मणिपुर ने खोयी अपनी संस्कृति और अपनाया कोरियन संस्कृति

हर परिवार की अपनी एक पहचान होती है, अपना ही अंदाज़ होता है, अपना ही व्यवहार होता है… जिससे वह पहचाना जाता है | इसी प्रकार हर गाँव, शहर राज्य, देश की अपनी पहचान होती है अपनी संस्कृति होती है, अपनी भाषा, खानपान, रहन-सहन होता है | व्यक्तियों के समूह को परिवार कहते हैं और परिवारों के समूह को गाँव कहते हैं, गाँवों के समूह को शहर कहते हैं और शहरों के समूह को जिला कहता है, जिलों के समूह को राज्य कहते हैं और राज्यों के समूह को देश कहते हैं |
सनातन धर्म का मूल सिद्धांत सर्वधर्म समभाव और वसुधैव कुटुम्बकम प्रकृति पर आधारित था | जैसे कि हम किसी वन में चले जाएँ तो वहां भिन्न भिन्न रंगों, आकार, प्रकार फूल, पेड़-पौधे व वन्य जीव मिलेंगे | और वन में सभी के लिए स्थान है सभी रहते हैं और सभी आपस में सहयोगी हैं किसी न किसी रूप में | हम वहाँ सहअस्तित्व के महत्व को सही रूप में समझ सकते हैं | इसी सह-आस्तित्व को हमने नाम दिया वसुधैव कुटुम्बकम और प्रत्येक प्राणी की अपनी स्वतंत्रता, आचार-विचार का जिस प्रकार सम्मान वन्य जीव देते हैं, वही मानव भी अपने व्यवहार में लायें इसलिए उसका नाम दिया सर्वधर्म समभाव |
व्यवहारिक धर्म किसी धार्मिक की समझ में आया नहीं और वे कूपमंडूक व किताबी धार्मिक बन गये | उसका कारण था कि पहले लोग पढ़े-लिखे नहीं होते थे, इसलिए प्राकृतिक, स्वाभाविक सनातन धर्मानुसार आचरण करते थे, लेकिन अब चूँकि सब पढ़े-लिखे हो गये, पेंट-शर्ट पहनने लगे, अंग्रेजी बोलने लगे, खेतों को बेचकर नौकरी करने लगे… इसलिए सनातन धर्म से विमुख हो गये और किताबी ज्ञान को वास्तविक ज्ञान व धर्म मानने लगे | इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पहले कबीले हुआ करते थे और अब दड़बे बन गये | हर किसी को अपने दड़बे पर घमंड है और दूसरा दड़बा दुष्ट पापी, अत्याचारी दिखाई देने लगा | होड़ लगी हुई है प्राइवेट बस वालों की तरह कि कौन अपने दड़बे में कितनी सवारी ठूंस सकता है | फिर चाहे उन सवारियों को पानी मिले न मिले, भोजन मिले न मिले, सुख-चैन मिले न मिले, उन सब से दडबों के मालिक और ठेकेदारों को कोई लेना देना नहीं होता | बस जितने अधिक लोगों को ठूंस लेंगे उतना अधिक वोट मिलेगा, चढ़ावा मिलेगा और दूसरे दडबों पर रौब पड़ेगा | फिर कोई भीतर दमघुटने से मर जाये कोई फर्क नहीं पड़ता, उठाकर लाश बाहर फेंक देंगे या फिर उसपर राजनैतिक रोटियां सेंक लेंगे |
जितना हिंदुत्व नाम के दड़बे के ठेकेदारों ने उपद्रव किया, उसका परिणाम यह हुआ कि नार्थईस्ट में भारतीय संस्कृति के प्रति जो सम्मान था, जो अपनापन था वह सब खो दिया भारत ने | उनको तो अब अपनी ही संस्कृति रास नहीं आ रही और मणिपुर ने तो भारतीय फिल्मो को ही बैन कर दिया | वैसे भी भारतीय फ़िल्में भारतीय संस्कृति से अधिक पाश्चात्य संस्कृति ही परोसती है, तो उसका बैन होना ठीक ही है | लेकिन वे तो मणिपुरी संस्कृति के भी विरोधी हो गये और कोरियन संस्कृति को अपना लिए |
वास्तव में कोरियन संस्कृति है क्या ?
बहुत कुछ भारतीय संस्कृति ही है जो अभी मौलिक रूप से उन्हीं के पास देखने मिलती है | क्योंकि उनमें आज भी अपने से बड़ों का सम्मान करने का चलन है | इसी प्रकार जापान की संस्कृति है वहाँ भी भारतीय संस्कृति ही आज भी महत्व रखती है | जैसे कि वहाँ कोई कितना ही बड़ा अधिकारी क्यों न हो, अपने से उम्र में बड़े किसी भी व्यक्ति से ऊँची आवाज में नहीं बात कर सकता, चाहे वह गलत ही क्यों न हो | उदाहरण के लिए एक घटना बता रहा हूँ; एक महिला अकाउंटेंट से कोई बुजुर्ग व्यक्ति बहस कर रहा था और महिला अकाउंटेंट को कह रहा था कि उसे अकाउंट आता ही नहीं | जबकि वह एक सीनियर अकाउंटेंट थी और अच्छी शिक्षा लेकर उस पोस्ट पर पहुंची थी… तो बहस बढ़ गयी और उस महिला की सहनशक्ति जवाब दे गयी और वह उस पर चीख पड़ी कि दफा हो जाओ यहाँ से | जैसे ही वह चिल्लाई सभी का चेहरा उसकी और मुड़ गया और सभी ने उसे अप्रसन्नता की नजर घूरा | तुरंत उस महिला को अपनी गलती का अहसास हुआ उसने उस बुजुर्ग से क्षमा माँगी |
तो यह सब हम भारतीय खो चुके हैं, यहाँ तो दो दिन पहले पैदा हुआ बच्चा भी अपने बाप को माँ-बहन की गाली सुना देगा तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होगा, बल्कि उसकी पीठ थप-थपायेंगे और कहेंगे बिलकुल अपने बाप पर गया है | हम भारतीय सनातन धर्म के सिद्धांत को उठाकर गटर में फेंक चुके हैं | हमने संकीर्णता और कूपमंडूकता को आत्मसात कर लिया | हम उनका साथ देने लगे जो संकीर्ण मानसिकता के हैं और दूसरों से घृणा व द्वेष रखने के लिए उकसाते हैं | हम नफरत के सौदागरों को अपना आदर्श मानने लगे और न केवल धर्म व जाति के आधार पर ही नहीं, बल्कि खान-पान, रहन सहन, भाषा व प्रान्तों के आधार पर भी भेदभाव करने लगे | हम दूसरों के निजी जीवन में दखल देने लगे क्योंकि हमको इस्लामिक कट्टरपंथी रीती-रिवाज राज आने लगी | हमने अनजाने ही कबीला संस्कृति को स्वीकार लिया और बिलकुल इस्लामिक देशों की नकल करने निकल पड़े | पाकिस्तान या बांग्लादेश हिन्दुओं को मारता है तो हम भी मुस्लिमों को मारेंगे वाली मानसिकता का प्रभाव बढ़ गया क्योंकि हमने सनातन धर्म के आदर्शों को तिलांजलि दे दिया और इस्लाम अपना लिया | वैसे भी किसी ने भविष्य वाणी की थी कि जल्दी पूरे विश्व में इस्लाम का ही वर्चस्व होगा | क्योंकि नफरत करना हम मानवों की फितरत है |
यदि हम ध्यान से देखें तो इस्लामिक कानून और हिंदुत्व के ठेकेदारों द्वारा अपनाये जा रहे कानूनों में कोई भेद नहीं है… न इस्लाम दुसरे मतों और मान्यताओं को स्वीकार कर पाता है और न ही, हिंदुत्व के ठेकेदार | दोनों ही धर्मों के ठेकेदार मुझे कुम्भ में बिछड़े जुड़वाँ भाई ही दिखाई देते हैं |
अब ऐसे में यदि मणिपुर का मोह-भंग हो रहा है नार्थ से, भारत से और कोरिया को वे अपना आदर्श मानने लगे हैं, तो गलत नहीं है | मुस्लिम सऊदी को अपना आदर्श मानते हैं, ईसाई और हिन्दू अमेरिका और ब्रिटेन को अपना आदर्श मानते हैं, यहाँ तक कि उनकी याद में आज तक उनकी छोड़ी चड्डी तक नहीं छोड़ पाए… तो मणिपुर भी गलत नहीं है | इस देश में भारतीय आदर्श, संस्कृति व सिद्धांतों को मानने वाले भी जल्दी ही लुप्त हो जायेंगे या मार दिये जायेंगे | तो फिर भारत में भारतीय रह ही कहाँ जायेंगे ?
खंड-खंड में बिखर जाएगा भारत क्योंकि मुस्लिम सऊदी को बुला लायेंगे, संघी अंग्रेजों को बुला लायेंगे, इसाई अमेरिका को बुला लायेंगे, बौद्ध जापान को बुला लायेंगे… क्योंकि इस देश में भारतीय बचे ही नहीं है | सनातन धर्म को मानने वाले लोग स्वतः ही मिट जायेंगे यदि उनकी मौत किसी कट्टरपंथी के हाथों नहीं हुई | क्योंकि उसके बाद इस देश में सभी आपस में लड़ रहे होंगे | मुस्लिम कहेंगे इस्लामिक राष्ट्र होना चाहिए, संघी कहेंगे हिन्दू राष्ट्र होना चाहिए, बौद्ध कहेंगे बौद्ध राष्ट्र होना चाहिए…..इसी तरह से सभी आपस में लड़-मरेंगे | तो मणिपुर, नागालेंड शायद तब तक अलग हो जाएँ और अपना स्वतंत्र राष्ट्र बना लें |
मेरे विचारों पर टिपण्णी करने से पहले यह अवश्य चिन्तन-मनन करियेगा कि क्या आप सनातनी हैं, या अपने दड़बे में कैद हैं ? क्या आप मुक्त हो पाए संकीर्णता से या अभी भी संकीर्णता को ही धर्म मानकर जी रहे हैं ? ~विशुद्ध चैतन्य

[youtube https://www.youtube.com/watch?v=rffiZw21CdA]
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