अनपढ़ता में जो सुख है, वह पढ़े-लिखे होने और अंग्रेजी बोलने में नहीं है

अनपढ़ होने और पढ़े-लिखे होने में अंतर यह है कि पढ़े-लिखे लोग पर्यावरण (वन, वृक्ष, कृषिभूमि, भू-सम्पदा) संरक्षण को अंधविश्वास और रूढीवादीता मानते हैं और कंक्रीट के जंगलों को विकास मानते हैं | अनपढ़ समाज आज भी प्रकृति को ही ईश्वर मानता है और भूमि को माँ कहता है |

ऐसे में मेरी अनपढ़ बुद्धि मानती है कि हर वे कारखाने, मॉल, सिनेप्लेक्स, ऑफिस, साइबर, डिजिटल और इलेक्ट्रोनिक/इलेक्ट्रिकल सिटी, जिनका कृषिभूमि में कोई योगदान न होता हो, जिनको वृक्षों, पौधों, वनों की कोई आवश्यकता न होती हो, उनका निर्माण बंजर भूमि या रेगिस्तानों में किया जाना चाहिए |

इससे लाभ यह होगा कि पढ़े-लिखे लोग जितनी चाहें उतने सतह पर या भूमिगत काम्प्लेक्स बना सकते हैं रेगिस्तानों में | जितना चाहे उतना विकास कर सकते हैं कंक्रीट के जंगलों का और वे अन्धविश्वास और गंवारूपन से भी अपने बच्चों को दूर रख सकते हैं | खेत खलिहान, पहाड़, जंगल आदि वे बच्चों को नेशनल ज्योग्राफी और डिस्कवरी चैनल में दिखा सकते हैं | इसप्रकार हमारा देश विकास भी कर लेगा और प्राकृतिक वन सम्पदा व कृषि योग्य भूमि भी सुरक्षित रह जायेगी |

जो भी मंत्री या प्रधानमंत्री कृषि या वनसम्पदा को विकास में बाधक मानता हो, उसके लिए रेगिस्तान में राजधानी बना दी जाए और धर्मगुरुओं द्वारा शास्त्रों में लिखवा दिया जाए कि विकासोन्मुख शासक को रेगिस्तान से बाहर निकलने पर स्वर्ग, मोक्ष, बैकुंठ, जन्नत, हेवेन, हूरें, अप्सराओं की प्राप्ति नहीं होगी और हमेशा के लिए नर्क की आग में जलना पड़ेगा |

इन विकसित व अत्याधुनिक मानवों के शहर से पिछड़े अन्धविश्वासी ग्रामीणों के बीच बुलेट ट्रेन चलवाई जाए, ताकि जो भी ग्रामीण पढ़ा-लिखा और विकसित हो जाए, उसे शहर एक्सपोर्ट किया जा सके |

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मेरी अनपढ़ बुद्धि कहती है, तब भारत में शुद्ध व साफ़ हवा मिलना शुरू हो जाएगा, तब भारत फिर से हरा भरा हो जाएगा, तब हर ग्रामीण सुखी व समृद्ध हो पायेगा | क्योंकि अनपढ़ता में जो सुख है, वह पढ़े-लिखे होने और अंग्रेजी बोलने में नहीं है | ~विशुद्ध चैतन्य

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