….और तू किसलिए आया है दुनिया में ?

अभी जब मैं छत पर टहलते हुए चिंतन कर रहा था, तब अंतरात्मा ने प्रश्न किया मुझसे कि मैं जिस काम के लिए आया था इस दुनिया में, क्या वह कर पाया ?

मैंने उत्तर दिया, “नहीं क्योंकि मैं एक नंबर का आलसी और कामचोर हूँ ।”

“तो अभी तक तुम ऐसे कितने संत सन्यासी से मिले जो मेहनती हैं और जिस काम के लिए आये थे वही कर रहें हैं ?” फिर से प्रश्न आया ।

“मुझे तो एक भी निकम्मा और आलसी सन्यासी या संत ऐसा नहीं मिला जो जिस काम के लिए आया था वह न कर रहा हो । कोई खाने के लिए आया था तो पूरी मेहनत कर रहा है खाने में, कोई घुमने फिरने के लिय आया है, कोई पैसे और शोहरत कमाने के लिए आया है, कोई भजन कीर्तन के लिए आया है, कोई लड़कियों के चक्कर में आया है….कोई ईश्वर को जंगलों और पहाड़ों में खोज रहा है, कोई मंदिरों और मस्जिदों में खोज रहा है….मेहनत तो सभी कर रहें हैं, मेरी तरह हाथ पर हाथ धरे थोड़े ही बैठे हुए हैं ?” मैंने उत्तर दिया ।

‘हा हा हा हा….और तू किसलिए आया है दुनिया में ? क्या बाकी सभी से स्वयं को अधिक समझदार मानता है ? अरे मुर्ख, तुझे लोग बार बार कहते हैं कि हमें मत सुधारो खुद को सुधार लो तो दुनिया सुधर जायेगी और तेरे भेजे में यह बात नहीं आती ? बंद कर यह समाज सेवा की नौटंकी और बाकी लोगों की तरह निकल पड़ पहाड़ों में ईश्वर की खोज करने ।” अंतरात्मा ने फटकार लगाईं ।

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मैं सहम गया और बोला, “क्या तू भी मानती है कि मैं गलत हूँ ? वैसे भी जब मैंने सब कुछ त्याग दिया तो पाने की लालसा ही क्यों करनी, फिर चाहे ईश्वर या मोक्ष ही क्यों न हो ? मुझे आश्रम की या किसी और की चिंता ही क्यों करनी, जब मैं करता हूँ ही नहीं ? जब सब कुछ ईश्वर को ही करना है या पूंजीपतियों के मेहरबानी से ही होना है तब मैं क्यों अपना दिमाग खराब करूँ ?

मैं जब घर से चला था, किसी के सामने हाथ फैलाने की आवश्यकता नहीं पड़ी । किसी से भीख नहीं माँगी, मिला कही तो खा लिया और नहीं तो न सही….लेकिन फुटपाथ पर आने से पहले और अब जब से इन आश्रमों के चक्कर में पड़ा हूँ, पैसे वालों के रहमोकरम पर आ गया हूँ । शायद मैं भटक गया क्योंकि मैंने फिर वही सब तामझाम इकट्ठी कर ली जिसके लिय पैसो की आवश्यकता पड़ती है । क्या जिस काम को करने आया था वह नहीं हो पायेगा बिना पूंजीपतियों के चौखट में मत्था टेके ?

मैं यह नहीं कर सकता क्योंकि मैं पारंपरिक सन्यासी नहीं हूँ । मैं यह तो जानता हूँ कि मैं सही दिशा में हूँ लेकिन अभी उस पड़ाव तक नहीं पहुँचा हूँ जहाँ से मुझे सहयोग और सहयोगी मिल सकें । अभी तो अकेले ही चलना है । टूट गया तो किसी का कोई नुक्सान नहीं होगा लेकिन सफल हुआ तो जीवन का उद्देश्य पूरा हो जाएगा । लेकिन ये सारे आडम्बर भी तो मेरे नहीं है, ये तो ईश्वर ने ही उपलब्ध करवाए थे । मैं कौन सा अपनी मेहनत से पाया यह सब ? मैं तो महा आलसी और निकम्मा सन्यासी हूँ !” मैं बिना रुके अपने ही रौ में बकता चला गया ।

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“तेरा कुछ नहीं हो सकता । तू दुनिया के लिए सिवाय बोझ के और कुछ नहीं है ।” इतना बोलकर अंतरात्मा चुप हो गई और मैं चुपचाप छत से नीचे उतर आया ।

आशा करता हूँ कि आप सभी मेहनत कर रहे होंगे । मेरी तरह मत बनिएगा कभी । क्योंकि बनी बनाई राह पर चलना ही श्रेष्ठ है । नई राह और मंजिल की खोज में निकलना और वह भी बिना यह जाने कि खोज क्या रहे हैं और क्यों, बहुत ही कठिन व मूर्खतापूर्ण कार्य है । इसे मेरे जैसे सिरफिरा करे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए । कई लोग मेरे गेरुए से मुझे पारंपरिक सन्यासी समझ लेते और भाग्य या कुंडली पूछने लगते हैं । मैं उनसे क्षमा मांगते हुए कहना चाहता हूँ कि मुझे मेरा अपना भाग्य का पता नहीं, मैं किसी और का भाग्य क्या खाक बताऊंगा ? -विशुद्ध चैतन्य

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