अब समझना शुरू कीजिये कि धर्म वास्तव में है क्या ?

मोटिवेशन गुरु संदीप माहेश्वरी का एक विडिओ देखा मुझे बहुत ही पसंद आया | एक प्रश्न ‘क्यों ?” किसी व्यक्ति को कितना बदल देता है वह उस विडियो में देखने को मिला |

समाज प्रश्नों से घबराता है और उससे अधिक घबराते है धर्मों के ठेकेदार | यही कारण रहा कि धर्म के नाम पर बने सम्प्रदायों का स्तर ऊपर उठने के स्थान पर नीचे ही गिरता चला गया | कुछ धर्मों में तो प्रश्न करने की ही मनाही है ऐसा मैंने सुना है | आँख मूंदकर, सर झुका कर मानते रहो जो पूर्वजों ने लिख दिया है ईश्वर के नाम पर | अब सही है या गलत है कोई फर्क नहीं पड़ता, उससे से शैतान अधिक ताकतवर हो रहे हों तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ईश्वर स्वयं निपट लेगा किसी दिन.. अभी तो भुगतते रहो उनको | समाज दिन पर दिन कायर और स्वार्थी होता चला गया, लेकिन कभी किसी ने प्रश्न नहीं किया कि क्यों |

अक्सर हम देखते हैं कि धर्मों के नाम पर आप कुछ प्रश्न करना चाहें तो सबसे पहले धर्मरक्षक सामने आ जाते हैं | क्योंकि प्रश्नों के साथ ही इनके खोखले धर्मों की नींव हिलने लगती है | धर्म खतरे में पड़ जाता है | अब जरा सोचिये कि हर जरा जरा सी बात में जो धर्म खतरे में पड़ जाता हो, तो ऐसे कमजोर धर्मों से आप कुछ महत्वपूर्ण की आशा कैसे कर सकते हैं ? मैं यह नहीं कह रहा कि आप लोगों को अपना धर्म छोड़ देना चाहिए और किसी नए धर्म की स्थापना करनी चाहिए, बल्कि यह कह रहा हूँ कि अब समझना शुरू कीजिये कि धर्म वास्तव में है क्या ? भेड़ों-बकरियों की तरह नहीं, बल्कि इंसानों की तरह जीने का प्रयास करना शुरू कर दीजिये |

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जो धर्म कुछ लम्पटों, गुण्डों मवालियों को आपका मालिक बना देता हो और आपकी स्वतंत्रता ही मिटा देता हो, क्या वास्तव में वह धर्म है ?

प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर की अनुपम कृति है और हर कोई कुछ कुछ न कुछ विशेषताओं के साथ इस दुनिया में आता है | लेकिन समाज और धर्म, आपको अपनी ही योग्यताओं व उद्देश्यों से विमुख कर देता है और भेड़चाल में लपेट लेता है | फिर आप एक ट्रेंड सर्कस के शेर की तरह कुछ लठैतों, मवालियों के इशारे पर नाचने लगते हो | जिस प्रकार शक्तिशाली शेर भी एक रिंगमास्टर के इशारे पर हंटर के डर से अपने मूल स्वाभाव के विरुद्ध व्यव्हार करता है | ठीक वैसे ही क्या आप सब भी नहीं करते ?

कभी पूछा प्रश्न स्वयं से कि जो कुछ भी आप आज कर रहे हैं वह क्यों कर रहे हैं ? यदि नहीं तो अभी पूछिये… उत्तर आपके भीतर से ही मिलेगा, बाहर किसी और से पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है |

मैं हर जगह विरोधी ही बनाता हूँ, मित्र तो न के बराबर होते हैं, लेकिन मेरे जैसे व्यक्ति के लिए यह ठीक है | जबकि आप जैसे सामाजिक प्राणियों के लिए यह बहुत ही असुविधाजनक हो जाएगा | फिर भी चुनौती स्वीकारना शुरू कीजिये | जैसे मैं अपने ही आश्रम में हर किसी को नाराज करके बैठा हूँ क्योंकि मैंने उनसे कुछ प्रश्न किये कि आश्रम का उद्देश्य क्या होता है ? संन्यासी का मूल धर्म क्या होता है ? ठाकुर दयानन्द ने क्या यह शिक्षा दी थी कि मेरी मूर्ती बना कर उसकी आरती पूजन किया करो और बाकी सब भूल जाओ ? इस आश्रम में पिछले सौ वर्षो से संन्यासी रहते आये हैं, और सभी बड़ी बड़ी डिग्रीधारी रहे और सभी अंग्रेजी के विद्वान रहे, तो फिर आज तक गाँव क्यों इतना पिछड़ा हुआ है ?

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बस सभी नाराज हो गये | उनका कहना है कि संन्यासी को केवल ईश्वर पर ध्यान लगाना चाहिए बाकी बाहर क्या हो रहा है उन सबसे कोई लेना देना नहीं होना चाहिए… आश्रम का नियम है भोजन-भजन-शयन श्रमदान आश्रम के लिए | बस उससे अलग कुछ और सोचते हो तो आश्रम में रहने योग्य नहीं हो |

तो मैं तो कहीं भी जाऊँगा यही समस्या रहेगी क्योंकि प्रश्न पूछने की बिमारी मुझे बचपन से ही है | और मैं ऐसे किसी भी मान्यताओं को नहीं मानता, जिसका सार्थक उत्तर न मिल पाता हो, या जो केवल परम्परा है इसलिए निभाई जा रहीं हों | ~विशुद्ध चैतन्य

इस विडियो को अवश्य देखें

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