आध्यात्मिकता और रट्टामार परम्परागत आध्यात्मिकता में बहुत अंतर होता है

शंकराचार्य स्वरूपानंद साईं बाबा के विरोध मे छपे पोस्टरों के साथ

मुझे याद है मैं जब चार-पाँच वर्ष का रहा होऊंगा तब पिताजी हमें समुद्र में ले जाते थे और तैरना सिखाते थे | पानी में पेट के बल लिटा देते थे और दोनों हाथों से थामे रहते थे | हम हाथ पैर मारते थे पानी में और खुश होते थे कि हम भी तैर रहे हैं | लेकिन जैसे ही पिताजी अपना हाथ हटा लेते थे होश ठिकाने आ जाते थे | नाक और मुँह से पानी भीतर जाना शुरू हो जाता था और लगता था कि गये अब काम से….. लेकिन तुरंत पिताजी फिर थाम लेते थे | एक समय ऐसा आया कि फिर पिताजी को थामने की आवश्यकता नहीं पड़ी और हम आसानी से समुद्र की लहरों से टक्कर लेते | बेशक वह उम्र बहुत ही छोटी होती है, लेकिन पिताजी ने हमें तभी जीवन का महत्व समझा दिया था और सीखा दिया था कि किताबी ज्ञान से बेहतर है व्यवहारिक ज्ञान |

आध्यात्मिकता और रट्टामार परम्परागत धार्मिकता में बहुत अंतर होता है | इनका अंतर जब हम शास्त्रों से समझने का प्रयास करते हैं तो उतना ही समझ पाते हैं, जितना ‘कुशल तैराक कैसे बनें ?’ पुस्तक पढ़कर हम तैराकी के विषय में जान पाते हैं | लेकिन कुशल तैराक बनने के लिए जल में उतरते ही सारी किताबी ज्ञान धरी की धरी रह जाती है और ‘जान कैसे बचे’ की चिंता लग जाती है | उस समय वही ज्ञान काम आता है जो भीतर से प्राप्त होता है | व्यक्ति उलटे सीधे हाथ पैर मारने लगता है या सहायता के लिए पुकारने लगता है |

तो यदि आप पानी में नहीं उतरना चाहते या भय लगता है पानी से, तो आप कितनी ही महँगी पुस्तक पढ़ लें, तैराकी की…कोई लाभ नहीं होगा | लाभ तभी होगा जब वह व्यावहारिक होगा | बिलकुल इसी प्रकार कोई कितने ही शास्त्र रट ले और कितने ही सत्संग कर ले, कोई फर्क नहीं पड़ेगा, जब तक वह व्यवहारिक रूप में प्रयोग करने में असमर्थ होता है | आप माला जाप भी कर रहे हैं और नौकर को या पडोसी को गालियाँ भी निकाल रहे हैं, तो व्यर्थ है आपका माला जाप | आपने उपवास रखा हुआ है और क्रोध से दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ा हुआ है, तो व्यर्थ हो गया आपका उपवास | यदि आपने दमन भी किया अपने क्रोध व अन्य विकारों को, तो उसका दुष्परिणाम यह होगा कि आप किसी असाध्य बीमारी से ग्रसित हो जायेंगे | और ऐसे ही किताबी रट्टामार परम्पराओं को निभाने वाले धार्मिकों को मैं रट्टामार धार्मिक या आध्यात्मिक कहता हूँ |

ऐसे धार्मिक या अध्यात्मिकों की संख्या कम नहीं है और लगभग हर धार्मिक या तीर्थ स्थलों में इनकी भीड़ मिल जाएगी | वास्तव में इन्ही के कारण ही धर्म के नाम पर विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक बाजार चलता है | करोड़ों के दान प्रतिदिन चढ़ाये जाते हैं इनके द्वारा मंदिरों और तीर्थों में | और जहाँ धन हों, बनी बनाई श्रृद्धा का शोषण करने मिलता हो, वहां ठेकेदारों का होना भी स्वाभाविक ही होता है | ऐसे ठेकेदारों के पास अपना कोई अध्यात्मिक ज्ञान या उपलब्धि नहीं होती और केवल रट्टा मारकर ही विद्वान बने होते हैं | ये उसी तरह के तैराक हैं, जो किताबों को पढ़कर, बिना पानी में उतरे ही तैराकी सीखते हैं | फिर यही लोग समझाते हैं कि भवसागर को कैसे पार किया जाए और लोग इनपर विश्वास करते हैं क्योंकि उनके पास प्रमाणपत्र होते हैं कि इनको जितना ज्ञान है, उतना किसी को नहीं |

तो धार्मिकों की दुनिया के ये ठेकेदार बन जाते हैं और धार्मिक लोग भी खुश रहते हैं इनसे क्योंकि ये लोग उनकी ही मानसिकता के होते हैं और वही कहते हैं जो समाज को सुनना अच्छा लगता है | जैसे कि हिंदुत्व के नाम का चोला डाले बैठे पाखंडियों को अच्छा लगता है सुनना कि साईं बाबा की दूकान उठ जाएगी तो हमारी कमाई बढ़ जायेगी | फिर ठेकेदार तो ठेकेदार ही होता है, दूसरे का धंधा अच्छा चल रहा हो तो उसके पेट में दर्द तो होगा ही….. तो ये धार्मिक और इनके ठेकेदारों का आध्यात्म से कुछ भी लेना देना नहीं होता, बस शुद्ध व्यवसायी ही होते हैं, और अध्यात्मिक लोगों की खोज और उनके विचारों को अपनी आमदनी का जरिया बनाये रहते हैं | न तो इनकी कुंडली जागृत होती है और न ही कभी अपने शरीर से अलग होने का कोई अनुभव होता है और न ही कोई और आध्यत्मिक अनुभव | बस चौबीस घंटे ये ठेकेदार इसी उधेड़बुन में लगे रहते हैं कि अपना धंधा कैसे बढ़े और दूसरों का कैसे घटे |

श्रद्दालु और भक्त आदि इंनके लिए ग्राहक से अधिक महत्व नहीं रखते और धार्मिकों, श्रद्दालुओं के लिए ये ठेकेदार ईश्वर के दलाल से अधिक महत्व नहीं रखते | और आप देखेंगे कि ये लोग अपने दम पर कहीं नहीं टिकते, बल्कि हमेशा किसी न किसी का आधार लेकर ही खड़े होते हैं | इनके पास अपना कोई मौलिक अनुभव या विचार भी नहीं होता, जो भी होता है सब रट्टामार | शास्त्रों में कहा है, ईश्वर ने कहा है, अल्लाह ने कहा है, जीसस ने कहा है…. बस यही सब दोहराते चले जाते हैं पीढ़ी-दर पीढ़ी | यह और बात है कि इनको खुद नहीं पता होता कि क्यों कहा है और उसका व्यावहारिक रूप क्या है | धार्मिकों के लिए यह सब सुनना सहज हो जाता है क्योंकि उनको अपने दिमाग पर जोर देने की आवश्यकता नहीं पड़ती, कोई लॉजिक लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि बचपन से सुनते चले आ रहे हैं | उदाहरण के लिए मैंने मैंने एक पोस्ट किया सोशल मीडिया पर, “अगर गाय को राष्ट्र-माता और बैल को राष्ट्र-पिता घोषित करवाने में दिक्कत है, तो गुजरात में ही राज-माता और राज-पिता घोषित करवा लो गौपुत्रो ?” अब इस पर विद्वानों का तर्क था कि क्या किसी शास्त्र में आपने पढ़ा है कभी कि बैल को पिता कहा गया है ? क्या आप हिन्दुओं कि भावना का अपमान नहीं कर रहे ? क्या आपको यही संस्कार मिले हैं कि हिन्दुओं का अपमान करो……. ?”

अब ये विद्वान लोग गाय को तो माता मानने को तैयार हैं, लेकिन बैल को बाप मानने को अपना अपमान समझते हैं… सोचिये ? ये लोग गाय को भी इसलिए ही माँ मान रहे हैं, क्योंकि शास्त्रों में लिखा हुआ है, शास्त्रों में गधे को बाप मानने की बात लिखी होती तो ये लोग उसे ही बाप मानते… यानि अपना स्वयं का कोई विवेक नहीं है | स्वयं की बुद्धि गिरवी रख दी धर्मों के ठेकेदारों के पास…. | एक सज्जन कहते हैं कि हम गांधी जो को राष्ट्र-पिता मानते हैं, और आपने ऐसा कहकर गाँधी जी का अपमान किया है | अरे जब गाय के लिए इंसानों का कत्ल करने को तैयार हो, तो गांधी का क़त्ल तो पहले ही कर चुके हो, अब क्या समस्या है ? फिर संघी तो वैसे ही गांधी को राष्ट्रपिता नहीं मानते, तो क्या आपत्ति है बैल को राष्ट्रपिता मानने में ?

इस पोस्टर से साईं का नहीं, हनुमान जी का ही अपमान हो रहा है |

अब ऐसे ऐसे विद्वानों को हम धर्म की ठेकेदारी दे देते है और इसी तरह के ठेकेदारों की श्रेणी में आते है शंकराचार्य स्वरूपानंद भी | न तो इन्होने अपने धर्म को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए कोई विशेष कार्य किये और न ही कोई आध्यात्मिक उत्थान ही पायी | लेकिन दूसरों की दूकान कैसे मिटायें, कैसे तबाह करें… इसी मैं लगे रहते हैं | ये उस ढाबे के मालिक की तरह हैं, जिसके अपने ढाबे में तो ढंग का खाना मिलता नहीं, लेकिन दूसरे के ढाबे के मालिक को कोसते हैं कि वह खाना ख़राब बनाता है और उसका ढाबा बंद होना चाहिए | (पूरा विवरण इस लिंक में देखें:Shankaracharya releases poster against Sai Baba)

अब ऐसे मैं समाज को स्वयं ही निर्णय करना चाहिए कि ऐसे ठेकेदारों के भरोसे रहकर इसी प्रकार शोषित व मूर्ख बनते रहना है या फिर आत्मनिर्भर व समृद्ध बनना है | यह ध्यान रखें कि अध्यात्म किताबों को पढ़कर, शास्त्रों को पढ़कर नहीं समझा जा सकता | तैराकी और आध्यात्म में इतना ही अंतर है जितना भौतिक जल और दिव्य अलौकिक प्रकाश में तैरना और दोनों ही तरह की तैराकी के लिए उसमें उतरना ही पड़ेगा | वरना बस यही तमाशा देखते हुए जीवन बीत जाएगा कि किसकी दूकान कौन कैसे बंद करवाए | ये सब धंधेबाज लोग हैं और अपने अपने धंधे में ही लगे हुए हैं, आध्यात्मिकता में इनकी कोई रूचि कभी रही ही नहीं | इसलिए मेरा इनसे कोई बैर भी नहीं है क्योंकि ये लोग इससे आगे गति कर ही नहीं सकते और अपने बाजार तक ही सीमित हैं | जबकि मैं इनके बाजार से ही स्वयं को बाहर रखता हूँ क्योंकि जानता हूँ कि इनकी संगत मुझे नीचे लेकर जायेगी | सनातन धर्म की विशालता से गिराकर, गटर में ले आएगी और वहां सिवाय दुर्गन्ध, सडांध, मार-काट, उपद्रव के और कुछ नहीं है |

यदि हम इतिहास उठाकर देखें तो जितने भी अध्यात्मिक महान आत्माएं इस धरा पर आयीं  वे सभी स्वयं को ऊपर उठाने पर ही जोर देती  रहीं, न कि दूसरों को गिराने के प्रयोजन  में लगीं रहीं | चाहे गौतम बुद्ध हों, चाहे महावीर हों, चाहे कन्फ्युशियास हों, चाहे साईं बाबा हों, चाहें स्वामी विवेकानन्द हों, चाहे ठाकुर दयानंद हों, चाहे ओशो हों….. क्या इनमें से किसी ने कभी स्वरूपानंद जैसी घटिया मानसिकता का प्रदर्शन किया कभी ? चूँकि ऐसे धर्म गुरु दूसरों के लिए गड्ढे खोदने में ही व्यस्त रहते हैं, तो आध्यात्मिक उत्थान का तो कोई अर्थ ही नहीं रह जाता इनके लिए | और यही कारण है कि ऐसे धर्म गुरुओं को गुंडों-मवालियों की आवश्यकता पड़ती है अपने धर्मध्वज को लहराने के लिए, जबकि न गौतम बुद्ध को जरूरत पड़ी, न साईं बाबा को जरूरत पडी और न ही ओशो को जरूरत पड़ी गुंडों मवालियों या दुनिया भर के देवी देवताओं के नाम पर बनी सड़कछाप सेनाओं की | कभी गौतम बुद्ध के अनुयाइयों को खदेड़ते हैं देखे जाते हैं ये धर्म के ठेकेदार और इनकी सेना, कभी साईंबाबा के अनुयाइयों को, कभी ओशो को, कभी मुस्लिमों को…. बस यही सब काम रह गया है इनका ?

स्वरूपानंद ने जो पोस्टर बनवाएं हैं, उन्हें देखकर तो यही लगता है कि अभी तक तो बजरंगदल, रामसेना, कृष्णसेना, शिवसेना….जैसी सडकछाप सेनाएं इन ठेकेदारों के इशारों पर काम करतीं थीं, लेकिन लगता है कि अब सीधे बजरंगबली को ही अपनी नौकरी पर रख ली है और उनसे वही काम करवा रहे हैं जो अभी तक सडकछाप लुच्चे-लफंगों की सेनाओं से करवा रहे थे | क्या यह बजरंगबली का अपमान नहीं है ?

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