भला इतनी सी बात पर कोई आत्महत्या करता है क्या ???



आज सुबह सुबह एक समाचार पर नजर पड़ी कि एक १२ वर्ष के बच्चे ने केवल इस बात पर आत्महत्या कर ली कि उसकी नानी ने उसे कहा कि होमवर्क पूरा किये बिना तुम बाहर नहीं जा सकते खेलने |

हुआ न आश्चर्य ??

इतनी सी बात पर भला कोई आत्महत्या करता है क्या ???
A 12-year-old boy has taken his own life after his grandmother told him he had to do his homework before going out to play with friends.

Mexican school pupil Luis Angel Contreras Zertuche – who left a heartbreaking suicide note – returned home as usual, dumped his bag on a chair and wanted to head straight out again.

However, a row erupted when his gran Antonia Zertuche Zamarripa, 61, insisted he could only play with his pals after he’d finished his school assignments.

Such was the scale of the argument, tragic Luis stormed off to another room and hanged himself.

He was later found by his gran, who immediately called for an ambulance – but the boy was already dead.

In a deeply moving note he left for his family, Luis wrote:

“Goodbye, please don’t cry for me. I love you all, but I did it because of the poor life quality you offered.

“Goodbye, I’ll be all right. I wrote this letter crying while I was remembering all the things I lived with you.”

नहीं ! इतनी सी बात पर कोई आत्महत्या नहीं करता | आत्महत्या तो बड़ी से बड़ी बात पर भी कोई नहीं करता यदि कारण केवल वहीँ तक सीमित हो | आत्महत्या कोई व्यक्ति तभी करता है, जब उसके सब्र का बाँध टूट जाता है और उसे लगता ही कि मुक्ति का कोई और मार्ग नहीं है सिवाय आत्महत्या के |

व्यक्ति बहुत सी बातें मन में ही दबाता चला जाता है और कोई ऐसा व्यक्ति उसे नहीं मिल पाता जिसपर वह विश्वास करके अपने मन का बोझ हल्का कर सके | बच्चों को यह समस्या सर्वाधिक रहती है क्योंकि वह पाता है कि उसकी समस्या को गंभीरता से कोई नहीं लेता और कई बार उसकी कही गयी बातों को लेकर बड़ों में मजाक भी उड़ाया जाता है | उसे यह भी डर रहता है कि उसने यदि अपने घर वालों के विरुद्ध कुछ कहा तो उसके घरवालों को पता चल जाएगा और उसकी शामत आ जाएगी | यह सब मैं किताबी नहीं, अपने अनुभवों से कह रहा हूँ क्योंकि मेरा बचपन इस कष्ट को झेलते हुए ही बीता है | बहुत ही कम बच्चे ऐसे होते हैं कि कोई उन्हें समझने वाला मिल जाता है | अधिकांश को तो नानी या दादी ही वह विश्वास दिला पाती हैं, जैसे कि ओशो को मिला | यदि परिवार का कोई सदस्य इतना सा काम कर दे कि बच्चों को बिना टोंके केवल सुन भर ले और उसकी भावना को समझ सके, वही बहुत हो जाता है | बच्चे को यह विश्वास दिला सके कोई कि वह जो कुछ कह रहा है वह कभी किसी और तक नहीं पहुंचेगी.. बस इतना ही तो उसे चाहिए | कोई तो राजदार उसे चाहिए, क्योंकि वह अभी इस दुनिया में नया है | वह अभी प्रयोग कर रहा है, वह अभी अनुभव ले रहा है, वह अभी समझना चाह रहा है दुनिया को, तो वह यह नहीं जानता कि वह सही है या गलत | यदि गलत हुआ तो कोई उसे समझा सके कि या गलत था, न कि उसे सजा सुना दे | क्योंकि वह सजा का हकदार नहीं है, वह नया है इस दुनिया में | लेकिन बहुत ही कम ऐसा हो पाता है |

फिर खेलना बच्चों के लिए प्राकृतिक आवश्यकता है, नैसर्गिक आवश्यकता है | खेलने से वह न केवल शारीरिक रूप से चुस्त-दुरुस्त रहता है बल्कि मानसिक, व सामाजिक व्यव्हार को भी सीखता व समझता है | वह आपसी सद्भाव व मित्रता को समझता है | वह सीखता है कि कैसे आपसी तालमेल रखना चाहिए | खेल बच्चे के भविष्य को तय करता है, उसे सहनशील व उदार बनाता है | लेकिन आधुनिक पढ़ा-लिखा समाज किताबी कबाड़ थोपना अपना फर्ज समझते हैं |

यह बड़े आश्चर्य की बात है कि धार्मिक या पढ़ा-लिखा समाज प्रकृति के विरुद्ध होता है | धार्मिक समाज हर उस चीज के विरोध में है जो प्राकृतिक है, जैसे सेक्स, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण | वहीं पढ़ा-लिखा समाज खेल-कूद के विरोध में रहा हमेशा | माँ-बाप को यह बताते हुए गर्व होता है कि मेरा बच्चा तो आठ घंटे, बारह घंटे पढ़ाई करता है, लेकिन वहीं यह कहते हुए शर्म महसूस होता है कि मेरा बच्चा पढ़ाई से अधिक खेलकूद और नए प्रयोगों में रूचि लेता है | धार्मिकों को यह कहते हुए गर्व होता है कि मेरा बच्चा क़ुरान, बाइबल, गीता, वेद…. पढ़ता रहता है या कंठस्थ कर रखा है…… यानि नवीनता नहीं चाहता समाज | नहीं चाहता समाज कि उसका बच्चा रट्टू तोता बनने से बेहतर है एडिसन बने, सुकरात बने, किसान बने, सलाहकार बने….

और शिक्षण संसथान भी बड़े ही अजीब हैं ! बच्चों को स्कूल भेजा जाता है ताकि शिक्षक उसे वर्तमान समाज व उपलब्धियों को समझाएं ताकि बच्चा उससे आगे क्या योगदान से सकता है, उसे खोजने का प्रयास करे | अपनी उपयोगिता को स्वयं ही सिद्ध करे, न कि उसपर थोपा जाये कि उसे क्या करना है और क्या बनना है | फिर स्कूल में पढ़ाई के बाद उसे होमवर्क देने वाली बात मुझे कभी समझ में नहीं आई | मैंने तो अपने विद्यार्थी जीवन में कभी भी होमवर्क नहीं किया, और स्कूल पहुँचते ही साफ़ कह देता था कि नहीं किया होमवर्क | न जाने क्या बात थी कि होमवर्क न करने वाले सभी पिटते थे, लेकिन मुझे कुछ नहीं कहा जाता था | शायद जानते थे कि इस नालायक को कुछ कहने का फायदा भी नहीं है | अधिकाँश तो यही होता था कि मेरे दोस्त ही मेरा होमवर्क कर दिया करते थे स्कूल में ही टीचर के आने से पहले |

तो होमवर्क क्यों दिया जाता है ? क्या शिक्षक इतना समर्थ नहीं होता कि वह स्कूल में ही पढ़ा पाए ? फिर आजकल तो बच्चों को स्कूल के अलावा ट्यूशन भी करना पड़ता है, फिर भी यदि बच्चे की परफोर्मेंस सही न आये तो स्कूल माँ-बाप को सम्मन भेजता है कि आपका बच्चे की परफोर्मेंस सही नहीं आ रही….. बड़ा ही हास्यापद लगता है यह सब | मजाक बना रखा है इन पढ़े-लिखे डिग्रीधारियों ने शिक्षा का | जिनकी जिम्मेदारी है बच्चों को पढ़ाने कि, जो मोटी फीस ले रहे हैं और ऊपर डोनेशन लेते है, वे सम्मन भेजते हैं कि बच्चा आपका पढ़ाई में रूचि नहीं ले रहा | वे धमकी देते हैं कि यदि ऐसा रहा तो आपके बच्चे को स्कूल से निकाल दिया जाएगा…. है न बड़ी अजीब सी बात ? यानि नौकर कह रहा है कि घर में साफ़ सफाई नहीं हैं, इसके जिम्मेदार आप हैं | ड्राईवर कह रहा है कि गाड़ी रेडलाइट जम्प कर गयी और चालान हो गया तो मालिक जिम्मेदार है |

बड़ा ही अजीब नजारा होता है जब बच्चा नालायक (मेरी तरह) निकल जाए और प्रिंसिपल माँ-बाप को अपने दरबार में हाजिर होने के लिए सम्मन भेजे | माँ-बाप सर झुकाए खड़े होते हैं, सॉरी-सॉरी बोलते हैं, आइन्दा से पूरा ध्यान रखने की कसम खाते हैं…. और प्रिंसिपल अपने चश्मे के ऊपर से बच्चे को घूरती है और बहुत ही उदारता दिखाते हुए कहती है…. “इस बार तो छोड़ देती हूँ, आइन्दा से….. ध्यान रखना |” बच्चा बेचारा सर झुकाए यह सोचता ही कि उसकी गलती कहाँ से हुई ? उसने तो पढ़ाई की ही थी, अब नम्बर कम आये तो उमें मेरा क्या दोष ? यह तो उसकी गलती है जिसने नम्बर दी, उसे डांट पड़नी चाहिए थी कि उसने नंबर कम क्यों दिए ? बराबर बराबर सबमें क्यों नहीं बाँटे ? भेदभाव तो उस नंबर देने वाले टीचर ने किया, किसी को कम दिया और किसी को ज्यादा दिया |

क्या यह शिक्षा व्यवस्था कहीं से भी उचित है ?

मैं तो बचपन से इस शिक्षा व्यवस्था के पक्ष में नहीं था, इसलिए पढ़ा-लिखा बना ही नहीं, अनपढ़ रह गया |

समाज बच्चों का बचपन ही छीन लेता है और उसे एक ऐसे जीवन जीने को विवश कर देता है जिसे जीने के लिए वह नहीं आया | २५ साल से अधिक तक दुनिया भर के कबाड़ रटने के बाद भी वह मानव नहीं बन पाता, बस पैसे कमाने की मशीन बनकर रह जाता है | और फिर उस मानव मशीन को देखकर हमारा समाज गर्व करता है |

और यदि बच्चे ने पूर्वजन्म में ही आगे प्रगति कर ली हो और उसे इस जन्म में पीछे धकेला जा रहा है, तो स्वाभाविक है वह परेशान होगा ही और फिर वही कदम उठाएगा जो इस बच्चे ने उठाया था | यह समाज को तय करना है कि उसे वह कैसा जीवन देना चाहता है | ~विशुद्ध चैतन्य

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