फिर ये नेता नये मुर्गे पालते हैं…

कट्टरपंथियों और मुर्गों में एक समानता यह होती है कि दोनों ही विवेकहीन* होते हैं और हमेशा लड़ने के बहाने खोजते रहते हैं | इनकी इसी विशेषता के कारण कुछ लोग इनको पालतू बना लेते हैं और फिर आपस में लड़ा कर सट्टा खेलते हैं सत्ता के लिए |

खिलाड़ियों के पास ऐसे लड़ने मरने वाले मुर्गों की कोई कमी नहीं होती इसलिए यदि लाख दस लाख मर भी गये तो कोई फर्क नहीं पड़ता | बीच बीच में घोषणा भी करते रहते हैं कि दस दस मुर्गे पैदा करो…ताकि सट्टे के खेल के लिए मुर्गे कम न पड़ जाएँ |

इन मुर्गों को रंगीन छल्ले पहना देते हैं, पंजों में ब्लेड बाँध देते हैं और छोड़ देते हैं दंगा करने के लिए, लेखकों, बुद्धिजीवियों की हत्याएं करने के लिए, अफवाह फैलाकर, धर्म और जाति के नाम पर निर्दोषों की हत्याएं करने के लिए | फिर कोर्ट और पुलिस का ड्रामा चलता है, गिरफ्तारियां होती हैं और कई वर्षो तक केस चलता है, फिर बाइज्जत बरी हो जाते हैं या जमानत पर रिहा हो जाते हैं, फिर चुनाव लड़ते हैं, फिर नेता बन जाते हैं, फिर जनता को सिखाते हैं कि कानून का पालन कैसे करना चाहिए |

फिर ये नेता नये मुर्गे पालते हैं… और इसी प्रकार से यह दुनिया चलती चली जाती है, सट्टे चलते रहते हैं सता के लिय, दौलत के लिए…. यह खेल न जाने कब से चली आ रही है और न जाने कब ख़त्म होगा !!! ~विशुद्ध चैतन्य

नोट: *मुर्गे स्वाभाविक व प्राकृतिक रूप विवेकहीन नहीं होते | लड़ाके होते हैं क्योंकि उसे अपने परिवार की रक्षा करनी होती है | अकारण वे नहीं लड़ते फिरते और न ही दूसरों के घरों में सूअर और गाय का माँस फेंककर लड़वाते फिरते हैं |

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