परिणाम यदि बुरा भी हो तो भी कोई चिंता नहीं, नए मार्ग खुलेंगे…


बचपन से मुझे सिखाया जाता रहा कि किसी से झगड़ा मत करो, कोई बुरा भी कहे तो सर झुका कर आगे निकल जाओ, कोई मारने आये तो हाथ जोड़ दो….. क्योंकि मेरे पिताजी खुद ही बहुत जुझारू थे | वे जहाँ अन्याय देखते थे तो कूद पड़ते थे पीड़ित के पक्ष में | मुझे याद है अंडमान की वह घटना जब आदिवासियों के लिए कई दिन तक पोर्टब्लेयर से राशन नहीं पहुँचा | पिताजी चिठ्ठी पर चिठ्ठी भेजते रहे लेकिन कोई उत्तर भी नहीं दिया जा रहा था |

आदिवासियों को तो कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ना था, वे समुद्र पर निकल जाते और मछलियाँ पकड़ कर जैसे पहले जीते आ रहे थे वैसे ही जी रहे थे | उन्हें तो सभ्य बनाने की जिम्मेदारी मेरे माता-पिता को ही सौंपी गयी थी | तो जब अनाज ही नहीं है द्वीप में तो वे यहाँ द्वीप में क्यों रुकेंगे ?

पिताजी को इतना गुस्सा आये कि जंगल से एक पेड़ की डाल काटकर रूलर बनाया | वह काले रंग की लकड़ी थी और कहते थे कि उसमें न दीमक लग सकती है और न ही कोई कीड़ा मकोड़ा उसे नष्ट कर सकता है | होती भी वह अन्य लकड़ियों से भारी थी | तो वह रूलर लेकर वे पोर्ट बलेयर निकल गये एक दिन कि आज डीसी का सर तोडूंगा इससे | खैर जाने के बाद क्या हुआ वह तो नहीं पता लेकिन राशन लेकर आ गये | लेकिन परिणाम बाद में यही हुआ कि उनकी तनखा रोक ली जाती थी या किसी और तरीके से उन्हें परेशान किया जाता था, कभी दवाएं नहीं भेजी जाती थीं, कभी डॉक्टर को वापस बुला लेते थे कि उसका ट्रांसफर कर दिया गया…..इस तरह हमारा परिवार कभी मणिपुर कभी नागालेंड, कभी अरुणाचल प्रदेश….. भटकते रहे | जहाँ भी गये पिताजी का उग्र स्वभाव व ईमानदारी अधिकारियों और मंत्रियों के लिए सरदर्द ही सिद्ध हो रहा था…. उन्होंने हर उस जगह भेजा हमें, जहाँ से जिन्दा लौटना मुश्किल था उस समय… लेकिन माता-पिता जहां भी जाते आदिवासियों को जीत लेते थे | एक समय ऐसा भी आया कि माँ को कैंसर हो गया और अधिकारियों और संस्थाओं ने कोई सहयोग नहीं किया उनके इलाज में और उनकी मृत्यु हो गयी, तब पिताजी की हिम्मत टूट गयी | उस समय पिताजी को शायद ७००/ रूपये महिना मिलता था | और कुछ वर्ष बाद पिताजी वहां से त्यागपत्र दे दिया | बाद में पता चला कि उनके शिष्य को राष्ट्रपति से अवार्ड दिया गया आदिवासियों को सभ्य बनाने के लिए | जबकि उनका योगदान कुछ भी नहीं था सिवाय इसके कि वे पिताजी को असिस्ट करते थे |

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तो मुझे बचपन से इसी लिए मेरी माँ सिखाती रहीं कि दूसरों से मत उलझो, उससे कोई लाभ नहीं होने वाला | शायद वह जो कुछ देख रहीं थीं, जिस परेशानी से हमारा परिवार गुजर रहा था उसी से प्रभावित होकर नहीं चाहतीं थी कि मेरे जीवन में भी ऐसे ही दुःख आयें | कल जब मैं भी नौकरी करूँगा, तब अधिकारी मुझे भी इसी प्रकार परेशान करेंगे जैसे कि पिताजी को किया करते थे |

लेकिन मैं पैदा ही हुआ था पिताजी के गुणों को लेकर | जिद्दी था बचपन से ही हाँ मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करता था कि मेरी तरफ से कोई ऐसी बात न हो, जिससे किसी को कोई तकलीफ पहुँचे | जब नौकरी करने लगा तब देखा कि मालिक हमें एक गुलाम से अधिक दर्जा नहीं देता | जब चाहे बुला ले, जितनी देर तक चाहे काम करवाए…. और ओवरटाइम भी उस समय सवा रूपये प्रति घंटा मिला करता था | एक दिन अचानक मेरे दिमाग में यह भाव आया कि यदि नौकरी नहीं रही तो क्या हो जायेगा ? मैंने बगावत कर दी और वह शायद उस तीन सौ के स्टाफ वाली एडवरटाइजिंग कम्पनी में पहली बगावत थी | मुझे पूरा विश्वास था कि मुझे नौकरी से निकाल दिया जाएगा और मैंने दूसरी कम्पनी से बात भी कर रखी थी….लेकिन हुआ उल्टा ही | मेरी सारी शर्ते मान ली गयीं और सुबह के नाश्ते में मुझे एक पाव दूध और चार पीस ब्रेड मक्खन लगा भी मिलने लगा |

बस उस दिन से मैंने डरने, झुकने, किसी की दादागिरी या धमकी को सहन करना छोड़ दिया | मैं अपने स्वाभाविक उस रूप में आ गया जो अब तक केवल इसलिए दबाकर रखा था बरसों से कि किसी को बुरा न लगे | केवल सहन करता चला जा रहा था | लेकिन अब सहन करने का नियम त्याग दिया | इसका असर यह हुआ कि दो साल में ही मैंने उस उंचाई को पा लिया जो शायद कई वर्षों से उस फील्ड में बैठे लोगों को नसीब नहीं था | पाँच सौ रूपये से मैंने एडवरटाइजिंग एंड ब्रॉडकास्टिंग के फील्ड में कदम रखा और पाँच साल में ही तेरह हज़ार प्रतिमाह पर पहुँच गया और दूर दूर से लोग आने लगे… केवल नाम ही चलता था मेरा और कई सिंगर और म्यूजिक कम्पनी तो कई कई दिन तक इंतजार करती थीं मेरा |

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यह सारा वृतांत उन लोगों के लिए सुनाया मैंने, जो भयभीत हैं कि यदि हमने अन्याय या गलत का विरोध किया तो गलत होगा… यह ध्यान रखें, आप कोई सेवा देते हैं, उसी की कीमत आपको दी जाती है, कोई एहसान नहीं करते आप पर आपके मालिक | जब लगे कि आपकी नौकरी बोझ बन रही है और ख़ुशी नहीं मिल पा रही, तो इसका अर्थ है कि अब वह नौकरी छोड़ देनी चाहिए या फिर जो बातें आपको परेशान कर रहीं हैं, उसे अपने मालिक के सामने स्पष्ट रूप से रख देना चाहिए कि यह सब बातें मुझे परेशान कर रहीं है और मैं इसे सहन नहीं कर पाउँगा | चेलेंज लेना सीखें, जोखिम उठना सीखें, कोई करण-अर्जुन नहीं आने वाला उद्धार करने के लिए | अपनी लड़ाई स्वयं लड़ें |

परिणाम यदि बुरा भी हो तो भी कोई चिंता नहीं, नए मार्ग खुलेंगे… भीतर झाँकिये स्वयं के और खोजिये स्वयं को | अपनी खुशियों को खोजिये… .मोक्ष का वास्तविक रूप है प्रसन्नता, सुख का अनुभव और जब यह सुख का भाव स्थिर हो जाये, तब समझिये कि मोक्ष प्राप्त हो गया…. बाकि मरने के बाद जो मोक्ष मिलता है वह कैसा होगा उसकी चिंता छोड़ दीजिये | जीते जी मोक्ष प्राप्त करें मरने की प्रतीक्षा न करें |

पिताजी से यही गलती हुई कि उन्होंने संस्था से वफादारी निभाई, और संस्था ने यह समझा कि पिताजी के पास कोई विकल्प नहीं है, कहीं और जायेंगे तो उन्हें इतनी अच्छी तनखा नहीं मिलेगी | जबकि पिताजी मध्यप्रदेश में पूरे राज्य में हमेश टॉपर रहे थे | कभी सेकंड नहीं आये कॉलेज तक | पुलिस में उच्च पदाधिकारी के पद के लिए उनका सिलेक्शन भी हुआ लेकिन धनाभाव के कारण वे इंटरव्यू के लिए भी न जा सके थे और फिर अंत में उन्होंने एक समाज सेवी संस्था, में नौकरी शुरू की… | लेकिन वे पैतीस वर्षों तक उस संस्था को नेही छोड़ पाए, जबकि विदेशों से उनको ढेरों नौकरियां मिल रहीं थी, बड़ी बड़ी संस्थाएं उन्हें बुला रहीं थी…. लेकिन तब तक नौकरी नहीं छोड़ीं, जब तक सब कुछ बिखर न गया…. उनके बेटे उनसे अलग हो गये, पत्नी हमेश के लिए खो गयीं | बाद में उन्होंने जितने भी संस्थाओं में काम किया, अपनी ही शर्तों पर किया और सभी में उन्हने सम्मान मिला | लेकिन जब तक वे दूसरों के लिए लड़ते रहे, लेकिन अपनी समस्याओं को दूर करने के लिए नहीं लड़े, तब तक उन्हें शोषित ही होना पड़ा |

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तो यह सब झेलने के लिए हम इस दुनिया में नहीं आये आये हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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