परमात्‍मा ने जिसको जीवन की शुरूआत बनाया है, वह पाप नहीं हो सकता है

” पति और पत्‍नी आपस में द्वेष से भरे हैं, घृणा से भरे हैं, क्रोध से भरे हैं। कलह से भरे हैं, वे भी मिलते हैं; लेकिन उनके शरीर ही मिलते हैं। उनकी आत्‍मा और प्राण नहीं मिलते। उनके शरीर के ऊपरी मिलन से जो बच्‍चे पैदा होते हैं। वे अगर शरीरवादी मैटिरियालिस्ट पैदा होते हैं, बीमार और रूग्ण पैदा होते हैं। और उनके जीवन में अगर आत्‍मा की प्‍यास पैदा न होती हो, तो दोष उन बच्‍चों को मत देना। बहुत दिया जा चुका यह दोष। दोष देना उन मां बाप को, जिनकी छवि लेकर वह जन्‍मते हैं। जिनका सब अपराध और जिनकी सब बीमारियां लेकर जन्‍मते हैं। और जिनका सब क्रोध और घृणा लेकर जन्‍मते हैं। जन्‍म के साथ उनका पौधा विकृत हो जाता है। फिर इनको पिलाओ गीता, इनको समझाओ कुरान, इनसे कहो कि प्रार्थनाएं करो—जो झूठी हो जाती हैं। क्‍योंकि प्रेम का बीज ही शुरू नहीं हो सका तो प्रार्थनाएं कैसे शुरू हो सकती हैं ?

जब एक स्‍त्री और पुरूष परिपूर्ण प्रेम और आनंद में मिलते हैं। तो वह मिलन एक आध्‍यात्‍मिक कृत्‍य स्प्रिचुअल एक्‍ट हो जाता है। फिर उसका काम, सेक्‍स से कोई संबंध नहीं है। वह मिलन फिर कामुक नहीं है। वह मिलन शारीरिक नही है। वह मिलन अनूठा है। वह उतना ही महत्‍वपूर्ण है। जितनी किसी योगी की समाधि। उतना ही महत्‍वपूर्ण है वह मिलन, जब दो आत्‍माएं परिपूर्ण प्रेम से संयुक्‍त होती है। उतना ही पवित्र है वह कृत्‍य—क्‍योंकि परमात्‍मा उसी कृत्‍य से जीवन को जन्‍म देता है। और जीवन को गति देता है।
लेकिन तथाकथित धार्मिक लोगों ने, तथाकथित झूठे समाज ने, तथाकथित झूठे परिवार ने यही समझाने की कोशिश की है कि सेक्‍स, काम, यौन, अपवित्र है, घृणित है। नितांत पागलपन की बातें हैं। अगर यौन घृणित और अपवित्र है। तो सारा जीवन अपवित्र हो गया। अगर सेक्‍स पाप है तो पूरा जीवन पाप हो गया। पूरा जीवन निंदित कंडेम्ड हो गया। अगर जीवन ही पूरा निंदित हो जायेगा, तो कैसे सच्‍चे लोग उपलब्‍ध होंगे। जब जीवन ही पूरा का पूरा पाप है तो सारी रात अंधेरी हो गयी है। अब इसमें प्रकाश की किरण कहीं से लानी पड़ेगी।
मैं आपको बस एक बात कहना चाहता हूं कि एक नयी मनुष्‍यता के जन्‍म के लिए सेक्‍स की पवित्रता, सेक्‍स की धार्मिकता स्‍वीकार करना अत्‍यंत आवश्‍यक है; क्‍योंकि जीवन उससे जन्‍मता है। परमात्‍मा उसी कृत्‍य से जीवन को जन्‍माता है।
परमात्‍मा ने जिसको जीवन की शुरूआत बनाया है। वह पाप नहीं हो सकता है, लेकिन आदमी ने उसे पाप कर दिया है। जो चीज प्रेम से रहित है, वह पाप हो जाती है। जों चीज प्रेम से शून्‍य हो जाती है। वह अपवित्र हो जाती है। आदमी की जिंदगी में प्रेम नहीं रहा। इसलिए केवल कामुकता, सेक्सुअलिटी रह गयी है। सिर्फ यौन रह गया है। वह यौन पाप हो गया है। वह यौन पाप नहीं है, वह हमारे प्रेम के आभाव का पाप है। और उस पाप से सारा जीवन शुरू होता है। फिर बच्‍चे पैदा होत हैं। ”
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-ओशो

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