इसलिए बचपन में ही निश्चय कर लिया था कि पढ़ा-लिखा बनना ही नहीं है


बचपन में स्कूल में लड़ाई झगड़ा, मार-पीट करना एक आम बात होती है और वह प्राकृतिक रूप से विकास के आवश्यक होता है | और लड़ाई करने के मुद्दे भी बहुत जायज ही होते थे जैसे, किसी ने कॉपी फाड़ दी या किताब फाड़ दी तो गुस्सा आना स्वाभाविक  ही होता था | घर जायेगा तो घर में मार पड़ेगी ही कोई उसे तो कुछ कहेगा नहीं जिसने नुक्सान किया अपने ही बच्चे की पिटाई कर देगा कि नुक्सान करा लाया | बहुत हुआ तो नुक्सान करने वाले बच्चे को डांट पड़ जाएगी लेकिन अपनी तो खाल ही उतर जायेगी | तो गुस्सा आना जायज होता है..(यह अपने अनुभव से बता रहा हूँ क्योंकि किताब कॉपी फटने पर बहुत मार खाई है मैंने | इसलिए बचपन में ही निश्चय कर लिया था कि पढ़ा-लिखा बनना ही नहीं है)

मुझे याद है एक लड़का मुझसे एक किताब छीन कर भाग रहा था और उस पुस्तक का नाम था, ‘हीरा मोती’ | उसमें रुसी कहानियाँ थीं जिनमे से एक कहानी थी, ‘शाहजादी माहिस्तारा’ | तो जब वह किताब लेकर भागा तो मैं उसके पीछे दौड़ा | लेकिन वह मुझसे बहुत बड़ा था और बहुत तेज दौड़ रहा था तो मेरे हाथ में उस समय धागों से डिजाइन में प्रयोग आने वाला एक बड़ा सुआ था, वही फेंक कर मारा | वह सीधे उसकी गर्दन में जा धँसा लेकिन वह भाग गया | शाम को उनके परिवार के लोग मेरे घर पहुँच गये और पिताजी को बताया कि आपका बेटा गुंडा बन गया है और कातिलाना हमला करता है हमारे बच्चों पर | हमारा बेटा तो किसी तरह अपनी जान बचा कर भाग गया नहीं तो न जाने क्या होता | उसे पुलिस के हवाले कर दीजिये ताकि उसे सबक मिले | यह शरीफों का मोहल्ला है गुंडे बदमाशों के लिए कोई जगह नहीं है |

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पिताजी ने उन्हें समझा बुझा कर बाहर किया और फिर ढंग से मेरी पिटाई शुरू हुई | तब मैं दस साल का रहा होऊंगा | उन्होंने मुझसे पूछा भी नहीं कि क्यों ऐसा हुआ और मुझे क्यों इतना गुस्सा आया, जबकि मैं सबसे शांत रहने वाला इंसान था | लड़ाई झगड़े से हमेशा दूर ही रहना पसंद करता था | तो रात भर रोता रहा और सोचता रहा कि यदि मम्मी जिन्दा होती आज तो क्या वह मुझसे पूछतीं नहीं कि मुझसे यह गलती क्यों हुई ? दूसरे दिन ही सवेर सवेर उठकर मैं घर से बाहर निकल गया हमेशा के  | यही सोचा कि जहाँ कोई मुझे नहीं समझता वहां नहीं रहना | पटपड़गंज करके दिल्ली में जगह है वहीं में पहुँच गया और एक जगह बैठ कर सोच रहा था कि मैं कहाँ जाऊं और क्या करूँ | दिल्ली मेरे लिए बिलकुल नई जगह थी तब और यहाँ की भाषा भी मुझे समझने में मुश्किल होती थी, क्योंकि मध्यप्रदेश के जिस जगह से हम आये थे वहाँ हिंदी का चलन उतना तब नहीं था |

वहीँ पास के एक मकान से एक औरत निकली और मुझसे पूछताछ करने लगी | फिर वह मुझे अंदर ले गयी हाथ पैर धुलवाया और खाने के लिए पराठें और कुछ सब्जी आदि दी और बोली, “बेटा ऐसे घर से नहीं भागते यह अच्छी बात नहीं है |” वह एक संयुक्त परिवार था और बहुत से लोग थे | मैं खा पीकर वहां उस घर की सबसे बुजुर्ग महिला के साथ बैठा बातें कर रहा था, तभी मेरे पिताजी भी पहुँच गये | मुझे नहीं पता कि वह कैसे पहुँचे वहां लेकिन पहुँच गये और मुझे वापस ले गये | तो मेरी जिंदगी की वह पहली दौड़ थी घर से बाहर की |

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एक घटना किताब को लेकर घटी और मेरे मन में घर के प्रति हमेशा के लिए नफरत का भाव भर दिया | कारण तो और भी बहुत रहे लेकिन इस घटना के बाद फिर कभी घर में मन नहीं लगा |

लेकिन आज जब देखता हूँ कि किसी ने बाइबल फाड़ दी तो उपद्रव मच गया, किसी ने क़ुरान फाड़ दी तो मारकाट मच गयी, किसी ने गुरु ग्रन्थ साहब को नुक्सान पहुँचाया तो उपद्रव मच गया….. लगता है कि ये लोग बड़े क्यों नहीं हुए ? मैं तो तब दस साल का था, लेकिन ये लोग तो दिखने में बहुत बड़े लगते हैं और कई तो कई कई बच्चों के माँ-बाप भी होते हैं | तो ये लोग बड़े क्यों नहीं हो पाए ?

वही लोग जो तब मुझे पुलिस के हवाले करने की सलाह रहे थे, आज खुद किताब के लिए मरने-मारने पर तुल जाते हैं | जिस प्रकार इनके लिए आज कोई किताब बहुत महत्वपूर्ण है, वैसे ही मेरे लिए उस समय वे किताबें होती थीं, जिनके लिए मैं लड़ने-मरने पर आमादा हो जाता था |

क्या धार्मिक शिक्षा व्यक्ति को मानसिक रूप से ऊपर बढ़ने से रोकती है ? क्या ये जितने भी पंथ, मत हैं उनकी शिक्षा लोगों को बच्चा बनाये रखने के लिए ही है ? ~विशुद्ध चैतन्य

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