एक मुद्दा होता है कि उच्च पदों पर कौन आसीन होगा ?

अब चूँकि पढ़े-लिखों का जमाना है तो उन पदों के लिए नम्बर्स देखे जाते हैं; जिसके जितने अधिक नंबर उतनी उसकी दावेदारी की प्रबलता हो जाती है | फिर वे नम्बर्स रिश्वत देकर ली हो, फर्रे चला कर ली हो, सिफारिश से ली हो…. कोई मायने नहीं रखते | फिर कम नंबर वाला अधिक योग्यता भी रखता हो, तब भी उसे नहीं चुना जाता |

कुछ जातियाँ इतनी बुद्धिमान होती नहीं और न ही उनकी रूचि होती है बुद्धिमान होने में | क्योंकि वे तो प्रकृति के साथ ही संतुष्ट थे, ये नौकरी वैगेरह की बीमारी तो पढ़े-लिखों की देन थी | तो वे बेचारे पिछड़ जाते थे और किसी उच्च पदों पर नहीं पहुँच पाते थे |

तो फिर पढ़े-लिखे विद्वानों ने समस्या का समाधान निकाला आरक्षण का | अब फिर बात वहीँ की वहीं रह गयी कि योग्यता धरी की धरी रह गयी और केवल जाति का सर्टिफिकेट ही काम करने लगा | फिर चाहे लिखना भी न आता हो, गजेटेड ऑफिसर से लेकर मंत्री-मुख्यमंत्री तक बन सकता है और उपर राष्ट्रपति भी बन सकता है |

लेकिन कई हज़ार साल पहले जब सभी सनातनी थे, अनपढ़ थे और अंग्रेजी नहीं जानते थे, तब योग्यता को महत्व दिया जाता था | तब किसी मुखिया का चुनाव का आधार जाति या नम्बर्स नहीं होता था, बल्कि जो दावेदार होते थे, उन्हें युद्ध करना होता था | जो विजेता होगा वही मुखिया बनेगा | इसमें कोई भेदभाव और जालसाजी वाली कोई बात होती ही नहीं थी | कोई रिश्वतखोरी नहीं होती थी, कोई बूथकेप्चरिंग नहीं होती थी, कोई गुंडागर्दी नहीं होती थी, कोई ईवीएम् मशीनों से छेड़ छाड़ नहीं होती थी…. और कोई आरोप नहीं लगा सकता था कि उसके साथ बेईमानी हुई है |

तब गुणवत्ता होती थी मुखिया में | तब उसे पता होता था कि उसने अपने दम पर मुखिया का पद प्राप्त किया है, बेईमानी करके नहीं | इसलिए वह ईमानदार रहता था अपने कबीले के लिए | उसे अपने फाइनेंसर को खुश करने के लिए ईमान गिरवी नहीं रखना होता था, कोई उसपर दबाव नहीं बना सकता था किसी भी प्रकार के अनैतिक कार्यो के लिए |

लेकिन आज हम देखें तो राजनैतिक हो, आर्थिक हो, या समाजिक हो…. सभी क्षेत्रों में डिग्रियों और नंबरों का बोलबाला हो गया है | और परिणाम यह हुआ कि स्थिति नीचे से नीचे गिरती चली जा रही है | अब कोई भी ऐरा-गैरा अपनी सेना खड़ी कर लेता है, देवी-देवताओं के नाम रख लेता है, या कोई संगठन बना लेता है और पार्को में बैठे बच्चो पर दादागिरी दिखाकर, या किसी निहत्थे गरीब पत्रकार या लेखक कि हत्या करके महान बन जाता है |

पहले आमने सामने का युद्ध हुआ करता था और जब दो लोग लड़ रहे हों, तब तीसरा नहीं आता था, आज एक को मारने के लिए सैकड़ों की तादाद में टिड्डीदल टूट पड़ते हैं और गर्व से कहते हैं, हम फलाना हैं और हम फलाना हैं |

सभी स्कूलों से निवेदन है कि अपने बच्चों को आत्मरक्षा व टिड्डीदल से निपटने की शिक्षा अवश्य दें और उसके साथ ही दें, आजीविका के लिए आत्मनिर्भर होने की शिक्षा | ये जाति, धर्म की दीवारों को गिराने का समय आ गया है… इससे समाज का कभी भला नहीं हो सकता, उलटे नीचे से नीचे ही गिरते चले जायेंगे हम | ~विशुद्ध चैतन्य

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