“जीवन एक संघर्ष है”

यही वह वाक्य है जो हम बचपन से सुनते-सुनाते चले आये और न जाने कितनी पीढ़ियों से यही परम्परा चली आ रही है | जिसने सर्वप्रथम इस वाक्य की खोज की, उसने किन परिस्थितयों में किन लोगों से और क्यों कही यह शायद न ही किसी ने जानने का प्रयास किया और न ही खोजने का | हम तोतों की तरह रटते रटाये चले जा रहे हैं, “जीवन एक संघर्ष है”, लेकिन क्यों संघर्ष है उसपर चिन्तन-मनन नहीं करते |
संघर्ष है क्योंकि जीवन का आधार है, ‘भोजन-जल-जमीन’ !
विरोध
आदिकाल से संघर्ष छिड़ा हुआ है भोजन, जल और जमीन के लिए, आज तक चल रहा है और तब तक चलेगा जब तक सृष्टि में जीवन है | सुर-असुर संग्राम, देव-दानव संग्राम, दानव-मानव संग्राम, पशु-मानव संग्राम, एक देश का दूसरे देश से संग्राम, एक राज्य का दूसरे राज्य से संग्राम, एक कबीले का दूसरे कबीले संग्राम, पड़ोसी का पड़ोसी से संग्राम….. और हर संग्राम के बाद विजेता को सम्मान प्राप्त हुआ, उनमें से कुछ को ईश्वर या ईश्वर का अवतार घोषित कर दिया गया और पराजित दुष्ट, शैतान घोषित हो गया | विजेता के सारे दुर्गुण व अत्याचार पुण्य हो गये और पराजित के सारी अच्छाइयाँ बिसरा दी गयीं | यह आवश्यक नहीं कि ऐसा ही हुआ हो, लेकिन वर्तमान में जो कुछ हो रहा है, उसी से अनुमान लगा रहा हूँ कि ऐसा हुआ होगा | भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, व अन्य स्वतंत्रता सेनानी किसी ज़माने में आतंकवादी, देशद्रोही माने जाते थे बाद में वे सभी वंदनीय हो गये, आदर्श हो गये | किसी जमाने में नाथूराम गोडसे हत्यारा माना जाता था, आज वह पूजनीय हो गया | किसी ज़माने में संघ प्रतिबंधित संगठन था आज सत्ता उसके हाथ में हैं…. और प्रजा ?
प्रजा तब भी हाँ में हाँ मिला रही थी और आज भी | प्रजा तब भी जय जय कर रही थी विजेताओं की और आज भी | तब भी राजा जो कह दे, वही सत्य था और आज भी | तब भी राजा का मंत्री, संतरी या सिपाही जो कह दे वही सही था और आज भी | और यही प्रजा रटती रहती है कि जीवन संघर्ष है | मुग़ल आये तो उनकी जय, अंग्रेज आये तो उनकी जय, कल चीन या पाकिस्तान आ जाए तो उनकी जय…. लेकिन बड़े ही दार्शनिक अंदाज में कहेंगे ‘संघर्ष ही जीवन है’ !
न इनको संघर्ष का अर्थ पता न ही कभी संघर्ष किया न कभी गलत का विरोध किया और न कभी अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाया, लेकिन संघर्ष की बातें बड़े जोर शोर से करते हैं | ये सभ्य प्रजा, राजा के वफादार प्रजा यदि संघर्ष की बातें करें तो हास्यापद हो जाता है | संघर्ष जिन्होंने किया, जिन्होंने जीया वे यदि संघर्ष की बातें करें तो उसका कोई अर्थ भी है | राणा प्रताप यदि संघर्ष की बात करें, लक्ष्मी बाई, फुलकारी बाई, दुर्गावती…. आदि संघर्ष की बातें करें तो कुछ बात गले उतरती भी है… लेकिन राजा के गलत निर्णयों और करतूतों का भी समर्थन करने वाले चापलूस प्रजा और दुमछल्लों के मुँह से संघर्ष की बातें अशोभनीय है |
संघर्ष है भूमि का, संघर्ष है जमीन का, संघर्ष है भोजन का | लेकिन क्या वास्तव में संघर्ष इसलिए ही हो रहा है क्योंकि भोजन, जल और भूमि कम पड़ रही है ?
बिलकुल भी नहीं !
मनुस्मृति के आठवें अध्याय में कहा गया है;

त्रयः परार्थे क्लिश्यन्ति साक्षिणः प्रतिभूः कुलम् |

चत्वारस्तूपचीयन्ते विप्रआढ्योवणिङ् नृपः || १६९ ||

                   अर्थात साक्षी (गवाही देने वाला), जमानती तथा परिवार ये तीनों दूसरों के लिए दुःख सहते हैं
और ब्राहमण, वैश्य, साहूकार तथा राजा ये चारों दूसरों के कारण बढ़ते हैं अर्थात उन्नति करते हैं |
तो यह श्लोक स्पष्ट बता रहा है कि सारा झगड़ा उन्हीं के कारण है जो परजीवी हैं | इनको समाज ने सुखसुविधाएं, मान-सम्मान दिया इस आशा में कि ये लोग खेती-मजदूरी में अपनी उर्जा नष्ट न करके समाज व राष्ट्र के हित की लिए चिन्तन-मनन करेंगे, वे कार्य करेंगे जिनसे समाज व राष्ट्र का उत्थान होता हो, जिससे आम प्रजा सुख व चैन की नींद सो सकती हो | प्रजा ने जिन्हें प्रजापालक, न्यायी (संरक्षक) के पद पर आसीन किया वे स्वयं को मालिक समझ बैठे और प्रजा से उसकी भूमि, संपत्ति छीनने लगे नए नए नियम व अधिनियम बनाकर | वैश्य दिन प्रतिदिन धनवान होते चले जा रहे हैं तो उनकी भूख भी बढ़ती चली जा रही है | अब वे विकास, उद्योग व रोजगार के नाम पर गरीबों की भूमि छीनने लगे और चूँकि धन का कोई अभाव नहीं है, तो सरकारी व गैर सरकारी गुंडों, हत्यारों, सैनिकों की सहायता लेने लगे | बाहुबल व धन के बल पर विधि और विधायिका, दोनों को अपना गुलाम बना लिया | अपनी आवश्यकता से अधिक की कामना के कारण इन्होने समाज में असुरक्षा व आतंक का वातावरण बना दिया | जिसके कारण अराजकता उत्पन्न हो गयी और वही अराजकता आपसी टकराव का कारण बनीं |
आज साहूकारों ने रूप बदल लिया और आधुनिक हो गये | अब वे बैंकों के मालिक बन गये, अब वे शिक्षण संस्थान व केंद्र चलाते हैं, अब वे मंदिर से लेकर प्रशासनिक पदों तक पर विराजमान हैं | अब वे जज भी हैं और वकील भी | अब वे संतरी भी हैं और मंत्री भी | लेकिन अपनी आनुवांशिक गुणधर्म से मुक्त नहीं हो पाए और ब्याज, रिश्वत, बलपूर्वक वसूली वाली मानसिकता से आज भी कार्य कर रहे हैं | और यही भ्रष्टाचार के मूल आधार भी हैं |
उपरोक्त कारणों से प्रजा को न्याय नहीं मिल पाता और प्रजा असंतुष्ट रहती है, शोषण व अत्याचार सहती है और फिर जब अति हो जाती है, तब उनके पास सिवाय विद्रोह करने के और कोई विकल्प नहीं बचता | यही कारण है कि संघर्ष बढ़ता जाता है | राजा को घुमने फिरने से फुर्सत नहीं, और उनके अधिनस्थों को लूटने खसोटने से फुर्स्त्न नहीं | राजा के सहयोगियों को धर्म और जाति के नाम से नफरत फ़ैलाने से फुर्सत नहीं…. ऐसे में आपसी संघर्ष नहीं बढेगा तो क्या आपसी सौहार्द बढ़ेगा ?
तो जीवन ही संघर्ष है वाला डायलॉग जानबुझकर नफरत के बीज बोकर, प्रताड़ना, उपेक्षा, व शोषण करके तैयार किये गये वातावरण के लिए नहीं है, बल्कि उस संघर्ष के लिए है जो प्राकृतिक रूप से स्वाभाविक रूप कोई किसान करता है प्राकृतिक आपदाओं, विपदाओं, असुविधाओं से | संघर्ष है होना चाहिए बाहरी आक्रान्ताओं से न कि उनसे, जिन्हें जनता ने मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा दिया | जो अपनी भौतिक वासना, लोभ के कारण दूसरों की भूमि, जल व जीवन यापन का मौलिक अधिकार छीनते है, उनसे संघर्ष होता रहा है और होता रहेगा | चाहे तो आप इतिहास उठाकर देख लें | ~विशुद्ध चैतन्य
रेस

 

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