मैंने कोई हिंसा नहीं की, मेरे भोजन में भी किसी की चीख पुकार शामिल नहीं है

पशु-बलि की तस्वीरें बहुत ही आहत कर देती है पशु-प्रेमियों को, लेकिन मैंने आज जानबूझ कर इस तस्वीर को चुना अपने पोस्ट के लिए | यह भी जानता हूँ कि जो लिखना चाहता हूँ, वह किताबी धार्मिकों को समझ में नहीं आएगा और नास्तिकों की समझ में तो बिलकुल भी नहीं आएगा | लेकिन लिखना भी आवश्यक है हो सकता है अगले जन्म में मुझे अपने ही लिखे हुए लेख पढ़कर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिले | क्योंकि मेरे जैसे मंद बुद्धि की समझ में शास्त्र, पुराण, संस्कृत, अंग्रेजी… जैसे गंभीर विद्वानों वाली चीजें नहीं आती | हम तो ठहरे सीधे साधे से अनपढ़.. तो हम जैसे अनपढ़ों को या तो गौतम बुद्ध समझ में आते हैं या ओशो या कोई सूफी संत-फ़कीर, कबीर आदि | इसलिए इस लेख पर विद्वान व पढ़े-लिखे लोग अपने लेफ्ट ब्रेन की एनेर्जी खर्च न करें |

पशु बलि को लोग बहुत ही क्रूरता मानते हैं | माँसाहारियों को लोग राक्षस कहते हैं और शाकाहारियों को देवता… शायद यही कारण रहा कि आदिवासियों को असुर और राक्षस कहा गया | मेरे फ्रेंडलिस्ट में बहुत से शाकाहारी धार्मिक मित्र हैं उन्हें कष्ट होगा यह जानकर कि मैं स्वयं बचपन से माँसाहारी हूँ | यह आज सार्वजनिक रूप से दशहरा के उपलक्ष्य में दशहरा के उद्देश्य का पालन करते हुए स्वीकार रहा हूँ कि मैं माँसाहारी हूँ | इस स्वीकारोक्ति के बाद जितने भी मित्र चाहें मुझे अन्फ्रेंड या ब्लॉक कर सकते हैं |

कई पढ़े-लिखे और अतिविद्वान मानते हैं;

  • “मुझे गर्व है कि मैं ऐसे धर्म का अनुयायी हूँ जिसने मुझे पशुओं पर हाथ फेरना सिखाया है, छुरा फेरना नहीं । मुझे गर्व है कि हमारी आलोचना दूध बहाने के लिए होती है, खून बहाने के लिए नहीं ।मुझे गर्व है कि मैं ऐसे धर्म का अनुयायी हूँ जिसकी आलोचना मूर्त्ति पूजा और बहु देव वाद को लेकर होती है, आतंकवाद और क्रूरता के लिए नहीं ।”
  • “मैं किसी धर्म अधर्म में नहीं पड़ता मगर यह मानता हुँ कि शाकाहार सबसे सात्विक भोजन है। मुझे गर्व है कि मेरे भोजन में किसी की भी चीख़ पुकार सामिल नहीं है। हाँ जिसे जो करना है करे,जिसे जो खाना है खाये,जिसे जिसको पूजना है पूजे। मेरी खोज मुझ ही पर आकर ख़त्म हो जाती है। अहं ब्रह्मास्मि। मैं ही ब्रह्म हुँ मुझ ही में ब्रह्म है मुझमें ही राम है मुझ ही में रावण है, मुझ ही में अल्लाह है, मुझ ही में फकीर है। जीवों पर दया करो।”

सबसे पहले तो उपरोक्त तस्वीर को ही ध्यान से देखें | एक कमजोर, भूखा, भैंस का बछड़ा….. इसकी हत्या होने जा रही है और सभी को यह बहुत ही वीभत्स लग रहा है, बहुत ही क्रूरता पूर्ण लग रहा है | लेकिन यही स्थिति एक किसान की होती है, एक आदिवासी की होती है….और वह आत्महत्या करता है या हत्या हो जाती है उनकी भूमाफियाओं द्वारा या सरकारी वर्दीधारियों द्वारा या भूख से मर जाते हैं | लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजता | यह तो एक ही झटके के वार में अपने कष्टों से मुक्त हो जाएगा, इसे तो पता भी नहीं चलेगा कि इसकी हत्या हो चुकी है, लेकिन उनके विषय में सोचिये जो हर रोज अपनी मृत्यु को अपने नजदीक आते देखते हैं | रोज जिन्हें भूमाफिया धमका कर चले जाते हैं….

जिन्हें गर्व है कि वे ऐसे धर्म के अनुयाई हैं जिसने उन्हें पशुओं पर हाथ फेरना सिखाया, उन्हें गर्व होना ही चाहिए अपने धर्म पर लेकिन जब वे कहते हैं कि उनका धर्म खून नहीं बहाता, तो फिर उनका ज्ञान अधुरा है अपने धर्म का | जो यह मानते है कि वे माँसाहार नहीं करते इसलिए वे क्रूरता नहीं करते, वह भी उनका भ्रम ही है | मैंने देखा है शाकाहारियों को माँसाहारियों से अधिक क्रूरतापूर्ण कार्य करते हुए | जो कहते हैं कि उनके भोजन में किसी की चीख पुकार शामिल नहीं है, उन्होंने शायद कभी किसी किसान के घर में झाँक का नहीं देखा, उन्होंने शायद आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवारों को करीब से नहीं देखा, उन्होंने शायद गन्ना किसानों की विवशता और दयनीयता नहीं देखी, उन्होंने कभी खेतों और शक्कर मिलों में काम करते मजदूरों के परिवारों को नहीं देखा…..

यह सबसे बड़ा भ्रम है कि शाकाहारी हैं, इसलिए आप कोई हिंसा नहीं कर रहे | बल्कि किसी के शाकाहारी होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता | हिंसा तो हो ही रही है और हर सेकंड हो रही हो रही है | आपके शाकाहार भोजन में न जाने कितने मासूमों, निर्दोषों और रात-दिन मेहनत करने वालों का खून मिला हुआ है | कितने आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवारों की चीखें और सिसकियाँ मिली हुईं हैं | न जाने कितने गरीबों की बद्दुआ मिली हुई हैं…. और आप लोग उसे चुकाते भी हैं ईश्वर द्वारा चुने हुए वसूली एजेंट्स यानि पण्डे-पुरोहित, धर्मों के ठेकेदार और डॉक्टर्स के पास जाकर | आप किसी न किसी रूप में अपना दंड भुगतते ही हैं, क्योंकि आप लोग इन गरीब किसानों, आदिवासियों के दिन रात कि मेहनत का उचित मूल्य नहीं चुकाते बल्कि उन्हें दयनीय अवस्था में छोड़कर अपनी आँखें बंद कर लेते हैं | आप लोगों की शिक्षा न देश के काम आती है और न ही समाज के | केवल कुछ पूंजीपतियों, राजनेताओ, अपराधियों को और अधिक धनवान बनाने, उनकी गुलामी करने से अधिक आप कुछ नहीं कर पाते | आप लोग तो कभी अपने अन्नदाता किसान के आँसू भी नहीं पोंछ पाते, और फिर इस घमंड में चूर हैं कि आप ने कोई हिंसा नहीं की ?

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यदि आपके सिद्धांत को मानकर मैं चलूँ तो मैं भी कह सकता हूँ कि मैंने कोई हिंसा नहीं की, मेरे भोजन में भी किसी की चीख पुकार शामिल नहीं है, क्योंकि मैं पशुओं के वध के समय वहाँ नहीं था | मैंने नहीं सुनी उस पशु की चीख पुकार और न ही मैंने किसी की हत्या होते हुए देखी | मेरे पास तो पका हुआ माँस आया और मैंने खा लिया, तो मैं हिंसक कैसे हो गया ?

अब आप कहेंगे कि मैंने माँस की मांग की, इसलिए किसी जीव की हत्या हुई | बिलकुल सही हैं आप… इसी प्रकार से आपने चीनी की माँग की, अनाज, दाल आदि की माँग की और किसानों को खेती करनी पड़ी और बाद में उचित मूल्य न मिलने से, सूखे और प्राकृतिक आपदाओं से उनकी फसल बर्बाद हुई और वे भूख से मर गये | तो उनकी मौत का जिम्मेदार कौन हुआ ? आप ही हुए न ? यानि आपके शाकाहरी भोजन में इंसानों का माँस और खून मिला हुआ है | आप कारण बने इंसानों की हत्याओं |

फिर आप लोग स्वरोजगार से अधिक महत्व नौकरियों को देते हैं क्योंकि उसमें हल नहीं चलाना पड़ता, उसमें कोई रिस्क नहीं रहता, उसमें प्राकृतिक आपदाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता…. आप की मेहनत और उसका मूल्य सुरक्षित रहता है | इसलिए आप लोगों को नए-नए कारखाने, मॉल, ऑफिस के लिए जगह चाहिए, वह भी किसी बंजर भूमि में नहीं, बल्कि आदिवासियों और किसानों की उपजाऊ भूमि में | उसके लिए आप किसानों को लालच देते हैं, उन्हें विवश करते हैं, आदिवासियों को नक्सली घोषित करके मारते हैं….. और उनकी जमीने हड़प लेते हैं | इतने सारे इंसानों को मारकर भी उनकी चीख पुकार आप को नहीं सुनाई देती यह आश्चर्य की बात है और उससे भी आश्चर्य होता है इस बात पर कि आप कह रहे हैं कि आपको गर्व है कि आपके भोजन में किसी का खून, किसी की चीख पुकार शामिल नहीं है ?

आप जिस धर्म के अंतर्गत माँसाहार को वर्जित बता रहे हैं, वह ब्राहमणों का धर्म है या जैनियों का | ब्राह्मणों को माँसाहार की आवश्यकता है ही नहीं क्योंकि उनका काम है पठन-पाठन, पूजन और शिक्षण | उनको न तो कोई युद्ध लड़ना होता है और न ही किसी का अंगरक्षक बनना होता है | उनको शस्त्र की नहीं शास्त्रों की आवश्यकता होती है | इसलिए उनके लिए माँसाहार वर्जित है |

हमारे आश्रम में भी माँसाहार वर्जित है क्योंकि ठाकुर दयानंद देव जी के बाद कोई इस योग्य यहाँ नहीं आया कि माँसाहार आश्रम में जारी रखते हुए भी सभी को अनुशासित रख सके और वैदिक विद्वानों को अपने तर्कों से परास्त कर सके | इसलिए १९३७ में उनके देहावसान के बाद बाहरी दबाव के चलते धीरे धीरे आश्रम में माँसाहार प्रतिबंधित हो गया |

तो आप सनातन धर्म के उस अंग कि बात कर रहे हैं जिस में माँसाहार वर्जित है | और उसे आपलोग सनातन मान रहे हैं | सनातन धर्म कोई जैनियों का धर्म नहीं है, बल्कि जैन भी सनातन का ही एक अंग हैं | सनातन कोई पंडित-पुरोहितों का धर्म नहीं है, बल्कि पंडित पुरोहित भी सनातन धर्म के एक अंग का ही प्रतिनिधित्व करते हैं | सनातन धर्म में सम्पूर्ण जगत आ जाता है, न कि केवल गुजराती ब्राह्माणों का एक प्रदेश मात्र | जब हम सनातनी कहते हैं स्वयं को, तो सभी के प्रति स्वीकार्यता स्वतः हो जाती है | तब हम माँसाहार और शाकाहार का भेद नहीं करते | तब हम स्वच्छता और अस्वच्छता का ही भेद रखते हैं | तब हम शाकाहारी भोजन कर सकते हैं माँसाहारी व्यक्ति के साथ बैठ कर फिर वह चाहे माँसाहार ही क्यों न कर रहा हो |

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मेरे पिताजी ही नहीं मेरे पूरे परिवार ने माँसाहार छोड़ दिया था कई वर्ष पहले ही | लेकिन मैं जब कभी घर जाता था, तो पिताजी स्वयं मेरे लिए कुछ न कुछ अवश्य बनाते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि मैं मांसाहार पसंद करता हूँ | और हम सभी एक ही टेबल में बैठकर खाते थे बिना किसी भेदभाव के | तो शाकाहारी होने का सही अर्थ यदि समझना है तो मेरे उस परिवार से समझिये जिनसे अब मैं हमेशा के लिए अलग हो चुका हूँ | और सही अर्थों में सनातनी वही थे मेरी नजर में | क्योंकि उन्होंने ऊपर की ओर गति की, अब उनके लिए माँसाहार कोई घृणित विषय नहीं रहा |

फिर जब बलि दी जाती है तब भारतीय नियम है कि एक ही वार में गर्दन अलग कर देनी है | ताकि पशु को दर्द का पता ही न चले | पशु को किसी भी प्रकार का कोई कष्ट न हो इस बात का विशेष ध्यान रखना होता है | इसलिए उसे सजाया जाता है, उसकी पूजा की जाती है… यह सब स्थिति को सामान्य बनाये रखने के लिए ही होता है | माँसाहार में पशु की हत्या में उतनी क्रूरता नहीं होती बल्कि शाकाहार के लिए किसानों पर जो वर्षों तक क्रूरता व हिंसा होती है वह सही अर्थों में पाप है | वे लोग तिल-तिल कर भूख प्यास और बीमारियों से तड़प तड़प कर मरते हैं और अंतिम समय में वे ईश्वर से यही प्रश्न करते हैं कि हमने तो पूरी ईमानदारी से मेहनत की थी, हमने तो सारे देश को भोजन उपलब्ध करवाया, फिर हमारे परिवार आज ऐसी स्थिति में क्यों पहुँच गये ?

आइये अब शास्त्रों से कुछ समझ लें

तंत्र शास्त्र, सात प्रकार के साधना पद्धतियों या आचारों का वर्णन प्राप्त होता हैं तथा दो मुख्य धारणाओं में विभाजित हैं प्रथम पश्वाचार या पशु भाव तथा द्वितीय वीर भाव। इसके अतिरिक्त दिव्य भाव त्रय के अंतर्गत सम्पूर्ण प्रकार के सिद्धि के पश्चात् जब वो स्वयं शिव तथा शक्ति के समान हो जाता हैं। पशु भाव में चार प्रकार के साधन पद्धतियों को समाहित किया गया हैं जो निम्नलिखित हैं।

१. वेदाचार, २. वैष्णवाचार, ३. शैवाचार ४. दक्षिणाचार ५. वामाचार ६. सिद्धान्ताचार ७. कुलाचार।

वामा-चार या वीरा चार (वीर भाव) ; शारीरिक पवित्रता स्नान-शौच इत्यादि का कोई बंधन नहीं हैं, साधक सर्वदा, सर्व स्थान पर जप-पूजन इत्यादि करने का अधिकारी हैं। मध्य या अर्ध रात्रि में पूजन तय प्रशस्त हैं, मद्य-मांस-मत्स्य से देव पूजन, भेद-भाव रहित, सर्व वर्णों के प्रति सम दृष्टि तथा सम्मान इत्यादि निहित हैं। साधक स्वयं को शक्ति या वामा कल्पना कर साधना करता हैं। (विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: तंत्र शास्त्र)

अहं ब्रह्मास्मि

जब हम स्वयं को ब्रहम का स्वरुप समझते हैं, तब प्रत्येक जीव में स्वयं को अनुभव करते हैं | यानि जब हम किसी जीव को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं, तब हम स्वयं के शरीर का ही किसी अंग को भोजन के रूप में ले रहे होते हैं | तब हम फल खाएं या हरी सब्जी…. सभी हमारे ही अंग हैं | इसे इस प्रकार समझिये;

हमारा शरीर हमारे विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करता है जैसे लीवर हमारे मस्तिष्क के लिए ग्लूकोज़ व अन्य आवश्यक द्रव्य तैयार करता है, किडनी खून साफ करती है, हृदय खून में ऑक्सीजन पहुँचाता है और कार्बनडाई ऑक्साइड को उससे अलग करता है | उसे गति देता है…. अब हृदय का ही बाह्य रूप हैं पेड़ पौधे जो कार्बनडाई ऑक्साइड को सोख लेते हैं और ऑक्सीजन में रूपांतरित करके हमें वापस दे देते हैं | तो पेड़ पौधे हमारे शरीर के बाहरी अंग हुए | लेकिन बाहरी अंगों यानि पेड़-पौधों से हमें कोई अपनत्व नहीं महसूस होता, उनकी चीखें और दर्द हम अनुभव नहीं कर पाते इसलिए हमने पूरा जंगल ही साफ़ कर दिया | हमने चिंता ही नहीं की कि कितने जीव जंतुओं का घर और भोजन हमने छीन लिया, हमने तनिक भी चिंता नहीं की कि कितने निरीह पशु पक्षी मारे गये होंगे एक जंगल के नष्ट हो जाने से…… फिर हम डायलॉग मारते हैं, “अहम् ब्रह्मास्मि” |

प्रकृति ने व्यवस्था ही ऐसी कर रखी थी कि सभी कुछ सुचारू रूप से चल सके | ‘जीवो जीवस्य भोजनम्’, हम सभी को जीवित रहने के लिए प्राण कि ही आवश्यकता है अतः हम किसी न किसी का प्राण लेंगे ही यही सनातन धर्म है | पशुओं का यदि शिकार न करे शेर या चीता, तो वे दर्दनाक मृत्यु को प्राप्त होते हैं | क्योंकि वृद्धावस्था में उनकी देखरेख करने वाला कोई नहीं होता, न उनका कोई डॉक्टर होता है और ना ही इतना बैंक बेलेंस कि वे बुढापे में किसी अस्पताल का खर्च उठा पायें | कभी कल्पना कीजिए कि वे पशु कैसे अपनी वृद्धावस्था काटते होंगे | तो प्रकृति ने ही व्यवस्था कर रखी थी कि पृथ्वी के सभी प्राणी एक दूसरे पर निर्भर रहें और इसी प्रकार एक व्यवस्था बनी रहे | कोई भी जीव अनुपयोगी नहीं है इस सृष्टि में और कोई कबाड़ इकठ्ठा नहीं होगा यदि सनातन धर्म के अनुसार ही सब कुछ चलता रहे |

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लेकिन मानव अब समझदार हो गया इसीलिए अब भोजन के लिए जीव हत्या पाप है जबकि भूमि के लिए जीवहत्या पुण्य है | अब भोजन के लिए जीव हत्या हिंसा है, लेकिन राजनीति, धर्म और सत्ता के लिए इंसानों की हत्या भी पुण्य है | नदियों में कारखानों का तेजाब व जहरीला रसायन बहाकर सैंकड़ों जलीय जंतुओं की हत्या करना पाप नहीं है, सागर में परमाणु संयत्रों के कबाड़ फेंककर सागर के जीवों की हत्या कर देना पाप नहीं है….. पृथ्वी के जल और वायुमंडल को जहरीला बनाकर समस्त पृथ्वी के प्राणियों को संकट में डालना पाप नहीं है….. लेकिन माँसाहार पाप है…. और यह सोच केवल इसलिए क्योंकि सोच सनातनी नहीं है |

अब हत्याओं के लिए किराए के हत्यारों का चलन है क्योंकि शाकाहारी और धार्मिक लोग खुद हत्या नहीं कर पाते और ये सभी हत्यारे माँसाहारी ही होते हैं | क्योंकि हत्या करने के लिए मजबूत दिल चाहिए होता है और वह माँसाहार से मिल सकता है | जिसने किसी पशु का कभी वध न किया हो, वह किसी मनुष्य का वध भी बिना दुश्मनी के नहीं कर सकता | कई बार अपनी जान बचाने के लिए अवश्य वह प्रतिरक्षात्मक हमला करता है, लेकिन हत्या करने के उद्देश्य से नहीं | यह बात सभी हत्यारे जानते है, इसलिए किसी शाकाहारी की हत्या उनके लिए बिलकुल वैसा ही होता है, जैसे भेड़ों की हत्या करना | वहीँ कोई माँसाहारी हो तो वह हत्यारों पर भारी भी पड़ जाता है क्योंकि हत्या करना उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं होती और जब अपनी जान पर बनी हो, तब वह शत्रु को मिटा देने कि क्षमता से ही आक्रमण करेगा |

सनातन धर्म जितना व्यापकता से समस्त ब्रह्माण्ड को समझता है, उतना कोई भी किताबी धर्म नहीं समझ सकता और न ही समझा सकता है | फिर किताबी धर्मों में भी ब्राह्मणवाद, वाममार्ग, दक्षिणमार्ग, हिन्दू, मुस्लिम, सिख ईसाई, जैन, बौद्ध…. शिया सुन्नी, उच्च-वर्ग निम्न-वर्ग, सवर्ण-दलित…… आदि विभिन्न मान्यताएं हैं और सभी के अपने अपने नियम और कानून हैं |

बहुत ही आसान होता है जन्मजात शाकाहारी होना और फिर माँसाहारियों को कोसना, आदिवासियों को राक्षस कहना, खुद को श्रेष्ठ और देवता समझना, अपने धर्म को श्रेष्ठ बताना क्योंकि ब्राह्मणवाद को आप लोगों ने अपना धर्म मान रखा है….. लेकिन अपने कुकर्मों की तरफ ध्यान देने का साहस किसी में नहीं है |

किसी आदिवासी ने कभी किसी की भूमि नहीं छीनी होगी, लेकिन खुद को देवता मानने वालों ने इनकी भूमि ही नहीं छीनी, इनपर अत्याचार भी किये…. अमेरिका हो या भारत…. आदिवासियों को मिटाकर ही सभ्य कहलाने का दंभ भरते हैं | जो सनातन धर्म के अनुसार जीते रहे, उन्हें हिंसक, पशु और राक्षस घोषित कर दिया, जबकि खुद पशुओं से भी गिरे गुजरे निकले… लेकिन गर्व कर रहे हैं कि हम श्रेष्ठ हैं |

कल जब मैंने अधुरा पोस्ट किया था, तब दुनिया भर के ताने दे दिए मुझे कि आज के जमाने में जो माँसाहार करता है वही विशुद्ध चैतन्य कहलाता है…… मैं तो जब से संन्यासी हुआ हूँ, माँसाहार नहीं किया, लेकिन हर दिन देखता हूँ देवताओं को इंसानों का खून पीते हुए, धर्म के नाम पर दंगे करवाकर, दलितों को जिन्दा जलाकर इंसानों का भुना माँस खाते हुए…. अभी हाल ही में दो मासूम बच्चों को भून कर खा गये ये श्रेष्ठ देवतागण और उनके मंत्री जी को कुत्तों और गरीबों में कोई फर्क ही नहीं दिखता | ~विशुद्ध चैतन्य 

 

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