सामाजिक प्राणी हमेशा उत्सव में ही रहते हैं

मेरे शुभचिंतक (जो मित्रसूची में नहीं हैं) बहुत ही नाराज रहते हैं कि मैं केवल राजनैतिक पोस्ट ही डालता हूँ और वह भी भगवा पहनकर जिसकी वजह से भगवा का अपमान होता है | मुझे सामाजिक या अध्यात्मिक पोस्ट ही लिखने चाहिए….

तो मैं दो दिनों से सोच रहा था कि सामाजिक पोस्ट तो केवल सामाजिक प्राणी ही लिख सकता है, मैं तो समाज से कटा हुआ एकांत में जीने वाला प्राणी हूँ तो सामाजिक पोस्ट कैसे लिखूं | फिर कई सामाजिक प्राणियों के पोस्ट देखा और फिर मैंने निश्चय किया कि कम से कम एक पोस्ट तो सामाजिक लिख ही दूँ | रही राजनैतिक पोस्ट लिखने की तो उसका कारण है कि मैं एकांत में स्वयं को स्वयं का राजा ही समझता हूँ इसलिए राजनैतिक पोस्ट लिखने में सुविधा हो जाती है | अध्यात्मिक पोस्ट लिखने पर धार्मिकों की समझ में आयेंगी नहीं तो कोई लाभ ही नहीं है लिखने का | ईश्वर ने मानव शरीर दिया ताकि मानव बनो और अध्यात्मिक जीवन जियो, लेकिन लोग पैदा होते ही हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई बन जाते हैं और उसपर भी ब्राह्मण, शूद्र, शिया, सुन्नी….. भार्गव, शर्मा, वर्मा, बाल्मीकि….. और न जाने क्या क्या बन जाते हैं | लेकिन इन्सान ही नहीं बनते |

खैर जाने दीजिये हमें क्या…. हम तो सामाजिक बातें करें | समाज किसी एक मत पंथ या सम्प्रदाय को नहीं कहते, बल्कि सभी का मिश्रण होता है | उसमें भाजपाई भी होते हैं, कांग्रेसी भी होते हैं, आपिये भी होते हैं, सपाई, बसपाई, हाथ की सफाई, गंगा की सफाई, घोटालों के फ़ाइल की सफाई, माई, दाई व अन्य सभी होते हैं | इन सभी के समूह को समाज कहते हैं |

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समाज में कई त्यौहार होते हैं जो आपस में सभी मिलजुलकर मनाते हैं अपने अपने तरीके से | कोई बैन लगाने की माँग करता है तो कोई किसी जैन मंदिर में जाकर चिकन खाने के शौक पूरा करता है विरोध के नाम पर | कोई होली में पानी की बर्बादी से त्रस्त होता है तो कोई गंगा में मूर्ती विसर्जन से दुखी होता है… यानि सभी त्यौहार बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है | इन्हीं त्योहारों में श्रेष्ठ त्यौहार है चुनाव | यह एक राष्ट्रीय त्यौहार है और इस त्यौहार में कई ऐसे प्राणी जो पाँच पाँच वर्षों तक सोते रहने के वरदान प्राप्त किए रहते हैं, वे जागते हैं | और उन्हीं के नींद से जागने की ख़ुशी में पूरा देश हर्षोल्लास से भर उठता है | जगह जगह जुलुस निकाले जाते हैं, रैलियाँ की जाती हैं और सामाजिक प्राणियों का समूह उस विशेष प्राणी (जिन्हें आधुनिक कुम्भकरण भी कहते हैं) को देखने के लिए उमड़ पड़ता है जो पाँच साल तक सोता है | उनके दर्शन बहुत ही दुर्लभ होते है इसलिए कोई भी इस अवसर को चूकना नहीं चाहता कि इस बार चुक गये तो फिर पाँच साल तक दर्शन नहीं होंगे |

तो यह है हमारा समाज और सामाजिक प्राणियों का उत्सव | सामाजिक प्राणी हमेशा उत्सव में ही रहते हैं चाहे कोई उत्सव हो या न हो | इन्हें किसी से कोई परेशानी नहीं होती, चाहे सरकार किसी कि भी रहे | जब कोई नेता आकर कह देता है कि महँगाई बहुत बढ़ गयी है, चलो हड़ताल-हड़ताल खेलें, तो ख़ुशी ख़ुशी निकल पड़ते हैं खेलने | लेकिन महँगाई से कोई भी वास्तव में परेशान नहीं होता सिवाय नेताओं और राजनैतिक पार्टियों के | ये राजनैतिक पार्टियाँ और नेता ही हैं जो शोर मचा रखे होते हैं कि कमर तोड़ महँगाई है, जबकि जनता तो यही नहीं समझती कि महँगाई से कमर भी टूट सकती है | इसी प्रकार नेता लोग सामाजिक प्राणियों को बरगलाकर कभी बंद, कभी धरना प्रदर्शन, कभी नौ दिवसीय आमरण अनशन, कभी तोड़-फोड़ जैसे खेलों के लिए एकजुट करते रथे हैं | फिर एक दो दिन खेलने के बाद सभी सामाजिक प्राणी अपने अपने सामाजिक कार्यो में व्यस्त हो जाते हैं |

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