनल पंडित भी ईश्वर ने बहुत सोच समझकर बनाए हैं | फिर ये खाकर भी एहसान दिखाते हैं और दक्षिणा में मोटी रकम वसूल लेते हैं | और मेरी समझ में आ तक यह नहीं आता कि लोग उतने ही पैसों से किसी को आत्मनिर्भर होने में सहयोग करके न जाने कितनी पीढ़ियों का भला कर सकते हैं, लेकिन करते नहीं | किसी गरीब किसान को बीज या खाद खरीद कर दे देंगे एक पंडित पर खर्च होने वाले रुपयों से तो वह नहीं करेंगे, बल्कि बीज के पैसे देकर भी ब्याज वसूल लेंगे या बदले में अनाज ले लेंगे | खैर जाने दीजिये…. हम क्यों किसी के धर्म-कर्म में बाधा डालें ? जिनको पंडितों के पेट से मोक्ष का रास्ता मिलता है तो उनके लिए वही रास्ता ठीक है |

निष्काम की बात करें तो हर कोई रटा चला जा रहा है निष्काम प्रेम, भक्ति, कर्म आदि लेकिन निष्काम जैसा कुछ होता ही नहीं है यही नहीं समझ पाए आज तक | निष्काम यानि जिस कर्म में कामना न हो |

आप निष्काम कर्म करते हैं ताकि आपको मोक्ष मिले… तो निष्काम कहाँ हुआ ?

आप निष्काम भक्ति करते हैं ताकि आपको सुख मिले, समृद्धि मिले, मनोकामना पूरी हो….. तो निष्काम कहाँ हुआ ?

आप निष्काम प्रेम करते हैं ताकि सामने वाला भी निष्काम प्रेम करे, तो निष्काम कहाँ हुआ ?

आप निष्काम सेवा करते हैं ताकि ईश्वर प्रसन्न हों, समाज में सम्मान बढ़े….. तो निष्काम कहाँ हुआ ?

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अब निष्काम शब्द बना है तो निष्काम होता ही होगा कुछ न कुछ | मेरी नजर में निष्काम प्रेम का पहला अनुभव माँ से ही प्राप्त होता है | लेकिन यहाँ भी भेदभाव हो जाता है जैसे लड़का हुआ तो उसके प्रति निष्काम प्रेम की धारा अधिक बहेगी | लड़की हुई तो निष्काम भाव से उसे कूड़े के ढेर में भी फेंक आते हैं |

निष्काम प्रेम को समझना हो तो किसी बच्चे के व्यवहार को ध्यान से देखें | वह पशुओं के बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है वह देखें…. कुछ बच्चे आप ऐसा पायेंगे जो बिलकुल अद्वैत का अनुभव करवा देंगे | निष्काम सेवा को समझना हो तब अपने ही जीवन के फ्लैशबैक में जाइए और याद कीजिये कि कभी आपने कोई ऐसा काम किया जिसमें आपने किसी की सहायता की हो और आपके मस्तिष्क ने कोई गणित न लगाया हो, कोई लाभ-हानि न सोची हो ?

~विशुद्ध चैतन्य

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