अपने शरीर और मस्तिष्क को अपने वश में कर ले, वह आध्यात्मिक हो जाता है

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कट्टर नास्तिक हो यह सिद्ध करने के लिए मनुस्मृति, क़ुरान, बाइबल जला दो और हो गये कट्टर नास्तिक |
क़ुरान, बाइबल, मनस्मृति या गीता का विरोध करने वालों के घर जला दो या उन्हें ही जिन्दा जला दो और हो गये, कट्टरधार्मिक |
है न कितना आसान कट्टर नास्तिक या कट्टर धार्मिक होना ?
आस्तिक होने के लिए कुछ नहीं करना केवल “न काहू से दोस्ती न काहू से बैर” वाला डायलॉग बोल देना होता है |
लेकिन आध्यामिक होना, स्पिरिचुअल होना, जागृत होना, चैतन्य होना… बहुत कठिन है… इसके लिए होश में रहना पड़ता है चौबीसों घंटे, स्वयं को खोजना पड़ता है, स्वयं को जानना पड़ता है, स्वयं से दोस्ती करनी पड़ती है, स्वयं से प्रेम करना पड़ता है…
और तब कहीं जाकर यह अहसास होता है कि मूर्ख नशेड़ी होते हैं वे लोग, जो धर्म और जाति के नाम पर नफरत फैलाते हैं, दंगा भड़काते हैं, हिंसा करते हैं, अत्याचार करते हैं….नास्तिक भी वही कर रहे होते हैं बस अंतर केवल इतना होता है कि वे धार्मिकों के विरोध में होते हैं | और वहीँ आस्तिक आँखें मूंदे बैठा रहता है, अपने बीवी-बच्चों में मगन रहता है |
कभी तरस भी आता है ऐसे कट्टरों पर वैसे ही जैसे नशे में धुत्त शराबियों की हालत देखकर आता है….
उन बेचारों को तो होश ही नहीं होता कि वे कर क्या रहे हैं, उनका तो शरीर और मस्तिष्क ही उनके वश में नहीं है..उन पर चिल्लाने से, समझाने से कोई लाभ नहीं | हम बस इतना ही कर सकते हैं कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें और आगे बढ़ जाएँ या फिर उन्हें किसी अच्छे सरकारी अस्पताल में छोड़ आयें |
जबकि जो अपने शरीर और मस्तिष्क को अपने वश में कर ले, वह आध्यात्मिक हो जाता है, उसे वह सब समझ में आने लगता है, जो नास्तिकों को धार्मिकों को समझ में नहीं आता | ~विशुद्ध चैतन्य

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