यह दोगली नीति सनातन हो ही नहीं सकती

१. वेदों की शिक्षा के प्रतिकूल:- जैसे वेदों में माँस खाने की मनाही हैं जबकि वाल्मीकि रामायण के कुछ श्लोक माँस भक्षण का समर्थन करते हैं अत: वह प्रक्षिप्त हैं।

२. श्री रामचंद्र जी के काल में वाममार्ग आदि का कोई प्रचलन नहीं था इसलिए वाममार्ग की जितनी भी मान्यताएँ हैं , उनका वाल्मीकि रामायण में होना प्रक्षिप्त हैं।

३. ईश्वर का बनाया हुआ सृष्टि नियम आदि से लेकर अंत तक एक समान हैं इसलिए सृष्टि नियम के विरुद्ध जो भी मान्यताएँ हैं वे भी प्रक्षिप्त हैं जैसे हनुमान आदि का वानर (बन्दर) होना, जटायु आदि का गिद्ध होना आदि क्यूंकि पशु का मनुष्य के समान बोलना असंभव हैं। हनुमान, जटायु आदि विद्वान एवं परम बलशाली श्रेष्ठ मनुष्य थे।

४. जो प्रकरण के विरुद्ध हैं वह भी प्रक्षिप्त हैं जैसे सीता की अग्नि परीक्षा आदि असंभव घटना हैं जिसका राम के युद्ध में विजय के समय हर्ष और उल्लास के बीच तथा १४ वर्ष तक जंगल में भटकने के पश्चात अयोध्या वापसी के शुभ समाचार के बीच एक प्रकार का अनावश्यक वर्णन हैं।

उपरोक्त अंश मैंने एक ब्लॉग (Vaidic Voice) से लिया है | और इसी प्रकार के कई और ब्लॉग मिल जायेंगे, विशेषकर आर्यों के जो यह स्पष्ट करते हैं कि हिंद्रू धर्म सनातन या सार्वभौमिक धर्म नहीं है केवल एक अंचल विशेष के विशेष वर्गों का ही धर्म है जैसे इस्लाम या ईसाई आदि | यहाँ हिन्दू धर्म शब्द इसलिए प्रयोग किया क्योंकि वैदिक धर्म हिन्दू धर्म के रूप में में अब जाना जाता है, वरना हिन्दू कोई धर्म था ही नहीं |

READ  ....वे सभी मानसिक रूप से विक्षिप्त-शूद्र हैं

लोग कहते हैं कि मुगलों के आने से पहले सनातन धर्म के नाम से जाना जाता था हिन्दू धर्म तो यह भी गलत है, क्योंकि सनातन इतना संकीर्ण हो ही नहीं सकता जो केवल ब्राह्मण वर्ग को ही महत्व देता हो और बाकियों को राक्षस या नीच कहता हो | सनातन धर्म हिरण को श्रेष्ठ और सिंह को नीच नहीं कहता बल्कि दोनों के लिए समान भाव ही रखता है |

अब जो लोग माँसाहारियों से घृणा करते हैं उन्हें ही देखिये, अमेरिका का वीज़ा लेने के लिए कैसे पागल हो रहे होते हैं ? उनका बच्चा किसी गुरुकुल या वैदिक स्कूल में नौकरी पायेगा तो माथा पीटेंगे, लेकिन अमेरिका में नौकरी मिल जाए तो मोहल्ले भर में मिठाई बाँटते फिरेंगे | अपने बच्चो को वैदिक स्कूल में पढ़ाने से बेहतर, मिशनरी स्कूल में पढ़ाएंगे…. और फिर खुद को श्रेष्ठ ब्राह्मण भी बताएँगे |

तो यह दोगली नीति सनातन हो ही नहीं सकती | और अब वेदों को पढ़ने और समझने में अपना समय व्यर्थ करने की कोई आवश्यकता ही नहीं समझता मैं | क्योंकि यह तो सिद्ध हो ही गया है कि जिस प्रकार संविधान जनहित से अधिक उच्च वर्गों के हितों के लिय ही काम में आता है, जिस प्रकार जिस अपराध में किसी गरीब तो तुरंत जेल हो जाती है, बिना कोर्ट का फैसला आये, लेकिन अमीर व्यक्ति को उसी आरोप में फैसला आने तक जेल में नहीं रखा जा सकता | उसी प्रकार ये धार्मिक ग्रन्थ भी हैं | ये भी एक वर्ग विशेष की सुख सुविधा को ध्यान में रखकर ही लिखे गये हैं, सर्वसाधारण के लिए हैं ही नहीं | ~विशुद्ध चैतन्य

READ  ...फिर कहते हैं कि सरस्वती की पूजा हमारे देश में होती है और विद्वान अविष्कारक विदेशों में पैदा होते हैं

लेख से सम्बंधित अपने विचार अवश्य रखें

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of