हर किसी को लगता है कि वही समय का सदुपयोग कर रहा है

लोग जो समय रोज़े, नमाज़,संध्‍या-पूजा और प्रार्थना में नष्ट करते हैं, उसे यदि समाज के किसी उपयोगी काम में लगावें, तो अपने भाइयों का अपना बहुत कल्याण कर सकते हैं। यदि संसार से ईश्वर और धर्म के व्यर्थ गपोड़े मिट जायँ, तो लोगों में फ़ैले हुए झगड़ों का अन्त हो जाय। जब कोई मूर्ख से मूर्ख पिता भी अपना वश चलते अपने पुत्रों को नहीं लड़ने देता तो, यदि वास्तव में कोई खुदा होता और सर्वशक्तिमान् खुदा होता- तो वह अपनी संतान को कदाचित् अपने नाम पर कुत्तों की तरह न लड़ाता। यदि खुदा शक्ति और बुद्धिवाला होता तो भी वह एक ही धर्म सारे संसार के लिए बनाता- सारे संसार की एक ही बोली और एक ही संस्कृति होती- जिससे इन झगड़ों का बीज ही न पड़ता। जो खुदा झगड़ों का बीज बोता हो, जो धर्म मनुष्यों के लिए वास्तविक हितकर न हो, वह यदि वास्तव में कुछ हो भी तो विषवत् त्याज्य ही है। -राधामोहन गोकुलजी (पुस्तक: ईश्वर का बहिष्कार)

मेरे एक मित्र श्री D.r. Godara जी ने इस पुस्तक के विषय में जानकारी दी और मुझसे अपनी राय व्यक्त करने का आग्रह किया | मैंने पुस्तक के कुछ अंश पढ़े, लेकिन पूरी नहीं पढ़ी | फिर भी मैं इतना तो समझ ही चुका था कि पुस्तक के लेखक गोकुलजी, बहुत ही सुलझे विचारों वाले, पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं |
पढ़े-लिखे व्यक्तियों कि सबसे बड़ी समस्या यह होती कि उनकी कल्पनाशीलता ध्वस्त हो जाती है | वे केवल उन्ही चीजों पर विश्वास करते हैं जो भौतिक है या जो दिखाई दे सकती है, जिन्हें अपनी पाँचो इन्द्रियों से अनुभव किया जा सकता हो.. यानी हवा और गैसों को भी वे इसलिए मानते हैं क्यों कि उन्हें पाँचों इन्द्रियों में से किसी एक से महसूस किया जा सकता है | उनके लेख का एक अंश यहाँ दे रहा हूँ,

cover-ishwar-ka-bahishkar-193x300“ईश्वर एक ऐसा कल्पित पदार्थ है, जिसे कभी किसी ने अपनी ज्ञानेन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं किया इसलिए कि उसका सर्वथा अभाव है। ईश्वर कोई ऐसी चीज़ है ही नहीं। जिस पदार्थ का अत्यन्त अभाव है, उसका अस्तित्व कभी हो ही नहीं सकता। संसार में जितनी वस्तुएँ हैं, वे चाहे कितनी भी सूक्ष्म क्यों न हों, सबका प्रादुर्भाव प्रकृति से होता है; प्रकृतिजन्य सारे पदार्थ किसी न किसी दशा में इन्द्रिय ग्राह्य होते हैं। उदाहरण के लिए जल को लीजिए। यह भाप की सूरत में आँखों को दिखाई देता है। यदि यह और विश्लिष्ट होकर सूक्ष्मतम वायव्य (Gaseous) हो जाय अर्थात् गैस का रूप धारण कर ले, तो भी वह इन्द्रियों द्वारा जानने का विषय होगा। फि़र देखिए बिजली बहुत ही सूक्ष्म रूप की एक वस्तु है; आँख, कान, नाक द्वारा इसे नहीं जान सकते। लेकिन बिजली की उत्पत्ति प्राकृत पदार्थों से होती है; और जब हम उसका व्यवहार किसी रूप में करते हैं तो द्रव्यों में उसे स्पष्ट देखते हैं कि काम कर रही है।”

तो जो भी थोड़ा बहुत पढ़ा मैंने इस पुस्तक से उससे यही सिद्ध हो रहा था कि हमारे पूर्वजों ने जिन्हें शूद्र कहा, वह गोकुल जी जैसे विद्वानों के लिए ही कहा | शायद यही कारण था कि शूद्रों को शिक्षा से वंचित रखा गया क्योंकि शिक्षा एक ऐसा अस्त्र है, जिससे निर्माण व अविष्कार भी संभव है और पतन व विनाश भी | बंदर को शस्त्र विद्या सिखा देने से इस बात की सम्भावना कम ही होती है कि वह कुछ अच्छा करेगा, हाँ इस बात की सम्भावना अधिक अवश्य होती है कि वह किसी की मौत का कारण अवश्य बनेगा |
विदेश की एक घटना पढ़ी थी मैंने कई वर्षों पहले कि एक व्यक्ति ने एक बन्दर पाला हुआ था | बंदर और मालिक में दोस्ती इतनी गहरी थी कि मालिक को बंदर पर इतना विश्वास हो गया था कि वह उसे बंदर नहीं, बल्कि अपना बेटा ही मानने लगा था | बंदर भी इतना समझदार था कि वह हर चीज बहुत जल्दी सीख व समझ लेता था | मालिक ने उसे कई तरह के हुनर सिखाये थे और वह सब बंदर बहुत ही कुशलता पुर्वक्र कर लिया करता था | एक दिन उस व्यक्ति ने बंदर को बन्दूक चलाना सिखाने की सोची | बंदर ने वह भी बड़ी जल्दी सीख लिया, लेकिन अचानक बंदर ने अपने मालिक की तरफ ही बन्दूक तान दी और ट्रिगर दबा दिया | मालिक की उसी समय मौत हो गयी….अब उस बंदर का तो कोई दोष था नहीं क्योंकि वह तो यह जानता ही नहीं था कि इससे किसी की मौत हो सकती है | उसने तो बस शरारत की थी और हादसा हो गया | यह विडियो देखिये, इसमें भी ऐसा ही ही कुछ है | कुछ सैनिक जंगल में ठहरे हुए हैं और एक चिम्पांजी का बच्चा उनके बीच पहुँच जाता है | वे उस चिन्म्पांजी से खेलने लगते हैं लेकिन…..बंदर के हाथ बन्दूक
तो शिक्षा भी इसी प्रकार एक घातक अस्त्र है और हर किसी के हाथों नहीं सौंपी जा सकती | आइन्स्टीन के पास परमाणु बम बनाने की तकनीक थी | जब तक उनके पास रही, सब ठीक था | लेकिन जैसे अमेरिकियों के पास पहुँची, हिरोशिमा और नागासाकी की घटना घट गयी | क्योंकि शिक्षा बंदरों के हाथ लग गयी थी | आप ध्यान से यदि इतिहास को पढ़ें और समझें तो शिक्षा जब तक सही व्यक्ति के हाथ रही, सदुपयोग होता रहा, लेकिन जैसे ही शूद्रों के हाथ पहुँची विनाशक चीजें ही बनी और आज इन्हीं पढ़े लिखों के द्वारा किये गये विकास का ही परिणाम है कि धरती, जल और आकाश तीनों ही प्रदूषित हो गये | तो फिर शिक्षा कैसे अछूती रहती ?

अब गोकुल जी भौतिक जगत से ऊपर उठ पाने में अक्षम हैं और गोकुल जी जाने कितने ही ऐसे पढ़े-लिखे होंगे, जिन्होंने केवल पढाई की है, ध्यान आदि का कोई प्रयोग कभी नहीं क्या होगा | किया भी होगा तो कोई चमत्कार होता न देख, छोड़ दिया होगा |

ध्यान इनसे होगा नहीं उसमें भी इनको चमत्कार देखना होगा तो स्वाभाविक है कि ध्यान से इनको कुछ समझ में आना नहीं है | इनको कोई ईश्वर के विषय में समझाए तो समझाए कैसे ? क्योंकि ईश्वर कोई ऐसी वस्तु, पदार्थ या द्रव्य तो है नहीं कि इनको सुंघा कर, छुवाकर महसूस करवा दी जाये, वह तो स्वयं जानने व अनुभव करने की चीज है | कोई जान भी जाए तो कह नहीं सकता, बुद्ध भी नहीं कह पाए और महावीर भी नहीं कह पाए…बुद्ध ने तो बड़ी सफाई से ईश्वर को ही नकार दिया क्योंकि वे जानते थे कि मूर्खों को ईश्वर के विषय में नहीं समझाया जा सकता | लेकिन फिर दुर्भाग्य दूसरा भी है हमारा कि धूर्त पाखंडियों ने ईश्वर के एजेंट होने का ढोंग करना शुरू कर दिया | अब वे ईश्वर के नाम पर धंधा खोल कर बैठ गये… अरे ईश्वर छोड़िये लोग तो बुद्ध के नाम पर ही धंधा खोलकर बैठे हुए हैं | समाज को जागृत व चैतन्य करने कि जगह तमाशा दिखाते फिर रहे हैं | तो ईश्वर समझ में आएगा कैसे ?

फिर गोकुलजी को पूरी तरह से गलत भी नहीं कह सकता क्योंकि धर्मों के ठेकेदारों ने धर्म के नाम पर इतना उपद्रव मचाया हुआ है, इतनी नफरत फैला रखी है कि यही लग रहा है यदि सारे धर्म मिट जाएँ तो शायद कुछ शान्ति आ जाये | मुसलमान अपनी क़ुरान से चिपका हुआ है, हिन्दू वेद और गीता से चिपका हुआ है, इसाइ बाइबल से चिपका हुआ है | आगे बढ़ने को कोई तैयार नहीं, ऊपर उठने को कोई तैयार नहीं…हर कोई एक ही राग अलाप रहा है हमारी किताब पढ़ो तो धर्म समझ में आएगा, हमारी किताब पढो तो ईश्वर समझ में आएगा, हमारी किताब पढो तो जन्नत/स्वर्ग, मोक्ष, अप्सराएं, हूरें मिलेंगी | और ऐसा कहने वाले इन रट्टू तोतों को खुद नहीं पता कि धर्म क्या है | इनकी नजर में तो साउदी के कर्मकांड कर लो और क़ुरान रट लो बस, हो गये मुसलमान | गीता रट लो, तिलक लगा लो, जनेऊ डाल लो तो बस हो गये सच्चे हिन्दू….उसके बाद मारकाट करो, बलात्कार करो, चोरी करो, देश से गद्दारी करो, दंगा-फसाद करो धर्म के नाम पर….सब जायज |

यहाँ यह कहानी पढ़िए.. फिर आगे बढ़ते हैं:

मुल्ला नसरुद्दीन ने एक मनोवैज्ञानिक से पूछा कि मैं क्या करूं? मेरे दफ्तर में लोग काम ही नहीं करते! जिससे कहो वही कहता है: कल देखेंगे। कि कर लेंगे, क्या जल्दी पड़ी है! फाइलें इकट्ठी होती जाती हैं, कोई काम करता नहीं। महा अलाल इकट्ठे हो गए हैं। मैं क्या करूं?
मनोवैज्ञानिक ने कहा, यह सूत्र हरेक की टेबल पर टांग दो–
काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब।।
जंची बात नसरुद्दीन को, उसने कहा यह ठीक है। बनवा कर सुंदर तख्तियां हरेक कमरे में, हरेक कार्यकर्ता के सामने, हरेक कर्मचारी के सामने टांग दीं बड़े-बड़े अक्षरों में।
तीन दिन बाद मनोवैज्ञानिक ने फोन किया कि नसरुद्दीन, क्या हाल हैं?
नसरुद्दीन ने कहा, अस्पताल में भरती हूं। आप आ जाएं। और देर न करें। पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब। आ ही जाएं शीघ्र, क्योंकि शरीर में फ्रैक्चर ही फ्रैक्चर हो गए हैं। क्या कमाल का सूत्र दिया आपने!
मनोवैज्ञानिक तो बहुत हैरान हुआ। भागा, देखा तो पट्टियां ही पट्टियां बंधी हैं नसरुद्दीन पर! पलस्तर चढ़ा है–पैर पर, हाथ पर, खोपड़ी पर। पूछा, यह हुआ क्या? यह दुर्गति कैसे हुई?
उसने कहा, यह तुम्हारे सूत्र की कृपा है। अभी उठ नहीं सकता, नहीं तो वह मजा चखाता…। क्योंकि जैसे ही मैंने यह तख्ती टांगी, उपद्रव हो गया। वह जो खजांची था वह सारी तिजोरी लेकर नदारद हो गया। और एक चिट लिख कर छोड़ गया कि जिंदगी भर से सोच रहा था कि कब तिजोरी लेकर नदारद हो जाऊं, आपने क्या सूत्र टांगा कि मैंने सोचा बात तो बिलकुल सच है–पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब! सो मैं तो जाता हूं, जयरामजी की!
और वह जो मैनेजर था वह मेरी टाइपिस्ट को लेकर भाग गया। वह भी लिख कर नोट छोड़ गया कि नजर तो मेरी तुम्हारी टाइपिस्ट पर बहुत दिन से थी, मगर तुम्हारे डर से छिप-छिप कर छेड़ खानी करता था। मगर तुमने सूत्र क्या टंगवा दिया, मैंने भी सोचा बात तो सच है, जिंदगी यूं ही बीती जा रही है, ऐसे ही ख्वाब देखते-देखते। तो अब जा रहा हूं और तुम्हारी टाइपिस्ट को भी भगाए लिए जा रहा हूं। अब कहीं रहेंगे छिप कर और जीएंगे मौज से।
और मेरा जो दरबान है, वह एकदम भीतर घुसा और लगा मुझे पीटने। मैंने पूछा, भाई, तू यह क्या करता है? उसी ने ही ये मेरी हड्डी-पसली तोड़ दीं।
उसने कहा कि चाहता तो कब से करना था यह कि तुम्हारी हड्डी-पसली तोड़ दूं। लेकिन यह सोच कर कि देखेंगे, फिर देखेंगे…बाल-बच्चों वाला आदमी हूं, कोई झंझट हो, पुलिस हो, अदालत हो। मगर तुमने तख्ती क्या टांगी, मैंने कहा कि बात तो ठीक है।
मनोवैज्ञानिक ने कहा कि मैं बड़ा दुखी हूं। मुझे क्या पता था कि सूत्र का ऐसा परिणाम होगा! अब यह सूत्र किसी को न दूंगा। मुझे क्षमा करो। बहुत दुख हो रहा होगा तुम्हें, जगह-जगह पीड़ा हो रही होगी।
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि जब हंसता हूं तभी दर्द होता है, वैसे नहीं होता।
मनोवैज्ञानिक ने कहा, हंसते किसलिए हो?
तो उसने कहा, हंसता इसलिए हूं कि क्या गजब दुनिया है! काहे के लिए सूत्र टांगा था और क्या हो गया! कैसे गजब के लोग हैं! इससे कभी-कभी हंसी आ जाती है भीतर ही भीतर तो दर्द होता है, हंसी में; नहीं तो वैसे तो ……सब शांत पड़ा हूं तो ठीक है..!!

चलिए अब चलते हैं यह जानने कि ईश्वर का बहिष्कार करने से क्या समस्या हल हो जायेगी ?

सबसे पहली बात तो यह कि जिसने भी ‘ईश्वर के बहिष्कार’ की कल्पना की है, वह नास्तिक नहीं है | क्योंकि नास्तिक लोग किसी अनदेखी अनजानी चीजों का विरोध नहीं करते, वे उन्हीं चीजों का विरोध करेंगे, जिसको वे जानते हैं, छु सकते हैं या देख सकते हैं | लेकिन ईश्वर के आस्तित्व को ही जो नहीं मानते, भला उसका बहिष्कार कैसे कर सकते हैं ? ईश्वर का बहिष्कार करने के लिए भी तो कल्पना की ही आवश्यकता होगी, कुछ तो बताना ही पड़ेगा कि जिसे तुम लोग ईश्वर मानते हो वह वास्तव में है नहीं | और उसे समझाने के लिए दूसरों की कल्पनाओ को तोडना होगा, उनको भी अपनी ही तरह मंदबुद्धि या किताबी कूपमंडूक बनाना होगा |

इन नास्तिक सम्प्रदायों के ठेकेदार और अन्य सम्प्रदायों के ठेकेदारों में कोई बहुत अंतर नहीं है, बस एक नहीं मानते और दूसरे मानते हैं… जानते दोनों में से कोई नहीं हैं | दोनों का ही आधार है किताबें…एक की किताब में लिखा है ईश्वर नहीं है, और दूसरे की किताब में लिखा है कि है | एक रिफरेन्स देता है स्टीफन हॉक, पेरियार, आंबेडकर का, तो दूसरा रेफ़रन्स देता है पैगम्बर, अवतारों और आध्यात्मिक गुरुओं का | एक कहता है कि हमारा अल्लाह ही सच्चा है तो दूसरा कहता है कि हमारा स्टीफन हॉक और पेरियार ही सच्चा है | एक कहता है कि हम जो कहते हैं उसे मानो और दूसरा कहता है कि मत मानो | एक कहता है कि केवल हमारा सम्प्रदाय, हमारी किताबें और हमारे भगवान ही सच्चे हैं, बाकी सभी काफ़िर, अधार्मिक हैं उनको मिटा दिया जाना चाहिए या धर्म परिवर्तन करवा दिया जाना चाहिए, दूसरा कहता है कि सारे धर्म और उनकी किताबों को ही मिटा दिया जाना चाहिए……. मुझे तो इन सभी सम्प्रादयों में मौलिक कोई अंतर नहीं दिखाई पड़ता | एक ही नस्ल है, एक ही मानसिकता है, एक सी ही विचार धारा है… बस हम सही हैं और बाकि सभी सही |

सुकरात, गैलीलियों, जीसस को ऐसी ही मानसिकता के विद्वानों ने मरवा दिया था | बोधिधर्मन को ऐसी ही मानसिकता के लोगों के कारण चीन भाग जाना पड़ा, चीन में भी आज अध्यात्मिक लोगों का दमन जोरों पर है ऐसा सुनने में आया | तो कोई भेद नहीं है ऐसे कूपमंडूक नास्तिकों और आस्तिकों में |
नास्तिकों को लगता है कि ध्यान में बैठना समय की बर्बादी है, इस्लामिकों को लगता है कि पूजा-पाठ मूर्ती पूजा आदि समय की बर्बादी है, हिन्दुओं को लगता है कि नमाज पढ़ना मस्जिद जाना समय की बर्बादी है, यानि हर किसी को लगता है कि वही समय का सदुपयोग कर रहा है, बाकि सभी बर्बाद कर रहे हैं | नास्तिकों के लिए समय का सदुपयोग का मतलब नोट छापने की मशीन बन जाना… आप अपनी भक्ति में खोये हैं अपने में मस्त हैं, न किसी को कुछ कहते हैं, न किसी पर कुछ थोपते हैं… फिर भी सभी के पेट में दर्द रहता है.. जैसे मीरा से लोग परेशान थे | यानी ये लोग खुद को भगवान सिद्ध करना चाहते हैं, ये जैसे चाहेंगे वैसे सब चलें क्योंकि इनकी किताबें ऐसा कहती हैं क्योंकि ये उन्नत नहीं हो पा रहे, क्योंकि ये नहीं उठ पा रहे ऊपर.. तो कोई दूसरा भी नहीं उठना चाहिए… इन्हीं की तरह भेड़बकरियों की तरह किसी किताब, किसी नेता किसी इकलौते अनदेखे ईश्वर के नाम पर धर्मों के ठेकेदारों, जाति के ठेकेदारों, आरक्षण के ठेकेदारों की पीछे दुम हिलाते घूमते रहें… हद हो गयी…..यह तो…..

क्षमा चाहता हूँ कि इतना लम्बा पोस्ट लिख दिया… क्योंकि समझाने के लिए आवश्यक लगा… यह भी जानता हूँ कि आपसे से अधिकाँश तो पूरा पढेंगे भी नहीं, और कई कि समझ में ही नहीं आयेगा… फिर भी यदि दो चार धैर्यवान व्यक्तियों कि समझ में आ जाये कि मैं क्या कहना चाहता हूँ, वही मेरे लिए बहुत है | मुझे बर्दाश्त करने के लिए आपका आभार.. ईश्वर आप सभी की आत्मा को शांति प्रदान करें |

~विशुद्ध चैतन्य

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