“जो भीड़ का गुलाम है, वह कभी भी जीवन क्रांति के रास्ते से नहीं गुजर सकता” ~ओशो

एक बच्चा स्कूल में मैदान में खेल रहा है-हाकी खेल रहा है। पैर में चोट लग गयी है, खून बह रहा है। उसे पता भी नहीं चला, क्योंकि वह हाकी खेलने में संलग्न है, आक्युपाइड है। उसकी सारी अटेंशन, उसका सारा ध्यान, हाकी खेलने में लगा है वह जो गोल करना है, उस पर अटका हुआ है। वह जो चारों तरफ खिलाड़ी हैं, उनसे अटका
हुआ है; वह जो प्रतियोगिता चल रही है, उसमें उलझा हुआ है। उसे पता भी नहीं है कि उसके पैर से खून बह रहा है। वह दौड रहा है, दौड़ रहा है। फिर खेल बंद हो गया है और अचानक उसे खयाल आया है कि पैर
से खून बह रहा है। यह खून बहुत देर से बह रहा है, लेकिन अब तक उसे पता नहीं चला। अब वह मलहम-पट्टी की चिंता में पड़ गया है। लेकिन इतनी देर तक उसे पता नहीं चला! क्योंकि जब तक वह खेल में व्यस्त था, तब तक पता चलने का सवाल ही नहीं था।

हम बाहर देख रहे हैं। गोल करना है, वह देख रहे हैं। प्रतियोगिता चल रही है, वह देख रहे हैं। लोगों की आंखों में देख रहे हैं। हमें पता ही नहीं चलता कि भीतर कितने कांटे हैं और कितने घाव हैं। भीतर पता ही नहीं चलता, कितना अंधकार है! भीतर पता ही नहीं चलता, कितनी बीमारियां हैं! उलझे रहेंगे और उलझे रहेंगे। जिंदगी बीत जायेगी और पता नहीं चलेगा।

एक बार हटायें आंख बाहर से और भीतर के घावों को देखें! और मैं आपसे कहता हूं उन्हें देखना उनके बदलने का पहला सूत्र है। एक बार दिखायी पड़ा कि फिर आप उन्हें बर्दाश्त नहीं कर सकते। फिर आपको बदलना ही पड़ेगा। और बदलना कठिन नहीं है। जो दुख दे रहा है, उसे बदलना कभी भी कठिन नहीं होता, सिर्फ भुलाये रखना आसान होता है। बदलना कठिन नहीं है, लेकिन भुलाये रखना बहुत आसान है। और जब तक भूला रहेगा, तब तक जीवन में कोई क्रांति नहीं होगी। जीवन क्रांति का दूसरा सूत्र है, ‘मैं दूसरों की आंखों में न देखूं। ‘ अपनी आंख में, अपने भीतर, अपनी तरफ, मै जहां हूं-वहां देखूं-यही असली सवाल है, यही असली समस्या है व्यक्ति के सामने कि ‘मैं क्या हूं? जैसा भी मैं है उसको ही देखना और साक्षात्कार करना है।

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लेकिन हम?

कोई हमसे पूछेगा- आप कौन हैं? तो हम कहेंगे- ‘फलां आदमी का बेटा हूं फलां मोहल्ले में रहता हूं फलां गांव में रहता हूं, -यही परिचय है हमारा। यह लेबल जो हम ऊपर से चिपकाये हुए दें, यत। हमारी पहचान है, यही हमारी जिंदगी का सबूत है-हमारी जिंदगी का प्रमाण है! यही हमारी जानकारी है अपने बाबत। हमें पता ही नहीं है कि भीतर हम कौन हैं! अभी तक हम बाहर से कागज चिपकाये हुए हैं। और वे भी दूसरों के चिपकाये हुए हैं। किसी
ने एक नाम चिपका दिया है। उसी नाम को जिंदगी भर लिए हम घूम रहे है। उस नाम को कोई गाली दे दे, तो लड़ने को तैयार हो जाते हैं।

स्वामी राम अमेरिका गये थे। वहां के लोग बड़ी मुश्किल में पड़ गये। एक बार राम को कुछ लोगों ने गालियां देने लगे, तो राम ने मित्रों को आकर कहा कि आज बड़ा मजा हो गया। बाजार में कुछ लोग मिल गये और राम अच्छी गालियां देने लगे। हम भी खड़े सुनते रहे। लोगों ने कहा,

‘क्या आप पागल हो गये हैं। लोग राम को गालियां देते थे?

कौन राम? स्वामी राम ने कहा,

‘यह राम जिसको लोग राम कहते हैं। कुछ लोगों ने इस राम को घेर लिया और बहुत गालियां देने लगे। हम खड़े होकर देखते रहे कि आज राम को अच्छी गालियां पड़ रही हैं। लेकिन हम राम होकर झगड़े में पड़े हैं। पर हम राम नहीं हैं। हम तो जो हैं, उसका नाम तो राम नहीं है। यह नाम तो किसी का दिया हुआ है। यह तो समाज का दिया हुआ है। हम तो कुछ और हैं। जब नाम नहीं था, तब भी हम थे। जब नाम नहीं रह जायेगा, तब भी हम होंगे। अभी भी रात सो जाते हैं, तो नाम मिट जाता है-समाज भी मिट जाता है, फिर भी हम सोते हैं। आप मिट जाते हैं रात, न पत्नी रह जाती है आपकी, न बेटा रह जाता है आपका-न धन-दौलत रह जाती है-न पद प्रतिष्ठा रह जाती
है, फिर भी आप रह जाते हैं, जब कि सब मिट जाता है। वह जो सोसायटी देती है, वह बाहर ही छूट जाता है, वह भीतर जाता ही नहीं। वह मरने के वक्त भी भीतर नहीं आता- और ध्यान वक्त भीतर नहीं जाता। वह जो समाप्त होता है, वह बाहर है, और बाहर ही रह जाता है। लेकिन उसको हम अपना व्यक्तित्व समझे हुए हैं! इस भूल से मुक्त हो जाना चाहिए। अन्यथा कोई व्यक्ति जीवन की यात्रा पर एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता है।

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सुबह मैंने एक सूत्र कहा है कि ‘सिद्धात्तों से मुक्त हो जायें’, क्योंकि जो सिद्धान्तों से बंधा है, वह जीवन क्रांति के रास्ते पर नहीं जा पायेगा।

दूसरा सूत्र कहता हूं ‘ भीड़ से मुक्त हो जाना है’, क्योंकि जो भीड़ का गुलाम है, वह कभी भी जीवन क्रांति के रास्ते से नहीं गुजर सकता। आने वाले दिनों में कुछ और सूत्र भी कहूंगा, लेकिन उन सूत्रों को सुनने भर से कुछ होने वाला नहीं है। थोड़ा-सा भी प्रयोग करेंगे, तो द्वार खुलेगा; कुछ दिखायी पड़ना शुरू होगा। धर्म एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। धर्म एक जीवित वितान है। जो प्रयोग करता है, वह रूपांतरित हो जाता है और उपलब्ध होता है वह सब, जिसे पाये बिना हम व्यर्थ जीते हैं और व्यर्थ मर जाते हैं; और जिसे पा लेने पर जीवन एक धन्यता हो जाती
है; और जिसे पा लेने पर जीवन कृतार्थ हो जाता है; और जिसे पा लेने पर सारा जगत परमात्मा में रूपांतरित हो जाता है। लेकिन जिस दिन भीतर दिखायी पड़ता है कि भीतर परमात्मा है, उसी दिन यह श्रम भी मिट जाता है कि बाहर कोई और है। बस, फिर तो सिर्फ ‘वही’ रह जाता है। जो भीतर दिखायी पडता है, वही बाहर भी प्रमाणित हो जाता है। और जगत के मूल सत्य को जान लेना, जीवन को अनुभव कर लेना है। और जीवन को अनुभव
कर लेना, मृत्यु के ऊपर उठ जाना है। फिर कोई मृत्यु नहीं है। जीवन की कोई मृत्यु नहीं है। जो मरता है, वह समाज के द्वारा दिया गया झूठा व्यक्तित्व है। जो मरता है, वह प्रकृति के द्वारा दिया गया झूठा शरीर है। जो नहीं
मरता है, वह जीवन है। लेकिन उसका हमें कोई पता नहीं है! पहले समाज से हटें-समाज के झूठे व्यक्तित्व से हटें। फिर प्रकृति के दिये गये व्यक्तित्व से हटें। उसकी कल मैं बात करूंगा कि प्रकृति के दिये गये शरीर से कैसे हटें; और फिर हम वहां पहुंच सकते हैं, जहां जीवन है।

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मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, उससे बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

‘जीवन-क्रांति के सूत्र’,
बड़ौदा, 13 फरवरी 1969 संध्या

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