रामायण जो पढ़े-लिखों के समझ के परे रह गयी

रामायण वास्तव में पढ़े-लिखों के लिए थी ही नहीं, वह तो बिलकुल निपट अनपढ़ गँवारों के लिए ही थी | पढ़े-लिखों को कहानियाँ कम ही समझ में आती हैं, जबकि अनपढ़ और गँवार कहानियों में खो जाते हैं | वे उसे बिलकुल आत्मसात कर सकते है लेकिन पढ़े-लिखों के लिए यह असंभव हो जाता है | क्योंकि वे लेफ्टब्रेन से प्रभावित होते हैं और राईट ब्रेन का प्रयोग करना बचपन में ही समाज व नंबरों के खेल में भूल चुके होते हैं |

बहुत पुरानी बात है मैं अपने नौकर को एक दिन एक अंग्रेजी पिक्चर दिखाने ले गया | वह नेपाल से आया था और हिंदी फिल्म ही देखने का शौक़ीन था, लेकिन उस दिन मेरे साथ अंग्रेजी पिक्चर देखने की जिद करने लगा | वह फिल्म थी अनाकोंडा | नई नई आई रिलीज़ हुई थी और मुझे होलीवूड फिल्मों में साउंडइफेक्ट्स और बैकग्राउंड म्यूजिक का जादू देखने में ही सबसे आनंद आता है | बाकी अंग्रेजी तो कुछ पल्ले पड़ती नहीं थी |

तो इंटरवल तक तो लगभग सब ठीक ठाक ही रहा… उसके बाद पॉपकॉर्न और कोक लेकर हम फिर बैठे | अनाकोंडा का प्रभाव अब नौकर के चेहरे में दिखने लगा था | कभी वह मेरा हाथ पकड़ ले कभी चेहरा अजीब से बनाने लगे…. अब मेरा ध्यान फिल्म से ज्यादा उसपार था | फिर साउंडइफेक्ट इतना जबरदस्त था कि लगता था कि अनाकोंडा अब सीट के आसपास ही कहीं है…… वह बेचारा दोनों पैर उठाकर कुर्सी पर जम गया | मैंने पूछा कि क्या हुआ… कुछ नहीं बोला… शायद मेरी आवाज भी उसे नहीं सुनाई दी… वह बिलकुल ट्रान्स पर जा चुका था और अनाकोंडा से ही अपने आप को बचाने की जुगत में लगा हुआ था……

तो यह सब मुझे अभी याद आ गया क्योंकि मैं जो बताने जा रहा हूँ वह ऐसे ही लोगों के विषय में है | पढ़े-लिखों के लिए इस स्थिति को समझ पाना बहुत ही कठिन हो जाएगा |

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रामायण लिखी गयी सुबह शाम पढ़ने और माथे पर लगाने के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति को कहानी के माध्यम से समझाने का ही उद्देश्य रहा होगा | जरा सोचिये आज कोई शोले,कुछ कुछ होता है, डीडीएलजे…. आदि फिल्मों की स्क्रिप्ट को दोहे या चौपाई में रूपांतरित करके दे दे और कहे कि इसे रोज सुबह शाम पढ़ो तो कैसा लगेगा ?

जानता हूँ छूटते ही मुँह से निकला होगा आप लोगों के कि यह क्या बकवास कर रहा है ??? हमारी धर्मग्रन्थ और पूजनीय ग्रन्थ की तुलना फिल्मों से कर रहा है ???? घोर नरक में जाएगा….. आदि इत्यादि | लेकिन मैं जो कह रहा हूँ उसे ध्यान से पढ़िए |

तो रामायण लिखी गयी कृषि और भूसंपदा के महत्व को समझाने के लिए | उसे इतना गौरवमय व महान बताया गया कि हर किसान अपने खेतों, अपनी जमीन को उतना ही महत्व दे, जितना सीता माँ का महत्व है | जितना राम ने सीता से प्रेम किया उतना ही प्रेम चाहता था लेखक रामायण के माध्यम से भूसंपदा के प्रति |

कहा जाता है कि सीता का जन्म खेत में हल जोतते समय हल का नोक एक कलश में टकराया और जब उस कलश को निकाला गया तो उसमें से एक नवजात कन्या थी, जिसका नाम सीता रखा गया | सीता का अर्थ होता है हल से जोती हुई रेखा | तो अब हम इस आधार पर पूरी रामायण को समझने का प्रयास करते हैं |

हल से जोतने पर जो उत्पन्न होता है वह किसान के लिए वरदान ही होता है | उसकी कड़ी मेहनत का फल होता है वह फसल जो उसके खेत में उत्पन्न होता है | सीता का दूसरा नाम भूमिजा भी है और कृषि की अधिष्ठात्री देवी भी हैं | तो सीता यानि किसानों की देवी और देवी इसलिए क्योंकि भूमि से उत्पन्न अनाज उनके जीवन में खुशहाली लाती है | भूमि से तो खनिज और रत्न से लेकर तेल और जल तक सभी कुछ जीवन में समृद्धि लाने वाली होती है, इसलिए हर वह पदार्थ व अन्न पूजनीय हैं जो किसान अपनी मेहनत से भूमि में हल जोतकर उत्पन्न करता है |

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तो स्वयंवर में राम ने जिस सीता को जीता वह भूमि से उत्पन्न भूसंपदा थी | इसलिए उसे जीतने रावण भी आया था लेकिन शिव जी के धनुष को उठा भी नहीं पाया था | यानि वह उतना योग्य नहीं था, जितना कि एक किसान होता है | वह एक व्यापारी, व्यभिचारी था, छल कपट करने वाला, अत्याचार करने वाला, अहंकार में डूबा रहने वाला, और साम-दाम-दंड-भेद का प्रयोग कर दूसरों की सम्पति, स्त्रियों का हरण करने वाला | वहीँ किसान इन सब से पूरी तरह मुक्त होता है | वह सीधा साधा, अपने ही धुन में मगन, अपनी मेहनत पर विश्वास करने वाला होता है | इसलिए उसने सहजता से धनुष यानि लक्ष्य को भेदने का सामर्थ्य उठा लिया और उस पर प्रत्यन्चा भी चढ़ाने में सफल हो गया लेकिन धनुष ही टूट गया | लक्ष्य को भेदने के लिए जो धैर्य व स्थिरता चाहिए वही प्रत्यन्चा है | धनुष टूटने का अर्थ यह निकाला जा सकता है कि जो साधन है वह चाहे कमजोर पड़ जाए, चाहे टूट जाये, लेकिन धैर्य व साहस में कोई कमी नहीं आ सकती |

राम को जब वनवास मिला तो सीता भी सारे वैभव छोड़कर उसके साथ हो चली | अर्थात एक किसान कितनी ही कठिन परिस्थिति में आ जाये, भूसंपदा सदैव उसके दुःख को कम करने का प्रयास ही करेगी | वह हमेशा उसे सुखी ही रखना चाहेगी | एक किसान कितना ही गरीब क्यों न हो, जमीन यदि उसकी अपनी है तो वह यदि राम की तरह धैर्यवान, विवेकी, व परिश्रमी हुआ तो सीता की तरह वह उसे सुख ही देगी | तो इसलिए भी भूमिजा किसानों कि अधिष्ठात्री देवी हैं, पूजनीय हैं, वन्दनीय हैं |

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वन में स्वर्णमृग का मिलना यानि भूमाफियाओं और व्यापारियों द्वारा भेजा गया दलाल जो, लालच देता है किसानों को, भटकाता है उसका मन…… भेसबदल कर आया रावण और कोई नहीं | भूमाफिया ही होता है जो उस समय साधू संत के भेस में घूमा करते रहे होंगे और आज नेताओं सरकारी अधिकारीयों के रूप में | अब यहाँ देखें तो हर बार चुनाव में यही कहा जाता है कि हम किसानों के शुभचिंतक हैं… लेकिन जीतने के बाद वे नेता अपने पुष्पक विमान में विदेश निकल जाते हैं | किसानों कि स्थिति बाद से बदतर होती जाती है, जैसे राम और लक्ष्मण की हो गयी थी सीता हरण के बाद |

राम ने तो छल से चुराई सीता वापस ले ली… लेकिन क्या किसान अपनी सीता यानि भूसंपदा वापस ले सकते हैं ? जब किसान स्वयं ही राम बनने को तैयार नहीं हैं तो सीता कैसे वापस मिलेगी ?

कभी समय मिले तो इस पर चिन्तन-मनन अवश्य करियेगा | यह मेरा अपना तर्क है और किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने का कोई उद्देश्य नहीं है | मैं चाहूँगा कि रामायण को यदि पढ़ते हैं, तो अब इस नजरिये से पढ़िए | रोचक भी लगेगा और अपने भीतर ही राम और सीता का अनुभव वैसे ही करेंगे, जैसे हनुमानजी करते थे | दोनों की शक्ति ही थी जो हनुमान को इतना पराक्रमी व निडर बना दिया था | एक किसान भी इतना ही निडर व पराक्रमी हो सकता है यदि वह राम यानि ब्रम्ह और सीता यानि भूसम्पदा को स्वयं से अलग न होने दे | निरंतर हनुमान की तरह उनकी सेवा में लगा रहे… तो वह खेत ही उसे समृद्धि और ऐश्वर्य के साथ मानसिक शांति भी प्रदान करेगा | ~विशुद्ध चैतन्य

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