आपो दीपो भवो

स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था, “भीतर से बाहर की ओर यात्रा करो…|” गौतम बुद्ध ने कहा था, “आपो दीपो भवो |” यही बातें लगभग सभी अध्यात्मिक गुरुओं ने कहा कि स्वयं को जानो, स्वयं से परिचय करो और पाओगे कि खजाना बाहर नहीं भीतर ही है | यह सब आत्मज्ञान के लिए उन्होंने कहा, ताकि लोग नकल करना छोड़ें और स्वयं की शक्तियों, योग्यताओं को पहचानें |

लेकिन किसी व्यक्ति की रूचि न तो स्वयं में है और न ही हमारी वर्तमान शिक्षा नीति ही स्वयं के प्रति जागरूकता लाने में सक्षम है | हमारा समाज बचपन से दूसरों की नकल करना ही सिखाता आया और कभी इतना अवसर ही नहीं दिया कि कोई अपनी योग्यताओं को पहचान पाए और उस पर ध्यान एकाग्र कर पाए | तो जब संस्कार ही नहीं मिले स्वयं से परिचय के तो बच्चे का क्या दोष और क्या दोष उन नेताओं का जो विदेश में अपने देश की समृद्धि और सुख-शान्ति खोजते फिर रहे हैं ?

नेता कोई आसमान से टपके तो होते नहीं हैं, हमारे ही समाज से होते हैं | उन्होंने भी वही सब सीखा और रटा होता है, तो बाकि सभी रटते चले आ रहे हैं | अब वे कैसे देख पाएंगे कि हमें बाहर जाने की आवश्यकता ही नहीं है, हम स्वयं में समृद्ध हैं | केवल उसे सही दिशा देने भर की आवश्यकता है | नेताओं को केवल इतना ही तो करना है कि कुटीर उद्योग और कृषि को ध्वस्त होने से बचाना है, बाकि जनता तो खुद ही सब संभाल लेगी | लेकिन ये नेता लोग कर बिलकुल उल्टा ही रहे हैं | अपने देश की योग्यताओं और कलाओं को ध्वस्त करके विदेशियों को भारत में थोपने को विकास समझ रही है | अपने देश के वस्त्रउद्योग को लावारिस बना दिया और विदेशियों को सर आँखों पर बैठा दिया | किसान आत्महत्या करते हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन गाय के नाम पर उपद्रव मचा रखा है |

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हम अपने ही देश में बने मिटटी के दिए को भुला दिए और चाइना के दिए जलाने लगे | हम अपने ही देश में बने कपड़ों से अधिक महत्व आयातित कपड़ों को देने लगे | यह और बात है कि भारत से ही निर्यात होकर कपड़े विदेश जाते हैं और विदेश से महंगे ब्रांड के साथ भारत आते हैं |

तो वास्तव में हम भारतीयों ने केवल रट्टा मार लिया आपो दीपो भवो और वह भी विदेशी दिए जलाकर रट रहे हैं… है न यह भी साथ आश्चर्यों में से एक आश्चर्य ??

सारांश यह कि भीतर की यात्रा किसी ने नहीं की, सभी विदेश की यात्रा ही करते रहे और यही कारण है कि विदेशी दिन प्रतिदिन समृद्ध होते चले गये और स्वदेशी आत्महत्या करने को विवश होते चले गये | ~विशुद्ध चैतन्य

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