‘गुरु करता क्या है? आखिर गुरु का कृत्य क्या है?’

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एक गुरु ने अपने शिष्य को तुलाधर वैश्य के पास ज्ञान लेने भेजा। शिष्य ने कहां, ‘आप ब्राह्मण हैं। आप महापण्डित हैं और एक बनिये के पास मुझे भेज रहे हैं ज्ञान लेने?’

तो उसके गुरु ने कहां, ‘ज्ञान न तो ब्राह्मण को देखता है, न वैश्य को देखता है, न क्षत्रिय को देखता है : जिसकी पात्रता होती है, उसका पात्र अमृत से भर जाता है। तो तू तुलाधर के पास जा।’

जाना पड़ा; गुरु ने कहां था शिष्य को। तो तुलाधर के पास बैठा। उसे कुछ समझ में न आया कि क्या इस आदमी में…! तुलाधर उसका नाम ही हो गया था कि दिनभर वह तराजू लेकर तौलता रहता, तौलता रहता! उसने पूछा कि ‘तुम्हारा राज क्या है?’

उसने कहां कि ‘मैं डांडी नहीं मारता। इतना ही मेरा राज है। चोर नहीं हूं। समभाव से तौलता हूं—समता, समत्व, सम्यतुल्‍य। मेरे तराजू को देखो, और मुझे पहचान लो। जैसा मेरा तराजू सधा हुआ होता है; जैसे मेरे तराजू का काटा ठीक मध्य में खड़ा हुआ है, ऐसा मैं भी मध्य में खड़ा हूं। न मेरा तराजू धोखा दे रहा है, न मैं धोखा दे रहा हूं। धोखा छोड़ दिया। पाखण्ड छोड़ दिया। जैसा हूं वैसा हूं। बस, जिस दिन से जैसा हूं वैसा ही रह गया हूं उसी दिन से न मालूम कहां—कहां से लोग आने लगे पूछने—सत्य का राजू!’ शूद्रों में भी हुए। सेना नाई हुआ। नाई था, लेकिन ऋषि तो कहना ही होगा उसे। रैदास चमार हुआ। चमार था, लेकिन ऋषि तो कहना ही होगा उसे। गोरा कुम्हार हुआ। उसके पास हजारों लोग दूर—दूर से आते थे पूछने जीवन का सत्य। और कुम्हार था, तो कुम्हार की भाषा में बोलता था। किसी ने पूछा कि ‘गुरु करता क्या है? आखिर गुरु का कृत्य क्या है?’

तो गोरा कुम्हार उस वक्त अपने, कुम्हार के चाक पर घड़े बना रहा था। उसने कहां, ‘गौर से देख। एक हाथ मैं घड़े को भीतर से लगाये हुए हूं और दूसरे हाथ से बाहर से चोटें मार रहा हूं। बस, इतना ही काम गुरु का है। एक हाथ से सम्हालता है शिष्य को, दूसरे हाथ से मारता है शिष्य को। ऐसा भी नहीं मारता कि घडा ही फूट जाये, कि सम्हाल ही न दे! और ऐसा भी नहीं सम्हालता कि घडा बन ही न पाये! इन दोनों के बीच शिष्य निर्मित होता है। गुरु मारता है; जी भरकर मारता है—और सम्हालता भी है। मार ही नहीं डालता। यूं मिटाता भी है—बनाता भी है। यूं मारता भी है, नया जीवन भी देता है।’

कुम्हार है, कुम्हार की भाषा बोला है, लेकिन बात कह दी। और बात इस तरह से कही कि शायद किसी ने कभी नहीं कही थी। मैंने दुनिया के करीब—करीब सारे शास्त्र देखे हैं, लेकिन गुरु के कृत्य को जैसा गोरा कुम्हार ने समझा दिया, यूं सरलता से, यूं बात की बात में—ऐसा किसी ने नहीं समझाया। कि गुरु भीतर से तो सम्हालता है…। भीतर से सम्हालता है और बाहर से मारता है। बाहर से काटता है, छांटता है। बाहर बड़ा कठोर—भीतर बड़ा कोमल! भीतर यूं कि क्या गुलाब की पंखुड़ी में कोमलता होगी! और बाहर यूं कठोर कि क्या तलवारों में धार होगी!

तो जो मिटने और बनने को राजी हो एक साथ, वही शिष्य है। और जो मिटाने और बनाने में कुशल हो, वही गुरु है।

-ओशो ‘जो बोलैं तो हरिकथा’

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