"गरीबी नसीब नहीं बल्कि एक साज़िश है !"

“सलाम,

“जनाब एक सवाल था , क्या गरीबी पूंजीवाद का एक महत्वपूण अंग है ??? मैंने कार्ल मार्क्स के कुछ विचार देखे है “YouTube” पर , जिसमे एक बात पे ज़ोर दिया गया है “गरीबी नसीब नहीं बल्कि एक साज़िश है !” समय मिले तो please अपने विचार दीजियेगा “

कई दिन पहले एक सज्जन ने मैसेज द्वारा उपरोक्त प्रश्न का उत्तर जानना चाहता था, लेकिन व्यस्तता के कारण समय पर उत्तर नहीं दे पाया था | वैसे भी यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका हल खोजने के लिए न जाने कितनी सदियों से लोग लगे हुए हैं और न जाने कितनी क्रांतियाँ हुईं, कितने सत्तापरिवर्तन हुए… लेकिन हल नहीं मिला | फिर भी मैं प्रयास करता हूँ कि दूसरों के दृष्टिकोण की बजाये अपने दृष्टिकोण से प्रश्न का उत्तर दूं |

पूंजीवाद के विरुद्ध रहे कार्ल मार्क्स, और न जाने कितने लोग उनके साथ हो लिए, कुछ राष्ट्र मार्क्सवादी हो गये, लेकिन क्या वे राष्ट्र पूंजीवाद से मुक्त हो पाए ? जिस उद्देश्य से पूंजीवाद के विरुद्ध युद्ध छेड़ा गया, क्या वह सफल हो पाया ?

आज कई राजनैतिक दल हैं जो स्वयं को मार्क्सवादी कहते हैं लेकिन क्या वे वास्तव में मार्क्सवादी हैं ?

शायद नहीं !

कार्लमार्क्स ने कहा था,

If we have chosen the position in life in which we can most of all work for mankind, no burdens can bow us down, because they are sacrifices for the benefit of all; then we shall experience no petty, limited, selfish joy, but our happiness will belong to millions, our deeds will live on quietly but perpetually at work, and over our ashes will be shed the hot tears of noble people.                   Marx, Reflections of a Young Man (1835)

History calls those men the greatest who have ennobled themselves by working for the common good; experience acclaims as happiest the man who has made the greatest number of people happy.                                           Marx, Reflections of a Young Man (1835)

 लगभग सभी दार्शनिक, अध्यात्मिक गुरुओं ने भी यही माना कि हम यदि परोपकारी बनें, समाज व मानव कल्याण को प्राथमिकता दें, तो कोई भी दुखी, शोषित यह पीड़ित नहीं हो सकता | हर कोई समृद्ध हो सकता है और हर कोई सुखी रह सकता है |

लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा होता नहीं | हर कोई प्रवचन करने में लगा है, व्यवहार में कोई नहीं ला रहा | हर कोई दूसरों से अपेक्षा रखता है, लेकिन स्वयं दूसरों की अपेक्षाओं अनदेखा कर देता है | लोग कार्लमार्क्स, बुद्ध, जीसस या अन्य किसी भी महान व्यक्तित्व के अनुयाई (follower) बनकर समझते हैं कि उन्होंने कोई महान कार्य कर लिया | जबकि उन्होंने सिवाय जय जय करने के, एक नया सम्प्रदाय खड़ा करने के कुछ नहीं किया | यहाँ तक कि जिनके नाम पर सम्प्रदाय या पंथ खड़ा किये उनके ही आदर्शों से कोसों दूर हो गये |

मार्क्सवाद हो या मावोवाद, हिन्दुवाद हो या इस्लाम…. सभी के नेताओं, धर्मगुरुओं को देख लीजिये, सभी व्यक्तिगत हितों को साधने में लगे हुए हैं | केवल जनसभाओं, चुनावों में ही इनको जनकल्याण की बातें याद आतीं हैं, बाकि समय इनको व्यक्तिगत विकास व उत्थान करने से ही फुर्सत नहीं मिलती | अपने अड़ोस-पड़ोस में ही देख लीजिये, कितने विवश व लाचार लोग मिल जायेंगे, लेकिन सभी मिलकर भी उनकी विवशता व लाचारी दूर नहीं कर पाते |

क्यों ?

क्योंकि सभी व्यक्तिगत सुखों को महत्व देते हैं | किसी नेता या आध्यात्मिक गुरु के पीछे जो लोग चल रहे होते है, वे भी व्यक्तिगत स्वार्थों के वशीभूत ही चल रहे हैं, सर्वहित या मानव कल्याण से उनका कोई लेना देना नहीं होता | अब ऐसे मानवों के समाज के लिए कार्लमार्क्स तो क्या, गौतम बुद्ध, महावीर, जीसस, पैगम्बर…..आदि मिलकर भी कुछ नहीं नहीं कर पायेंगे | जो समाज केवल दूसरों के विचारों को ढोने में रूचि रखता है, रटने और रटाने में रूचि रखता है, लेकिन व्यवहार में न लाता हो, उस समाज का भला कैसे हो सकता है ?

अक्सर मुझे कई बार सुनने को मिलता है कि आप आगे बढ़ें, कुछ करें समाज के लिए, हम आपके साथ हैं…. लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आता कि इतने लोग दुनिया में पहले ही आ चुके हैं और आज भी ना जाने कितने ही लोग कुछ न कुछ समाज के लिए कर ही रहे हैं कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए, फिर ये सभी लोग उनसे प्रेरणा क्यों नहीं लेते ? मेरे भरोसे क्यों बैठे हुए हैं ?

उसका कारण जो मेरी समझ में आया, वह यह कि समाज का बड़ा हिस्सा व्यक्तिगत स्वार्थों को पूरा करने में व्यस्त है, इसलिए दूसरों के लिए समय नहीं है | यहाँ तक कि वे अपने अड़ोस-पड़ोस में किसी की सहायता कर पाने के योग्य नहीं हैं, इसलिए यदि कोई खाली दीखता है, तो उसे दौड़ा देते हैं | अगर वह लड़-मरकर किसी तरह कुछ कर पाया तो उसकी मूर्ती बना देने और उसपर माला चढ़ाकर जय जय करने लगेंगे… लेकिन खुद कभी प्रयास नहीं करेंगे कि उसकी तरह कुछ कल्याणकारी कार्य करें |

अब आप लोग फेसबुक प्रयोग करते हैं तो देखते होंगे कि आपके पोस्ट के नीचे लिखा हुआ आता होगा कि इतने रूपये दीजिये और इतने लोगों तक अपने पोस्ट पहुँचायें | यानि यदि जनकल्याणार्थ भी निःशुल्क लिखें और चाहें कि वह अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचें, तो आपको शुल्क चुकाना होगा | आप कुछ भी करना चाहें, यदि आपके जेब में पैसे नहीं हैं तो आप कुछ भी विशेष नहीं कर पायेंगे | वहीँ जिनके पास पैसे हैं, वे कुछ करना नहीं चाहते | बस यही से शुरू हो जाती है भेदभाव, असमानता की कुंठाएं |

फिर जो विवश व लाचार हैं, लेकिन उनके पास अपने खेते हैं, जमीन हैं… उन्हें भी यदि कोई राह दिखाने की कोशिश की जाए तो, उनका भी सबसे पहले कहना यही होता है कि आप खुद पहले कुछ करके दिखाइये फिर हमें  समझाइये….. वे दिन भर भूखा रहना पसंद कर लेंगे लेकिन कोई ऐसा मार्ग नहीं अपनाना चाहेंगे जो उनके हित में हो | वे नेताओं, बाबाओं, ईश्वर के भरोसे अपनी पूरी जिंदगी बिता लेंगे, लेकिन अपने विवेक का प्रयोग नहीं करेंगे | यदि कभी कहीं से उनको आर्थिक सहयोग मिल भी जाए तो शराब में उड़ा देंगे या फिर खाने-पीने में… लेकिन उसे अपने उत्थान के लिए प्रयोग नहीं कर पायेंगे |

ऐसे में कोई व्यक्ति जब अपनी लगन, बुद्धि व विवेक से आर्थिक उत्थान करता है.. चाहे उसके लिए उसने कुछ भी सही-गलत मार्ग अपनाया हो, लोग उसे अपना दुश्मन समझने लगते हैं | और होता भी कुछ ऐसा है कि वे दुश्मन बन जाते हैं | वे गरीबों से उनकी जमीनें छीनने लगते हैं, वन्य जीवों से उनका प्राकृतिक आवास छीनने लगते हैं…. क्योंकि उनकी भूख बढती चली जाती है | तो वे शत्रु बन ही जाते हैं | और वे अपने आपको श्रेष्ठ मानते हैं इसलिए वे श्रेष्ठ यानि धनी लोगों से ही सम्बन्ध रखना पसंद करते हैं | इससे उनकी ताकत बढ़ जाती है और उन धनी लोगों के विचारों को हम पूंजीवाद कहते हैं | हम खुद तो उठने का प्रयत्न करते नहीं, लेकिन कुछ धनि लोगों के समूह को पूंजीवादी का नाम देकर अपने दयनीयता को महान बनाने का प्रयत्न करने लगते हैं |

ओशो भी कभी चप्पल पहनकर गाँव गाँव लोगों को जाकर जगाने का अभियान चलाया करते थे, लेकिन जल्द ही उनको भी समझ में आ गया कि जो गरीब हैं, वे गरीब ही रहेंगे क्योंकि उनको उठना नहीं है | उन्हें भी यही कहा जाता था कि हमारे भले की छोड़िये पहले अपना तो भला कर लीजिये…. और फिर एक दिन उन्होंने वास्तव  में अपना भला कर लिया और ९५ रोल्स रोयस के मालिक बन बैठे | लोगों ने पूछा उनसे कि आपको इतने कारों की आवश्यकता क्यों पड़ी, आप तो संत हैं, बैरागी हैं ?

तो उनका उत्तर था, “यह सब मेरे लिए नहीं, आप लोगों के लिए है | आप लोगों को यहाँ तक लाने के लिए इन कारों की आवश्यकता पड़ी | आप लोग मेरे पास आये कोई अध्यात्मिक ज्ञान लेने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि यह जान सकें ऐसा राज क्या है जिससे कोई व्यक्ति इतनी जल्दी इतना अमीर हो गया | आप व्यक्तिगत स्वार्थ के वशीभूत होकर आये हैं…. तो यह कार आप लोगों के आकर्षण का कारण बनी…. मुझे इन कारों की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन यदि मुझे आप लोगों को जगाना है तो मुझे आपसे अधिक अमीर होना ही पड़ेगा…वरना आप लोगों को मेरी बातें समझ में आनी तो दूर, सुनाई भी नहीं पड़ेगी |

तो ओशो यह समझ चुके थे कि समृद्ध तो हर कोई होना चाहता है, लेकिन समृद्धि का सही अर्थ नहीं पता | सभी दूसरों के खेत की हरियाली पर नजर गड़ाए बैठे हैं | कोई यह नहीं विचार कर रहा कि जो उनके पास उपलब्ध साधन है वह उनकी समृद्धि व उत्थान में सहयोगी है | वे यदि अपने सीमित संसाधनों का युक्तिसंगत प्रयोग करें तो वे भी समृद्ध हो सकते हैं |

शायद अब आप समझ गये होंगे कि गरीबी नसीब है, साजिश नहीं | गरीबी पूंजीवाद का अंग नहीं, बल्कि पूंजीहीनता का भाव है | पूंजीवादी ताकतवर नहीं हैं, बल्कि वे पूँजीहीन कमजोर हैं जो पूंजीवादियों से यह आस लगाए बैठे हैं कि अपनी समृद्धि में से उनको हिस्सा दे दें | जब समाज की बुनियाद ही व्यक्तिगत हित व स्वार्थ को महत्व देने पर आधारित है, तो किसी भी समृद्ध व्यक्ति से आप यह कैसे अपेक्षा रख सकते हैं कि वे आपके हित की सोचे ?

कुछ समृद्ध लोग यदि सहयोग करते भी हैं तो आपके ही नेता व ठेकेदार हजम कर लेते हैं, इसलिए आपका नेता तो समृद्ध हो जाता है, आप गरीब के गरीब ही रह जाते हैं |

तो मैं पूंजीवाद को दोषी नहीं मानता, बल्कि उस मानसिकता को दोषी मानता हूँ जो भूखे, नंगे दीन-हीन साधू संतों की जय-जयकार करते हैं, गरीबी और भुखमरी को पूजनीय मानते हैं, अपनी शक्ति व सामर्थ्य का प्रयोग अपने व समाज के हित में करने के स्थान पर मुफ्त के सिम, लेपटॉप, मोबाइल, साइकिल, कम्बल बटोरने में लगाते हैं और फिर पूंजीवाद को कोसते हैं | यह ध्यान रखें जो ताकतवर होगा वह शोषण नहीं करेगा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है मानव जगत में | हाँ पशु-पक्षियों में ऐसा होना दुर्लभ ही होता है, लेकिन मानवों में ऐसा न होना दुर्लभ होता है | और यह प्रमाणिक तथ्य है चाहे तो आप उन नेताओं को देख लीजिये जो जनता के हित के लिए सत्ता में आये थे, लेकिन उनके अपने ही क्षेत्र की जनता के लिए कुछ करना तो दूर दर्शन भी दुर्लभ हो गये | कुछ ही वर्षों में तो कई सौ करोड़ संपत्ति के मालिक बन गये, लेकिन जनता वहीँ की वहीँ रह गयी…. और वही नेता जनता के बीच जाकर पूंजीवाद के विरुद्ध नारे लगाते हैं |

सारांश यह कि मानवतावाद हो या साम्यवाद या समाजवाद, यदि नारे लगाकर सहयोग या उत्थान की आशा से अपना रहे हैं, तो व्यर्थ है कोई  लाभ  नहीं  होने  वाला | लेकिन  यदि  हम अपनी  भूमि, अपने सुखों  की सीमाओं  में रहते हुए, आपस  में  सहयोगी  हो जाएँ  तो अवश्य सभी का हित  होगा | जैसे कि आदिवासियों में आपसी सहयोगिता का भाव पहले बहुत देखने मिलता था, लेकिन अब वह भी लुप्त होने लगा है क्योंकि स्वार्थी शहरियों के संपर्क में अधिक आने लगे | ~विशुद्ध चैतन्य 

भारतीय आदिवासी नृत्य समारोह

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दुनियाभर मेँ कीसी भी देश मेँ जाकर खुद मुआयना करें। ज्यादातर गरीब पिछड़े लोग बदसुरत ह़ोते है। सुँदर दीखने वाले लोगों को जीवन संवारने के बहोत मौके मीलते है। जबकि करोडों लोग बदसुरत होने की वजह से समाज मेँ अच्छा मकाम नहीं पा सकते ।